राजभाषा का कालसर्प योग!

Published at :28 Sep 2013 3:24 AM (IST)
विज्ञापन
राजभाषा का कालसर्प योग!

।।डॉ बुद्धिनाथ मिश्र।।(वरिष्ठ साहित्यकार) जिन दिनों हिंदू समाज के आस्तिक लोग ‘पितृपक्ष’ मना कर अपने पितरों का तर्पण करते हैं, लगभग उन्हीं दिनों भारत सरकार के कार्यालयों में कर्मचारीगण राजभाषा सप्ताह या पखवाड़ा मना कर ‘हिंदी माता’ को पवित्र गोमाता की तरह पूजते हैं. जिन कार्यालयों में साल भर हिंदी की फाइलें धूल फांकती रहती […]

विज्ञापन

।।डॉ बुद्धिनाथ मिश्र।।
(वरिष्ठ साहित्यकार)

जिन दिनों हिंदू समाज के आस्तिक लोग ‘पितृपक्ष’ मना कर अपने पितरों का तर्पण करते हैं, लगभग उन्हीं दिनों भारत सरकार के कार्यालयों में कर्मचारीगण राजभाषा सप्ताह या पखवाड़ा मना कर ‘हिंदी माता’ को पवित्र गोमाता की तरह पूजते हैं. जिन कार्यालयों में साल भर हिंदी की फाइलें धूल फांकती रहती हैं, हिंदी स्टाफ दो रुपये की चीज के लिए भी जिस-तिस के सामने चिरौरी करते फिरते हैं, वहां भी हिंदी के बैनर तले हजारों-लाखों का ‘कथा-प्रसाद’ हो जाता है. हिंदी में कोई काम हो न हो, मगर राजभाषा सप्ताह या पखवाड़ा (दक्षिण भारत में इसे जान-बूझ कर या उच्चारण दोषवश ‘राजभाषा पकौड़ा’ कहते हैं!) पूरे उत्साह से मनाया जाता है. साल भर हिंदी के कार्य में कुंभकर्ण की तरह सोया हुआ कार्यालय भी इन दिनों अपने गेट पर बड़े-बड़े बैनर टांग देता है. इस वर्षकृत्य में घिसी-पिटी प्रतियोगिताएं होती हैं, जिनमें गिने-चुने कर्मचारी भाग लेते हैं. ये पुरस्कार कर्मचारियों के हिंदी ज्ञान के पारितोषिक कम, दीन-हीन हिंदी अनुभाग द्वारा चिरौरी के तौर पर दिये गये उपहार ज्यादा लगते हैं.

केंद्र सरकार ने प्रारंभ में अंगरेजी में काम करने के अभ्यस्त कार्मिकों को हिंदी में काम करने की आदत डालने के लिए इस प्रकार की हिंदी प्रतियोगिताओं की शुरुआत की थी, क्योंकि उसकी नीति प्रेरणा और प्रोत्साहन से राजभाषा का प्रचार-प्रसार करने की थी. लेकिन 60 वर्षो के बाद भी यदि कार्मिक एक ओर हिंदी के पुरस्कार लेते रहे और दूसरी ओर अंगरेजी फाइलों की नकल करते रहे, तो इन प्रतियोगिताओं के औचित्य पर, खास कर हिंदीभाषी राज्यों में, पुनर्विचार जरूरी है. जिस बच्चे को हम गोद में लेकर दुलार करते हैं, वह अगर साठ साल का होकर भी गोद से उतरना न चाहे, तब आप क्या करेंगे? हिंदीतरभाषी राज्यों में समय-समय पर ऐसी प्रतियोगिताओं की थोड़ी-बहुत सार्थकता हो सकती है, मगर जब हिंदीभाषी राज्यों के केंद्रीय कार्यालयों और सार्वजनिक उपक्रमों में हिंदीभाषी कर्मचारी भाषण, शब्दार्थ, टिप्पणी या निबंध प्रतियोगिता में भाग लेते हैं और बड़े-बड़े पुरस्कार उठा कर घर ले जाते हैं, तब उन्हें ग्लानि क्यों नहीं होती? जो कर्मचारी दो दशकों से निबंध या भाषण या नोटिंग-ड्राफ्टिंग की प्रतियोगिता लगातार जीत रहे हैं, उन्हें हिंदी में काम करते समय सांप क्यों सूंघ जाता है? वे अपने विभाग का एक छोटा-सा सकरुलर भी हिंदी में तैयार करने का बीड़ा क्यों नहीं उठाते? यही नहीं, जिन हिंदीतरभाषी कर्मचारियों ने सरकार की उदार हिंदी शिक्षण योजना का लाभ उठा कर कार्यालय के समय में और उसके खर्च पर ‘प्राज्ञ’ (हाई स्कूल के स्तर का हिंदी ज्ञान) परीक्षा पास की और बदले में प्रोत्साहन राशि और वेतनवृद्धि भी पायी, वे भी हिंदी का काम आने पर क्यों साफ मना कर देते हैं? ऐसे लोगों से कब तक ‘प्रेरणा और प्रोत्साहन’ से हिंदी में काम करने की अपेक्षा की जायेगी? वस्तुस्थिति यह है कि हिंदी की परीक्षा देकर प्रोत्साहन राशि व वेतनवृद्धि पानेवाले हिंदीतरभाषी कर्मचारियों की तीन-तीन पीढ़ियां रिटायर हो गयीं, बिना एक अक्षर हिंदी में काम किये. लेकिन सरकारी कार्यालयों में वैसी ही हिंदी कक्षाएं चल रही हैं, वैसे ही हिंदी प्रतियोगिताएं हो रही हैं.

