श्रमिकों की हड़ताल
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :03 Sep 2015 12:14 AM (IST)
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गत स्वतंत्रता दिवस पर अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, ‘शासन व्यवस्था की सार्थकता इस बात में है कि हमारी व्यवस्थाएं, हमारे संसाधन, हमारी योजनाएं, हमारे कार्यक्रम गरीबों के कल्याण के लिए किस प्रकार से उपयोग आते हैं.’ साथ ही, ‘श्रमिकों का सम्मान और गौरव हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य और स्वभाव होना चाहिए.’ […]
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गत स्वतंत्रता दिवस पर अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, ‘शासन व्यवस्था की सार्थकता इस बात में है कि हमारी व्यवस्थाएं, हमारे संसाधन, हमारी योजनाएं, हमारे कार्यक्रम गरीबों के कल्याण के लिए किस प्रकार से उपयोग आते हैं.’
साथ ही, ‘श्रमिकों का सम्मान और गौरव हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य और स्वभाव होना चाहिए.’ लेकिन, देश के 11 ट्रेड यूनियनों की देशव्यापी हड़ताल संकेत देती है कि देश के श्रमिकों के मन में सरकारी नीतियों को लेकर कुछ आशंकाएं हैं. हालांकि इस हड़ताल से देशभर में करोड़ों लोगों को हुई व्यापक परेशानियों, कई जगह हड़ताल समर्थकों एवं विरोधियों के बीच झड़पों और तोड़फोड़ से हुए नुकसान की भरपाई नहीं हो पायेगी.
इसलिए यूनियनों को इस बात पर गौर करना चाहिए कि क्या उनके पास विरोध का यही एक तरीका था? श्रमिक संगठनों का कहना है कि अगर प्रस्तावित नया श्रम कानून लागू हो जाता है तो देश के 67 फीसदी उद्योग श्रम कानून के दायरे से बाहर हो जाएंगे और श्रमिकों के सामाजिक सुरक्षा के रास्ते बंद हो जाएंगे.
उनकी मांगों में न्यूनतम मजदूरी बढ़ा कर 15 हजार रुपये करना, ठेका मजदूरों को समकक्ष नियमित कर्मियों के बराबर वेतन देना और सामाजिक सुरक्षा बढ़ाना शामिल हैं. पर, तथ्य यह भी है कि ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधियों की शुक्रवार को मंत्री समूह के साथ हुई बैठक में केंद्र सरकार ने उनकी ज्यादातर मांगों पर विचार करने का वादा किया था.
इस बैठक के बाद आरएसएस से जुड़े भारतीय मजदूर संघ ने हड़ताल से हटने का ऐलान करते हुए कहा था कि ‘सरकार ने न्यूनतम मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा बढ़ाने, बोनस में वृद्धि करने तथा श्रम सुधारों की प्रक्रिया में श्रमिक संघों को उचित प्रतिनिधित्व देने का वादा करके पहली बार कुछ सकारात्मक कदम उठाये हैं, इसलिए उसे अपने वादों को पूरा करने के लिए कम-से-कम छह माह का समय दिया जाना चाहिए.’ जाहिर है, आश्वासनों के बाद भी कांग्रेस और वाम दलों से जुड़े ट्रेन यूनियनों का हड़ताल पर जाना यह भी संकेत करता है कि वे राजनीतिक कारणों से भी सरकार का विरोध कर रहे हैं.
कहने की जरूरत नहीं कि ऐसा कोई भी संकेत विदेशी निवेशकों के मन में भारत में निवेश के प्रति आशंका पैदा करेगा, जिसका सीधा असर देश के विकास पर पड़ेगा. इसलिए सरकार को जहां श्रमिकों की चिंताओं के उचित समाधान के लिए गंभीरता से सोचना चाहिए, वहीं श्रमिक संगठनों को भी अपनी मांगों की सूची तैयार करते समय बदलते वक्त की जरूरत और देश हित का जरूर ध्यान रखना चाहिए.
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