‘आत्मीय बंधु’ की यरूशलम यात्रा

Published at :05 Jun 2015 5:18 AM (IST)
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‘आत्मीय बंधु’ की यरूशलम यात्रा

तरुण विजय राज्यसभा सांसद, भाजपा इजरायल ने भारत के नागरिकों को हमेशा प्रेरणा दी है और निश्चित रूप से प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा उन सभी देशों की यात्रााओं से भिन्न और विशिष्ट होगी, जहां वे पिछले दिनों गये हैं. अंतत: प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा निश्चित हो गयी. केवल तारीखें तय होना बाकी हैं. […]

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तरुण विजय
राज्यसभा सांसद, भाजपा
इजरायल ने भारत के नागरिकों को हमेशा प्रेरणा दी है और निश्चित रूप से प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा उन सभी देशों की यात्रााओं से भिन्न और विशिष्ट होगी, जहां वे पिछले दिनों गये हैं.
अंतत: प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा निश्चित हो गयी. केवल तारीखें तय होना बाकी हैं. वे इजरायल की यात्रा करनेवाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री होंगे. 1992 में इजरायल से राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद आज तक किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने इजरायल की यात्रा नहीं की. यही इस बात को दर्शाता है कि द्विपक्षीय संबंध कितने जटिल और कुहासों से ढके रहे.
इजरायल और भारत के मध्य सर्वोच्च स्तरीय राजनीतिक संपंर्क सितंबर, 2003 में इजरायल के प्रधानमंत्री एरियल शेरॉन की भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निमंत्रण पर दिल्ली यात्रा के दौरान हुआ था. इसके बाद सितंबर, 2014 में भारतीय प्रधानमंत्री मोदी जब संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में भाग लेने न्यूयॉर्क गये थे, तो उस समय उनकी इजरायली प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू के साथ संक्षिप्त सौजन्य भेंट हुई थी.
इजरायल के साथ भारत का संबंध केवल द्विपक्षीय सामरिक एवं राजनयिक आवश्यकताओं से परिभाषित नहीं होते, इसे सही में यदि समझा जाये तो यह दो राष्ट्र बंधुओं, बल्कि रक्त बंधुओं के आपसी संबंधों की ऐसी कहानी है, जिसमें दोनों के मध्य गहरे विश्वासमूलक रिश्तों के बावजूद पड़ोसियों के भय से नजदीकियां दूरियों में बदली जाती रहीं.
इजरालय 1948 में अस्तित्व में आया और जिन अरब देशों ने महाभारत के कौरवें की तरह इजरायल को एक इंच जमीन देने से भी मना किया था, उन्हें भी अंतत: इजरायल को एक सच्चई के रूप में मानना पड़ा. लेकिन चारों ओर से अरब देशों से घिरे इजरायल ने हिम्मत और हौसले की ऐसा बेमिसाल उदाहरण प्रस्तुत किया कि वह तकनीकी, रक्षा, रेगिस्तानी क्षेत्रों में कृषि तथा इलेक्ट्रॉनिक के मामले में दुनिया का अग्रणी देश बन गया. भारत के प्रति उसके सहयोग का गौरवपूर्ण इतिहास रहा है.
एक ओर जहां हर प्रकार की सहायता और इजरायल की दरकिनार करते हुए दोस्ती की कोशिशें के बावजूद किसी अरब देश ने कश्मीर को भारत क हिस्सा नहीं माना तथा पाकिस्तान के संदर्भ में कभी भारत का साथ नहीं दिया, वहीं इजरायल ने अरब और मुसलिम दबाव में भारत की बेरुखी की चिंता न करते हुए 1962 से लेकर आज तक हर युद्ध के समय भारत की अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक सहायाता की, हथियार और अन्य उपकरण दिये, गुप्तचर सूचनाएं साझा की तथा कश्मीर में भारत के पक्ष को मान्य किया.