हिंदी समारोहों की स्थिति भी दयनीय है. हिंदी अधिकारी सामान्यत: डबल एमए होते हैं, पर वे विद्वान नहीं माने जाते, न कार्यालय में, न समाज में, इसलिए इन समारोहों के मुख्य वक्ता सामान्यत: कॉलेजों के हिंदी प्राध्यापक बनाये जाते हैं, जिन्हें राजभाषा या प्रयोजन-मूलक हिंदी का कोई ज्ञान नहीं होता. सो, वे जोगड़े इस समारोह को भी अपनी क्लास की तरह सूर-तुलसी और अज्ञेय-मुक्तिबोध पढ़ा कर चले जाते हैं. इन पखवाड़ों में आयोजित ‘हास्य कवि सम्मेलन’ भी राजभाषा के विकास के लिए तय बजट का दुरुपयोग ही है. यह राशि साधक कवियों पर खर्च होनी चाहिए; न कि हास्य कवियों पर, जो भाषा और कविता का विकृत रूप पेश करते हैं. मगर, भाषा-साहित्य के संस्कारों से दूर बड़े साहब उन कवियों को बुलाने का हुक्म देते हैं, जो उन्हें लतीफे सुना कर हंसा सकें.

14 सितंबर ‘राजभाषा दिवस’ है, न कि ‘हिंदी दिवस’. 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने भारत संघ की राजभाषा संबंधी अनुच्छेद 343 को पारित किया था, जिसमें केंद्र सरकार के कार्यालयों में ‘देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी’ और ‘भारतीय अंकों के अंतरराष्ट्रीय रूप’ में राजकाज करने का प्रावधान था. हिंदी केवल भारत सरकार और दस हिंदीभाषी प्रदेशों की राजभाषा है. अन्य प्रदेशों की राजभाषा वहां की क्षेत्रीय भाषा है, जैसे बंगाल की बंगला और तमिलनाडु की तमिल है. होना तो यह चाहिए था कि इन राज्यों की सरकारें भी 14 सितंबर को ‘राजभाषा दिवस’ मनातीं, मगर उनका इस ओर कोई ध्यान नहीं है. जिस दिन हिंदी को संघ की राजभाषा मनोनीत किया गया, उसी दिन देश की अन्य प्रमुख भाषाओं को आठवीं अनुसूची में ‘राष्ट्रीय भाषाएं’ कह कर सम्मानित किया गया था. राष्ट्रीय भाषाओं की संख्या 22 हो गयी है.

साहित्यिक भाषा के रूप में हिंदी हजारों वर्षो से पूरे भारत में मौजूद है. उसे किसी प्रोत्साहन की जरूरत नहीं है. वह समस्त भारतीय भाषाओं का साझा साहित्यिक मंच न जाने कब से बनी हुई है. हर क्षेत्रीय भाषा के साहित्यकार की हार्दिक इच्छा होती है कि उसकी रचना का अनुवाद हिंदी में हो, जिससे पूरे देश की जनता उसे पढ़ सके. हिंदी को देश के दस राज्यों की राजभाषा के रूप में भी प्रोत्साहन की जरूरत नहीं है. हिंदी पर कालसर्प योग तब लगता है, जब वह केंद्र की राजभाषा बनना चाहती है. संविधान में उसे ‘होगी’ कह कर जो 1949 में 15 वर्षो के लिए टरकाया गया था, वह आज भी लागू है. जब तक राज्य विधेयक पारित कर उसे ‘केंद्र की राजभाषा’ न मान लें, तब तक वह संविधान में उसी ‘होगी’ की टंगनी पर भीगी साड़ी की तरह टंगी रहेगी (भले ही बहुराष्ट्रीय कंपनियां और विदेशी चैनल उसे भारत के बाजार की भाषा मान चुके हों).

आज का कटु यथार्थ यह है कि करोड़ों रुपये हर साल कर्मचारियों के निमित्त हिंदी प्रोत्साहनों और राजभाषा समारोहों पर खर्च करने के बावजूद केंद्र सरकार के कार्यालयों में हिंदी कामकाज की भाषा नहीं बन पायी है, जबकि उसी के आसपास स्थित राज्य सरकार के कार्यालयों में शत-प्रतिशत काम हिंदी में होता है. जाहिर है, जब तक राजभाषा के नाम पर उत्सव और दिखावा होता रहेगा और शीर्ष अधिकारी साल में एक दिन राजभाषा दिवस पर उपदेश देने के बजाय साल भर अपने आचरण से निरंतर निचले कार्मिकों को प्रेरित नहीं करेंगे, तब तक केंद्रीय कार्यालयों, राष्ट्रीयकृत बैंकों और सार्वजनिक उपक्रमों में इसी तरह ‘राजभाषा पकौड़े’ छनते रहेंगे.

विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola