तेल के गिरते मूल्य से फायदा

Updated at : 23 Feb 2016 1:07 AM (IST)
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तेल के गिरते मूल्य से फायदा

डॉ भरत झुनझुनवाला अर्थशास्त्री बीते दिनों ईंधन में तेल के दाम में भारी गिरावट आयी है. एक बैरल कच्चे तेल का दाम 140 अमेरिकी डाॅलर से गिर कर 30 डाॅलर रह गया है. कुछ विद्वानों का मानना है कि तेल के मूल्यों में यह गिरावट हानिप्रद रहेगी. तेल निर्यातक देशों की अर्थव्यवस्थाओं के दबाव में […]

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डॉ भरत झुनझुनवाला

अर्थशास्त्री

बीते दिनों ईंधन में तेल के दाम में भारी गिरावट आयी है. एक बैरल कच्चे तेल का दाम 140 अमेरिकी डाॅलर से गिर कर 30 डाॅलर रह गया है. कुछ विद्वानों का मानना है कि तेल के मूल्यों में यह गिरावट हानिप्रद रहेगी. तेल निर्यातक देशों की अर्थव्यवस्थाओं के दबाव में आने से हमारे श्रमिकों को उन देशों में रोजगार नहीं मिलेंगे.

उन देशों में मिलनेवाले विदेशी निवेश से हम वंचित हो जायेंगे. ये तथ्य सही हैं. हमारे द्वारा महंगे तेल की खरीद को दी गयी रकम का एक अंश मात्र ही हमें वापस मिलता है, जैसे मोटरसाइकिल की खरीद पर विक्रेता हेलमेट फ्री देता है, जिसकी कीमत मोटरसाइकिल के सामने नगण्य है. मूल रूप से महंगा तेल हमारे लिए हानिप्रद है.

गिरावट का मुख्य कारण चीन की घटती मांग है. चीन की मांग में गिरावट का कारण क्या है? कारण यह है कि विकसित देशों में चीन के माल की मांग में गिरावट आ रही है. चीन के निर्यात दबाव में हैं.

इसलिए चीन द्वारा तेल की खपत कम की जा रही है. अगला प्रश्न है कि विकसित देशांे द्वारा माल की मांग में गिरावट क्यों आ रही है? कारण है कि वैश्वीकरण के चलते विकसित देशांे के रोजगार विकासशील देशों को स्थानांतरित हो रहे हैं. इसलिए विकसित देशों में मांग कम है, उनके द्वारा चीन से माल का आयात कम किया जा रहा है, चीन के उद्योग दबाव में है, चीन में तेल की मांग घट रही है और तेल के दाम गिर रहे हैं.

इस विश्लेषण के विपरीत अमेरिका में रोजगार बढ़ रहे हैं. इसका कारण उस देश की ऋण लेकर घी पीने की नीति है. अमेरिकी सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, उद्यमी द्वारा सेवाओं का उत्पादन करके विक्रय करने में सूचना तथा वित्तीय सेवाओं में रोजगारों का हनन हुआ है. रोजगार का सृजन मुख्यतः शिक्षा एवं स्वास्थ क्षेत्रों में हुआ है.

ये क्षेत्र मुख्यतः अमेरिकी सरकार द्वारा दिये गये अनुदान से चलते हैं, यानी प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों जैसे मेन्यूफैक्चरिंग, स्वरोजगार, सूचना तथा वित्तीय सेवाओं में रोजगार का हनन हो रहा है. वैश्विक स्पर्द्धा में अमेरिका पिछड़ रहा है. ऋण लेकर घी पीने की यह नीति ज्यादा दिन नही टिक सकती. मूल रूप से अमेरिकी अर्थव्यवस्था दबाव में है, चूंकि मेन्यूफैक्चरिंग तथा सूचना सेवाओं का ही स्थानांतरण विकासशील देशों को हो रहा है. इसीलिए विश्व बाजार में तेल की मांग कम हो रही है और दाम गिर रहे हैं.

तेल के दाम में आ रही वर्तमान गिरावट दीर्घकालिक होगी. आनेवाले समय में विकसित देशों के रोजगार अधिक दबाव में आयेंगे और उनकी क्रय शक्ति का ह्रास होगा. वर्तमान में विश्व अर्थव्यवस्था में अमेरिका का दबदबा है. अमेरिका का यह वर्चस्व ऋण लेने की क्षमता के कारण है. इस क्षमता का उत्तरोत्तर ह्रास होता जायेगा. यह स्थिति हमारे लिए स्वर्णिम अवसर प्रदान करेगी.

कहावत है कि बरगद के नीचे पौधे नहीं पनपते हैं. इसी प्रकार अमेरिकी अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ रहते विश्व अर्थव्यवस्था में हमारे लिए अपना उचित एवं सम्मानजनक स्थान बनाना कठिन होगा. अमेरिका के आनेवाले ह्रास से लाभ उठाने की रणनीति बनानी चाहिए. इस रणनीति में तेल के गिरते दाम की महत्वपूर्ण भूमिका है.

तेल के दाम में गिरावट को उपभोक्ता को स्थानांतरित किया जा सकता है. फिलहाल सरकार ने इस गिरावट को उपभोक्ता को कम ही स्थानांतरित किया है. तेल पर टैक्स बढ़ाये हैं, यह सही पाॅलिसी है.

तेल के घरेलू दाम में कटौती करने से खपत बढ़ेगी, तेल का आयात बढ़ेगा और हम दूसरे देशों पर परावलंबित होते जायेंगे. अतः टैक्स बढ़ा कर तेल के घरेलू दाम अधिक बनाये रखने की नीति सही है. गड़बड़ी यह है कि टैक्स की इस रकम का उपयोग सरकारी घाटे पर नियंत्रण करने के लिए किया जा रहा है, जबकि इसका उपयोग भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए करना चाहिए. पश्चिमी देशों का वर्चस्व नयी तकनीकों पर टिका हुआ है. सरकार को चाहिए कि आधुनिक तकनीकों की खरीद को एक विशाल फंड बनाये और सभी क्षेत्रों की तकनीकों को खरीद कर घरेलू उद्यमियों को सस्ते दाम पर उपलब्ध कराये.

तेल के गिरते मूल्य में हम देश का भविष्य संवारने का स्वर्णिम अवसर प्रदान करते हैं. महंगे तेल की खरीद में व्यय की जा रही रकम का एक छोटा अंश हमें वापस मिलता है. जैसे हमने सऊदी अरब को 100 डाॅलर का पेमेंट महंगे तेल के लिए किया. इसमें से हमें पांच डाॅलर वापस मिलता है.

सऊदी अरब में काम कर रहे भारतवासियों को इस रकम से वेतन दिया जाता है और वे इसे स्वदेश भेजते हैं. तेल के दाम 100 डाॅलर से 30 डाॅलर तक गिरने से हम इस पांच डाॅलर से वंचित हो जायेंगे. लेकिन, हमें 70 डाॅलर की बचत होगी. हमें विचार करना चाहिए कि हम 70 डाॅलर की बचत करना चाहते हैं या पांच डालर अर्जित करना चाहते हैं.

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