महंगे ईंधन से मुक्ति दिलायेगी सौर शक्ति

सौर ऊर्जा
Solar power : भारत इंटरनेशनल सोलर अलायंस का नेतृत्व करता है, जो 120 से अधिक धूप-समृद्ध देशों का समूह है. वर्ष 2025 में भारत ने 38 गीगावॉट नयी सौर क्षमता जोड़ी, जो 35 गीगावॉट जोड़ने वाले अमेरिका से अधिक है.
Solar power : जब पश्चिम एशिया के आसमान में मिसाइलें भर जाती हैं, तब उनके झटके हर घर के बिजली और पेट्रोल बिल तक पहुंचते हैं. इस संकट ने भारत की उस कमजोरी को उजागर कर दिया है, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का उपभोक्ता है, और अपनी जरूरत का लगभग 89 प्रतिशत आयात करता है. यानी हर साल लगभग 1.75 अरब बैरल या हर दिन करीब 48 लाख बैरल. इसमें से 60 प्रतिशत से अधिक भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील होर्मुज से आता है. वर्ष 2024-25 में भारत का कच्चे तेल का आयात बिल 137 अरब डॉलर था. अगर कीमतें मार्च के औसत 113.57 डॉलर पर बनी रहती हैं, तो यह आयात बिल 200 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है.
कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की वृद्धि देश के आयात बिल में 14 से 16 अरब डॉलर जोड़ देती है. यह परिष्कृत तेल उन ट्रकों में जाता है, जो सामान ढोते हैं, उन ट्रैक्टरों में जाता है, जो खेत जोतते हैं, और उन मछली पकड़ने वाली नौकाओं में जाता है, जो तटीय समुदायों का पेट भरती हैं. यह डीजल जनरेटरों को चलाता है, जो ग्रामीण भारत में दूरसंचार टावरों को चालू रखते हैं. इस निर्भरता को कम करने का एक तरीका है. भारत एक ऐसा देश है, जहां साल में 300 से अधिक दिन तेज धूप रहती है. हमने अभी-अभी अप्रैल के तपते सप्ताह को देखा. धरती के 20 सबसे गर्म स्थानों में से 19 भारत में थे. पर जलवायु का बोझ सौर ऊर्जा का ऐतिहासिक अवसर भी है.
भारत इंटरनेशनल सोलर अलायंस का नेतृत्व करता है, जो 120 से अधिक धूप-समृद्ध देशों का समूह है. वर्ष 2025 में भारत ने 38 गीगावॉट नयी सौर क्षमता जोड़ी, जो 35 गीगावॉट जोड़ने वाले अमेरिका से अधिक है. कुल स्थापित सौर क्षमता अब 150 गीगावॉट से अधिक हो गयी है. अप्रैल की भीषण गर्मी की लहर के दौरान जब तापमान 40 डिग्री के पार चला गया, तब बिजली ग्रिड ने अपनी अब तक की सबसे अधिक मांग 256 गीगावॉट का सामना किया. तब अकेले सौर ऊर्जा 81 गीगावॉट बिजली पैदा कर रही थी. यह कुल राष्ट्रीय उत्पादन का एक-तिहाई था. सौर ऊर्जा की क्षमता स्वच्छ ऊर्जा तक सीमित नहीं है, यह हमारे विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा का भी साधन है. तेल आयात पर निर्भरता में केवल 10 फीसदी की कमी भी हर साल 13 से 20 अरब डॉलर की बचत कर सकती है. सौर ऊर्जा से चलने वाले बिजली के डीजल जनरेटरों की जगह लेने, इलेक्ट्रिक पंपों से डीजल पंपों को बदलने, और इलेक्ट्रिक वाहनों से पेट्रोल-डीजल की मांग कम करने से अगर 10 करोड़ बैरल का प्रतिस्थापन हो, तो भी सालाना 7.5 से 11 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा बचायी जा सकती है.
भारत एक ऊर्जा निर्यातक भी बन सकता है. अगर सौर ऊर्जा और विद्युतीकरण घरेलू ईंधन खपत को धीरे-धीरे कम करते हैं, तो भारत द्वारा रिफाइन किया गया अधिक से अधिक ईंधन विदेश जायेगा, जिससे कीमती डॉलर मिलेंगे. भारत कच्चा तेल आयात करेगा, उसे अधिक कुशलता से रिफाइन करेगा और मूल्य-वर्धित ईंधन निर्यात करेगा. अगर इस दिशा में दृढ़ता से आगे बढ़ा जाये, तो भारत ऊर्जा आयातक से शुद्ध ऊर्जा मूल्य निर्यातक बन सकता है. बेशक सौर यात्रा में बाधाएं हैं. सौर पैनलों के लिए बड़े भूभाग की जरूरत होती है. जिस देश में खेती योग्य भूमि सीमित और विवादित है, वहां यह एक वास्तविक समस्या है. इसका समाधान बंजर भूमि, छतों, राजमार्गों के किनारे और नहरों के किनारे सौर पैनल लगाने में है. भारत के पास इन सभी के लिए पहले से कार्यक्रम हैं.
