भ्रूण हत्या रोकने आगे आए नारी
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :03 Sep 2015 11:18 PM (IST)
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हमारे समाज में बेटियों के जन्म पर मातम-सा माहौल छा जाता है. कहीं-कहीं तो बेटी के जन्म पर घर में चूल्हा तक नहीं जलाया जाता है.जिस नारी ने बेटी को जन्म दिया, उसकी प्रताड़ना की तो खैर कोई पराकाष्ठा ही नहीं है. बेटियों के जन्म के बाद उसे जिस वेदना का सहन करना पड़ता है, […]
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हमारे समाज में बेटियों के जन्म पर मातम-सा माहौल छा जाता है. कहीं-कहीं तो बेटी के जन्म पर घर में चूल्हा तक नहीं जलाया जाता है.जिस नारी ने बेटी को जन्म दिया, उसकी प्रताड़ना की तो खैर कोई पराकाष्ठा ही नहीं है.
बेटियों के जन्म के बाद उसे जिस वेदना का सहन करना पड़ता है, वह प्रसव पीड़ा से भी ज्यादा भयानक और कष्टकर होता है. यह पीड़ा जीवनभर उसका पीछा नहीं छोड़ती.
इन सबके बीच एक बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि क्या बेटियां सही मायने में हमारे समाज के लिए अभिशाप हैं? अगर अभिशाप हैं, तो फिर समाज में उसकी जरूरत क्यों महसूस की जाती है?
जिस बेटी के जन्म पर नारी को प्रताड़ित किया जाता है, क्या नारी के बिना किसी पुरुष की उत्पत्ति संभव है? आज वंशबेल को बढ़ाने के लिए कोख में ही बेटियों के भ्रूण की हत्या की जा रही है. उन्हें ऐसे मारा जाता है, जैसे इस संसार में उनकी कोई जरूरत ही नहीं है.
आज देश-दुनिया में की जा रही भ्रूण हत्या का ही नतीजा है कि संसार में प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है. देश के कई राज्यों में पुरुषों को अपना जीवन बिना किसी जीवनसंगिनी के ही गुजारना पड़ रहा है या फिर उन्हें गरीब और समाज में दबे-कुचले लोगों की बेटियों को खरीदना पड़ रहा है.
समाज की इसी विद्रूपता को देख कर सरकार की ओर बेटी बचाओ अभियान चलाया जा रहा है और सरकार की ओर से हर प्रकार की पहल की जाती रही है.
आज इस प्रकार के अभियान में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को अपनी अधिक भागीदारी निभाने की जरूरत है, क्योंकि अगर वे अपनी बेटियों को संसार में लाने के लिए ठान लेंगी, तो दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें रोक नहीं सकती. जरूरत उन्हें अपना कदम आगे बढ़ाने की है.
कुमुद राठौड़, दिल्ली
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