शिक्षक दिवस पर
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :05 Sep 2015 12:44 AM (IST)
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शिक्षक दिवस के पावन अवसर पर महात्मा गांधी के ये शब्द बहुत प्रासंगिक हैं कि लोकतंत्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए तथ्यों के ज्ञान से अधिक आवश्यक उचित शिक्षा की व्यवस्था है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संदेश में कहा है कि माता हमें जन्म देती है और शिक्षक जीवन प्रदान करता है. […]
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शिक्षक दिवस के पावन अवसर पर महात्मा गांधी के ये शब्द बहुत प्रासंगिक हैं कि लोकतंत्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए तथ्यों के ज्ञान से अधिक आवश्यक उचित शिक्षा की व्यवस्था है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संदेश में कहा है कि माता हमें जन्म देती है और शिक्षक जीवन प्रदान करता है. उन्होंने छात्र-शिक्षक के परस्पर संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि छात्र अपने शिक्षक का प्रतिनिधित्व करता है, क्योंकि वह एक ऐसा चित्र है, जिसे उसका शिक्षक उकेरता है. शिक्षा मनुष्य के पूर्ण व्यक्तित्व को गढ़ती है और उसी आधार पर हम अपने जीवन, परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व को बेहतर स्वरूप प्रदान करने की कोशिश करते हैं.
हालांकि, सरकारें शिक्षा के महत्व को बखूबी समझती हैं और उसे समाज के हर तबके तक पहुंचाने का प्रयास भी कर रही हैं, लेकिन हमारी शिक्षा-व्यवस्था अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं कर सकी है. शिक्षा में साक्षरता, कौशल, प्रशिक्षण, शोध आदि जैसे कई तत्व होते हैं और स्वतंत्रता-प्राप्ति के सात दशकों के बाद भी इन श्रेणियों में हम दुनिया के मुख्य विकासशील राष्ट्रों की सूची में पीछे हैं.
वर्ष 2013-14 में किये गये श्रम ब्यूरो के वार्षिक सर्वेक्षण में बताया गया था कि 15 वर्ष की आयु से अधिक के मात्र 6.8 फीसदी लोगों को ही पेशेवर प्रशिक्षण मिला है या मिल रहा है. इनमें सिर्फ 2.8 फीसदी को ही औपचारिक प्रशिक्षण मिला है, जबकि शेष चार फीसदी को अनौपचारिक प्रशिक्षण दिया गया है.
इस सर्वेक्षण में एक चिंताजनक तथ्य यह है कि प्रशिक्षण प्राप्त 39 फीसदी महिलाएं श्रमशक्ति से नहीं जुड़ सकीं हैं. इसका कारण राष्ट्रीय सैंपल सर्वे के अध्ययन में है, जिसमें पाया गया कि 47 फीसदी ग्रामीण और 32 फीसदी शहरी महिलाओं को जो प्रशिक्षण मिला, वह रोजगार के लिए अनुपयोगी था. भारत सरकार ने महत्वाकांक्षी कौशल विकास कार्यक्रम के तहत 2022 तक 40.2 करोड़ कामकाजी लोगों को कौशलयुक्त करने का लक्ष्य रखा है.
यह एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के एक आकलन के अनुसार तब तक देश में कामकाजी लोगों की संख्या 60 करोड़ तक हो सकती है. शिक्षा की स्थिति पर हर वर्ष जारी होनेवाली असर रिपोर्ट के अनुसार विद्यालयों में पढ़नेवाले 50 फीसदी बच्चों की शिक्षा का स्तर उनकी कक्षा के अनुरूप नहीं है.
शिक्षकों के समुचित प्रशिक्षण का अभाव हमारी शिक्षा व्यवस्था की बड़ी खामी है. विद्यालयों में शैक्षणिक संसाधनों की बड़ी कमी है. उच्च शिक्षा की स्थिति इससे बहुत अलग नहीं है. पिछले कुछ वर्षो में ऐसे कई आकलन सामने आये हैं, जिनमें कहा गया है कि 60 से 80 फीसदी स्नातक रोजगार के योग्य ही नहीं हैं. इनमें इंजीनियरिंग और अन्य विशेषज्ञता प्राप्त छात्र भी शामिल हैं.
इस निराशाजनक परिदृश्य का दूसरा पहलू बच्चों का नामांकन के बाद स्कूल छोड़ देने की समस्या है. यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, प्राथमिक शिक्षा पा रहे 20 करोड़ बच्चों में आठ करोड़ बीच में पढ़ाई छोड़ देते हैं. हमारे देश में छह से 14 वर्ष आयु के 40 फीसदी बच्चे अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी नहीं करते हैं. इनके अलावा करीब 60 लाख बच्चे ऐसे हैं, जो कभी स्कूल ही नहीं जाते.
आम तौर पर ये बच्चे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े तबके से आते हैं. देश के विकास और आर्थिक सामथ्र्य के लिए शिक्षा व्यवस्था में महती सुधार की आवश्यकता है. केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा इस मसले को पूरी गंभीरता और त्वरा के साथ प्राथमिकता देने की जरूरत है.
इसकी शुरुआत सरकारी स्कूलों और कॉलेजों से ही करनी होगी. सरकारी विद्यालयों की दुर्व्यवस्था जगजाहिर है. कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय को यह निर्देश तक जारी करना पड़ा था कि सभी सरकारी अधिकारी और कर्मचारी अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में ही पढ़ायें. सरकारी लापरवाही के कारण लचर हुई शिक्षा-व्यवस्था के कारण ही निजी शिक्षण संस्थाओं की पूरे देश में बाढ़-सी आ गयी है. इन संस्थानों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की भी कोई प्रणाली नहीं है.
उचित सुविधाओं के अभाव में सरकारी विश्वविद्यालयों से बड़ी संख्या में अध्यापक निजी विश्वविद्यालयों का रुख कर रहे हैं. बहरहाल, सरकार और समाज के साथ शिक्षा की बेहतरी की जिम्मेवारी शिक्षकों के कंधे पर ही है. उन्हें इस उत्तरदायित्व को पूरी गंभीरता के साथ समझने की जरूरत है. साथ ही, सरकार को उन्हें उचित प्रशिक्षण और संसाधन मुहैया कराने में कोर-कसर बाकी नहीं छोड़नी चाहिए.
प्रधानमंत्री ने शिक्षकों को अपने अनुभवों को लिखने का आह्वान किया है, जिससे उनसे अन्य लोगों को भी सीखने-समझने का अवसर मिलेगा. उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षक कभी अवकाश-प्राप्त नहीं होता. उम्मीद है कि शिक्षक दिवस हमारे देश में शिक्षा की नयी क्रांति का एक मौका बनेगा.
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