आखिर जायें तो जायें कहां...

Published at :12 Sep 2015 1:24 AM (IST)
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आखिर जायें तो जायें कहां...

सुरेश कांत व्यंग्यकार एक भाई सुबह-सुबह एक गाने में पूछ रहा था कि जायें तो जायें कहां? मुझे बड़ा शॉक लगा. आश्चर्य हुआ कि आज हो क्या गया है लोगों को? क्यों यह भाई इतनी सुबह-सुबह कहीं जाना चाहता है और अगर जाना ही चाहता है, तो चला जाये, गा-गाकर लोगों को हलकान क्यों कर […]

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सुरेश कांत

व्यंग्यकार

एक भाई सुबह-सुबह एक गाने में पूछ रहा था कि जायें तो जायें कहां? मुझे बड़ा शॉक लगा. आश्चर्य हुआ कि आज हो क्या गया है लोगों को? क्यों यह भाई इतनी सुबह-सुबह कहीं जाना चाहता है और अगर जाना ही चाहता है, तो चला जाये, गा-गाकर लोगों को हलकान क्यों कर रहा है?

वह भी इतनी जोर-जोर से. कहीं ऐसा तो नहीं कि इसे बहुत जोर की लगी हो और यह पाकिस्तान जाना चाहता हो और इसका पाकिस्तान फिलहाल खाली न हो, और यह बेचारा परेशान होकर पूछ रहा हो कि किसी पड़ोसी का पाकिस्तान खाली हो, तो यह वहां चला जाये!

कमलेश्वर ने शायद ऐसे ही किन्हीं दुर्दम्य क्षणों में अपना उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ लिखा होगा. पता नहीं, उस भाई की जिज्ञासा का कोई समाधान निकला या नहीं और अगर निकला, तो किस पाकिस्तान में जाकर निकला, पता नहीं.

क्योंकि तभी खबरें आने लगीं, जिनमें कोई गरज-गरज कर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को कभी योग न करने पर तो कभी अपने को व्यापक अर्थों में हिंदू न समझने पर या तो दरिया में जाकर डूब मरने को कह रहा था या फिर उन्हें पाकिस्तान भाग जाने का मशवरा दे रहा था. तब मुझे फौरन समझ में आ गया कि रेडियो पर गानेवाले क्यों उस तरह से गा रहे थे! क्यों कोई कह रहा था कि चल दरिया में डूब जायें… और क्यों कोई पूछ रहा था कि जायें तो जायें कहां…

जरूर वे इन धर्म के ठेकेदारों से डर गये होंगे. लेकिन हालत तो मेरी भी उन जैसी ही है. वे व्यापक अर्थों में हिंदू नहीं हो पाते, मैं संकुचित अर्थों में नहीं हो पाता. योग के सार्वजनिक आयोजन को भी मैं महंगाई, रोजी-रोटी और भ्रष्टाचार के मूल मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने की कवायद समझता हूं.

मैं विधर्मियों अर्थात् दूसरे धर्म वालों को देख ख्वामख्वाह नफरत से नहीं भर जाता और उनके खिलाफ दंगों में शामिल नहीं हो पाता.

कुछ वर्ष पहले जब मैं भारतीय स्टेट बैंक, मुंबई में हिंदी विभाग का ऑल इंडिया इनचार्ज था, तो एक बार चेन्नई में हमारा एक अधिकारी मुझे एक शिव-मंदिर दिखाने तो ले गया, पर मेरे साथ अंदर नहीं गया, बल्कि एक विधर्मी की तरह बाहर ही बैठा रहा, क्योंकि वह वैष्णव था. और आप मुसलमानों को विधर्मी कहते हैं!

मैं तो मुसलमानों को विधर्मी नहीं कह पाता. और ऐसा करनेवाला मैं अकेला नहीं हूं. अपने देश से अत्यधिक प्यार करने के बावजूद आपकी नजर में तो हम भी देशद्रोही ही होंगे. तो फिर हम कहां जायें, जरा यह भी तो बता दिया होता िक… मुहब्बत हो गयी जिनको वो दीवाने कहां जायें…

चाहे कुछ भी हो मुसलमान भाइयों, तुम लोग हमसे ज्यादा खुशकिस्मत हो. धर्म के ठेकेदारों ने तुम्हारे लिए कम-से-कम पाकिस्तान ही सही, कोई जगह तजवीज तो की है. लेिकन हमें तो यह भी नहीं पता कि हमें कहां जाना पड़ेगा. कहीं दुनिया-जहान से ही तो नहीं जाना पड़ जायेगा!

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