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नरेंद्र मोदी का ‘इंद्रजाल अभिराम’

मोदी का अमेरिका दौरा जबर्दस्त रूप से सफल रहा है. बावजूद इसके कि वहां के उद्योगपति और निवेशक भारत में उदारीकरण की प्रगति से संतुष्ट नहीं हैं, पर सबको उम्मीद है कि मोदी कोई रास्ता निकालेंगे. नरेंद्र मोदी बेहतरीन सेल्समैन की तरह विदेशी जमीन पर भारत का जादू जगाने में कामयाब हैं. पिछले साल सितंबर […]

मोदी का अमेरिका दौरा जबर्दस्त रूप से सफल रहा है. बावजूद इसके कि वहां के उद्योगपति और निवेशक भारत में उदारीकरण की प्रगति से संतुष्ट नहीं हैं, पर सबको उम्मीद है कि मोदी कोई रास्ता निकालेंगे.
नरेंद्र मोदी बेहतरीन सेल्समैन की तरह विदेशी जमीन पर भारत का जादू जगाने में कामयाब हैं. पिछले साल सितंबर में अमेरिका की यात्रा से उन्होंने जो जादू बिखेरना शुरू किया था, वह अभी तक हवा में है. उनकी राष्ट्रीय नीतियों को लेकर कई तरह के सवाल हैं, पर इसमें दो राय नहीं कि भारत के बाहर वे जहां भी गये, गहरी छाप छोड़ कर आये. उनकी ज्यादातर यात्राओं के दो हिस्से होते हैं. विदेशी सरकारों से मुलाकात और वहां के भारतवंशियों से बातें. भारतवंशियों के बीच जाकर वे सपनों के शीशमहल बनाते हैं, साथ ही देश की राजनीति पर चुटकियां लेते हैं, जिससे उनके विरोधी तिलमिलाता जाते हैं. उनका यह इंद्रजाल तकरीबन हरेक यात्रा के दौरान देखने को मिला है.
करीब दो करोड़ भारतवंशी बाहर रहते हैं. इनकी बड़ी तादाद मोदी-फैन है. पिछले साल सितंबर में न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वॉयर का उनका कार्यक्रम अनूठा था. अबकी बार सिलिकॉन वैली के आकाश पर उनका नाम था. न्यूयॉर्क, शंघाई, सिडनी से लेकर दुबई तक उनका जिस अंदाज में स्वागत किया गया उसका क्या कोई मतलब भी है? सोशल मीडिया पर उनकी फैन-फॉलोइंग बहुत बड़ी है. एक हद तक यह संभव है, पर जिस तरह से एनआरआइ भीड़ मोदी के स्वागत में निकलती है, वह अभूतपूर्व है. मोदी से पहले भी भारतीय नेता बाहर जाते रहे हैं. मोदी ने ऐसा क्या नया किया है, जिसके कारण विदेश में रहनेवाले भारतीय उनके दीवाने हैं?
साल 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव में प्रचार की शुरुआत करते हुए सोनिया गांधी ने मोदी को ‘मौत का सौदागर’ कहा था. पर 2015 आते-आते मोदी की छवि ‘सपनों का सौदागर’ की हो गयी. आलोचक मानते हैं कि मोदी की बातें हवाई हैं. उनके पास लच्छेदार बातें हैं और कुछ नहीं. पर यह भी सच है कि इसके पहले किसी भारतीय नेता ने ‘भव्य भारतवर्ष’ का नक्शा नहीं खींचा. कारोबारियों के पक्ष में इतना खुल कर कभी नहीं बोला. पिछले लोकसभा चुनाव के पहले विदेशी समाचार एजेंसी रायटर्स ने उनके समर्थकों के लिए एक नया शब्द गढ़ा ‘सायबर हिंदू.’ क्या विदेश में रहनेवाले भारतीय अतिशय राष्ट्रवाद के शिकार हैं? चुनाव जीतने के पहले अमेरिका में मोदी को वीजा नहीं मिल रहा था. ब्रिटिश साप्ताहिक ‘इकोनॉमिस्ट’ ने तो बाकायदा उन्हें हराने की अपील जारी की. बावजूद इसके विदेश में रहनेवाले भारतीय मोदी के भारी समर्थक थे और आज भी हैं. क्यों?