सौर पैनलों को साफ रखने के लिए पानी की जरूरत होती है, खासकर राजस्थान और गुजरात में, जहां सौर क्षमता सबसे अधिक है, लेकिन पानी की कमी है. बिना पानी के रोबोटिक पैनल क्लीनर इसका उभरता हुआ समाधान हैं. इनका बड़े पैमाने पर घरेलू स्तर पर निर्माण होना चाहिए. बिना भंडारण के सौर ऊर्जा की एक संरचनात्मक सीमा है. भारत को बड़े पैमाने पर स्टोरेज सिस्टम लगाने की तत्काल जरूरत है. वर्ष 2025 में भारत ने 2.3 टेरावाॅट घंटे स्वच्छ सौर ऊर्जा केवल इसलिए गंवा दी, क्योंकि ग्रिड उसे संभाल नहीं सका. यह इंजीनियरिंग और आर्थिक, दोनों तरह की विफलता है. फिर चीन की समस्या भी है. भारत अपने अधिकांश सौर पैनल और उपकरण चीन से आयात करता है, जिससे व्यापार असंतुलन बढ़ता है. हालांकि, घरेलू सौर मॉड्यूल निर्माण क्षमता बढ़कर 172 गीगावॉट हो गयी है. सरकार ने 2028 तक घरेलू स्तर पर सौर सेल और वेफर उत्पादन का लक्ष्य रखा है. ऐसा देश, जो अपने सौर उपकरण खुद बनाता है, वास्तव में ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर होगा.
इसके लिए पांच प्रमुख कदम हैं. पहला यह कि सौर ऊर्जा को राष्ट्रीय सुरक्षा के बुनियादी ढांचे के रूप में देखा जाये, जिसकी प्राथमिकता रक्षा के बराबर हो. इसके लिए फंडिंग कम से कम दोगुनी होनी चाहिए. दूसरे, बैटरी स्टोरेज में तत्काल और बड़े पैमाने पर निवेश किया जाये. नहीं तो हर शाम ग्रिड फिर कोयला और डीजल पर निर्भर हो जायेगा. तीसरा यह कि राष्ट्रीय ट्रांसमिशन ग्रिड को उन्नत किया जाये. राजस्थान और गुजरात जैसे सौर-समृद्ध राज्यों को महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे मांग केंद्रों तक बिजली पहुंचाने में सक्षम होना चाहिए. चौथा, दोपहिया, तिपहिया और बसों में इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से बढ़ावा दिया जाये, क्योंकि परिवहन पेट्रोलियम का सबसे बड़ा उपभोक्ता है. और पांचवां, पीएम सूर्य घर और संबंधित योजनाओं के माध्यम से छतों पर सौर ऊर्जा को बड़े पैमाने पर बढ़ाया जाये. देश की अधिकतम बिजली मांग 271 गीगावॉट तक और बढ़ने का अनुमान है, जो बढ़ती आय और एयर कंडीशनिंग के प्रसार से प्रेरित है.
अवसर और जरूरत, दोनों बड़े हैं. पश्चिम एशिया के संकट ने हमें एक अवसर दिया है. एक ऐसी दुनिया में, जहां तेल आपूर्ति मार्ग युद्धों के कारण कभी भी बाधित हो सकते हैं, जिनकी शुरुआत भारत ने नहीं की, ऊर्जा आत्मनिर्भरता एक राष्ट्रीय जरूरत बन जाती है. हर गीगावॉट सौर ऊर्जा हमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से एक कदम दूर ले जाती है. हर इलेक्ट्रिक वाहन एक ऐसा बैरल तेल है, जिसे भारत को आयात नहीं करना पड़ेगा. हर छत पर लगा सौर पैनल आत्मनिर्भरता की दिशा में एक छोटा कदम है. सूरज हर सुबह भारत में बिना किसी बातचीत, बिना किसी भू-राजनीति और बिना किसी कीमत के उगता है. सवाल सिर्फ इतना है कि भारत इसे उस पैमाने और गति से कैसे उपयोग करे, जिसकी आज जरूरत है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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