विचारों की कब्र पर मूर्तियों की होड़

।। अखिलेश्वर पांडेय ।। (प्रभात खबर, जमशेदपुर) भारत में मूर्ति-निर्माण और मूर्ति-पूजा सदियों से चली आ रही है, लेकिन राजनीतिक फायदे के लिए मूर्तियों का इस्तेमाल इस वक्त जैसा हो रहा है, वैसा कभी नहीं हुआ. सरदार पटेल की राजनीतिक विरासत में सेंध लगा कर उस पर अपना हक जमाने की कोशिश के चलते नरेंद्र […]
।। अखिलेश्वर पांडेय ।।
(प्रभात खबर, जमशेदपुर)
भारत में मूर्ति-निर्माण और मूर्ति-पूजा सदियों से चली आ रही है, लेकिन राजनीतिक फायदे के लिए मूर्तियों का इस्तेमाल इस वक्त जैसा हो रहा है, वैसा कभी नहीं हुआ. सरदार पटेल की राजनीतिक विरासत में सेंध लगा कर उस पर अपना हक जमाने की कोशिश के चलते नरेंद्र मोदी उनकी विशाल मूर्ति बनवा रहे हैं. तो कांग्रेस पटेल को अपनी पार्टी का नेता बता कर यह मुद्दा मोदी से छीनना चाहती है.
इससे पहले भी कभी शिवाजी की बड़ी सी प्रतिमा लगा कर उनकी वीरता को सीमित अर्थो में बांधने की राजनीति की गयी, तो कभी बाबा भीमराव आंबेडकर को संविधान-निर्माता की जगह एक वर्ग का हितैषी बता कर प्रस्तुत किया गया. गांधीजी की मूर्तियां तो देश के कोने-कोने में हैं. चश्मे और लाठी के साथ उनकी मूर्तियों को उतनी ही आसानी से खड़ा कर दिया गया है, जितनी आसानी से बरगद के पेड़ के नीचे पत्थर को लाल सिंदूर लगा कर हनुमान की मूर्ति बना दी जाती है. गांधी जयंती और पुण्यतिथि पर उनकी साफ-सफाई हो जाती है, अन्यथा वर्ष भर वे उपेक्षित खड़ी रहती हैं.
कभी मूर्ति का चश्मा टूटता है, कभी उसके नीचे बैठ कर मदिरापान या जुए का खेल होता है. संसद भवन में गांधीजी की जो मूर्ति लगी है, उसके सामने खड़े होकर सांसद अपना विरोध, प्रदर्शन आदि करते हैं. इस सब में गांधीजी की विचारधारा कहां दबा दी जाती है, उसकी खोज-खबर लेने वाला कोई नहीं. किसी भी महान व्यक्ति की मूर्ति लगा कर उसके प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करना भावनात्मक अभिव्यक्ति का एक तरीका है,किंतु जब इसमें स्वार्थ जुड़ जाता है, तो यह तय है कि जिन विचारों और कर्मो से वह व्यक्ति महान कहलाया, उससे जनता को दूर करने की कोशिश हो रही है. भारत में मूर्तियों का इतिहास बहुत पुराना है. सिंधु घाटी सभ्यता के काल से मूतियों का वर्णन मिलता है.
इनसान जिज्ञासाओं का जवाब ढूंढ़ता रहता है, और जहां वह अनुत्तरित हो जाता है, या यह महसूस करता है कि मुझसे ज्यादा कोई शक्तिशाली, श्रेष्ठ शक्ति इस ब्रह्मांड में विद्यमान है, तो उसे पूजना शुरू कर देता है. मूर्तियों का राजनैतिक प्रयोजन भारत में तब प्रारंभ हुआ, जब यूरोप में पुनर्जागरण हुआ. पर दुख की बात तो यह है कि निराकार को साकार करने की जगह अब साकार को ‘पाषाणकार’ किया जाने लगा है. कई मूर्तियां तो महज राजनैतिक स्वार्थो के चलते बनायी जा रही हैं. किसके नेता की ज्यादा बड़ी मूर्ति बनती है, ऐसी अविचारित होड़ देश में चल रही है. भारत में गांधी, नेहरू, भगत सिंह, शास्त्री, पटेल, आंबेडकर आदि महापुरुषों की जितनी मूर्तियां लगी हैं, अगर सचमुच उनका कोई असर होता, तो आज देश में जो वैचारिक शून्यता की स्थिति बनी है, वह कभी नहीं होती. हमें इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने मूर्तियों को खड़ा कर उनके नीचे विचारों को दफन कर दिया है?
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