इसका सामाजिक विश्लेषण होता रहेगा. बहरहाल उनका अमेरिका दौरा जबर्दस्त रूप से सफल रहा है. बावजूद इसके कि वहां के उद्योगपति और निवेशक भारत में उदारीकरण की प्रगति से संतुष्ट नहीं हैं, पर सबको उम्मीद है कि मोदी कोई रास्ता निकालेंगे. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस यात्रा को मील का पत्थर बताया और कहा कि वैश्विक कंपनियां भारत में अपना कारोबार बढ़ाना चाहती हैं. खासतौर से सिलिकॉन वैली की यात्रा और ‘फॉर्च्यून 500’ कंपनियों के प्रमुखों से मुलाकात का प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर दिखना चाहिए. इसके अलावा यह दौरा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में सुधार, भारतवंशियों से मुलाकात, और ओबामा से लगभग एक साल में तीसरी मुलाकात के कारण याद किया जायेगा.
इस यात्रा के ठीक पहले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज एवं अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन कैरी के बीच पहली भारत-अमेरिका सामरिक और वाणिज्यिक वार्ता हुई. उसका संयुक्त वक्तव्य कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण है. अमेरिका ने दाऊद इब्राहिम की डी-कंपनी, जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा को आतंकवादी संगठन माना है. उसमें यह भी स्पष्ट किया है कि अमेरिका भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता दिलाने के लिए पूरा समर्थन देगा. दोनों देश एक-दूसरे के काफी करीब आ चुके हैं. शायद अब भारत की रूस से भी दूरी बढ़ेगी. चीन के साथ जो गर्मजोशी हाल में पैदा हुई थी, उसमें भी कमी आयेगी. उससे बचा भी नहीं जा सकता. पर क्या इन कोशिशों से भारतीय अर्थव्यवस्था की गति तेज होगी? इसका जवाब अगले दो-तीन साल में मिलेगा.
मोदी की इस यात्रा का एक हिस्सा संयुक्त राष्ट्र महासभा को समर्पित था. गरीबी के खिलाफ वैश्विक एजेंडा-2030 के कारण और विश्व के बदलते शक्ति-संतुलन के लिहाज से यह सत्र महत्वपूर्ण था. मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में सुधार का मुद्दा उठाते हुए स्पष्ट किया कि भविष्य में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभाना चाहेगा. शनिवार को उन्होंने जी-4 समूह की बैठक की मेजबानी की. इसमें जर्मनी, जापान और ब्राजील के नेता शामिल हुए. मोदी ने बराक ओबामा और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना और जी-4 के नेताओं के अलावा फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलां, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन, श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेना, मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल सीसी, संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून समेत कई वैश्विक नेताओं से मुलाकात की. ओबामा के साथ बैठक में आतंकवाद एवं जलवायु परिवर्तन पर चर्चा हुई. आतंकवाद पर चर्चा के दौरान पाकिस्तान का भी जिक्र हुआ.
महासभा की सामान्य चर्चा 30 सितंबर को है, जिसमें संभवतः नवाज शरीफ कश्मीर का सवाल उठायेंगे. इसके पहले वे संयुक्त राष्ट्र महासचिव से अनुरोध कर चुके हैं कि कश्मीर में जनमत संग्रह कराया जाये. महासभा के इस सत्र में भारत ने पाकिस्तान की पूरी उपेक्षा की. सत्र के हाशिये पर दोनों प्रधानमंत्रियों की मुलाकात भी नहीं हुई. कई मायनों में भारतीय विदेश नीति की रीति-नीति में बुनियादी बदलाव है. पिछले साल अगस्त में भारत ने विदेश सचिव स्तर की वार्ता रद्द करके हुर्रियत के बारे में नया बेंचमार्क तय किया था. यह बेंचमार्क 24 अगस्त को सुरक्षा सलाहकारों की बैठक रद्द होने का कारण बना. मोदी की विदेश यात्राएं ‘फीलगुड’ बना रही हैं, पर असली परीक्षा देश के भीतर है. उनके विरोधी मानते हैं कि ‘वाग्जाल’ टूट रहा है. पहले पायदान पर है बिहार विधानसभा चुनाव. क्या फीलगुड विदेश नीति चुनाव जिता सकती है? वोटर जवाब देगा…
प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार
pjoshi23@gmail.com
Prabhat Khabar Digital Desk
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