आज भी इजरायल भारत को रक्षा सामान देनेवाला प्रमुख देश है. जिसके साथ केवल रक्षा क्षेत्र में भारत का पांच अरब डॉलर का व्यापार होता है. जिस समय पोखरण-दो के संदर्भ में अमेरिकी दबाव में सारे पश्चिमी विश्व ने भारत को आवश्यक रक्षा सामग्री एवं प्रौद्योगिकी और उससे जुड़े उपकरण देने से मना कर दिया था, इजरायल ही एक मात्र ऐसा देश था, जिसने अमेरिका की परवाह न करते हुए भारत को रक्षा सामग्री की आपूर्ति एवं अन्य उपकरण देना जारी रखा था.
जब इंदिरा गांधी के समय रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) की 1968 में स्थापना हुई थी, तभी से हमारी विदेशी गुप्तचर सेवाओं को इजरालय की प्रसिद्ध गुप्तचर संस्था मोसाद से सहयोग मिलता रहा है. विशेष रूप से मानवरहित विमानों- यूएवी की आपूर्ति में उसने बहुत मदद की और इजरायल की विमानन उद्योग एजेंसी ने भारतीय वायु सेना के मिग-21 युद्धक विमानों की स्तर वृद्धि के लिए तकनीकी सहायता की. इजरायल भारतीय नौसेना व वायुसेना के लिए बराक-8 प्रक्षेपास्त्र विकसित कर रहा है, जो हमारी जहाजों की रक्षा के लिए इस्तेमाल होंगे.
2004 में भारत ने इजरायल से अवाक्स अर्थात् आकाशीय चेतावनी एवं नियंत्रण करनेवाले तीन युद्धक विमान 1.1 अरब डॉलर की कीमत पर खरीदे थे और आशा है कि 1.5 अरब डॉलर कीमत के युद्धक विमान और खरीदे जायेंगे. अभी तक भारत और इजरायल के मध्य सात सेनाध्यक्ष दिल्ली और येरूशलम की यात्रा कर चुके हैं. 2001 के बाद इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सात बार भारत आ चुके हैं.
लेकिन इजरायल की साइबर सुरक्षा, जल प्रबंधन, कृषि और ठोस गंदगी के प्रबंधन और प्रसंस्करण में विशेष कुशलता है. राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों ओर लद्दाख के बर्फ स्थल को सरसब्ज बनाने में इजरायल की मरूभूमि कृषि तकनीक चमत्कारिक प्रभाव ला रही है.
भारत, चीन और पाकिस्तान जैसे दो परमाणु शक्तिसंपन्न देशों से घिरा है, जिनके साथ उसके युद्ध हो चुके हैं. दोनों के साथ गहरे सीमा विवाद हैं. और पाकिस्तान को चीन की सैनिक सहायता भारत के विरुद्ध ही इस्तेमाल होती है. भारत पूरी तरह से केवल रूस पर सैनिक सहायता और आपूर्ति के लिए निर्भर नहीं रह सकता. ऐसी परिस्थिति में केवल इजरायल ऐसा देश है, जो इस बात की परवाह किये बिना कि भारत ने उसके लिए क्या किया, निरंतर भारत की सहायता खुले मन और निस्वार्थ भाव से करता है.
मध्यपूर्व के अत्यंत सामरिक केंद्र में बसे इजरायल की यहूदी जनसंख्या भारत के प्रति एक स्वाभाविक मित्रता का भाव रखती है. यह सिर्फ 65 मील चौड़ा और 262 मील लंबा देश है, जहां के चार मुख्य नगर येरूशलम, राजधानी तेल अवीव, हाइफा और बेरशिवा है. लगभग 80 लाख की आबादी वाले इजरायल में 76 प्रतिशत जनसंख्या यहूदी है, 16.3 प्रतिशत मुसलिम, 2.1 प्रतिशत ईसाई और 1.6 प्रतिशत ड्रज हैं, लेकिन दुनिया के प्रति व्यक्ति सघनता की दृष्टि से सबसे ज्यादा इंजीनियर इजरायल में हैं, सबसे ज्यादा पेटेंट इजरायल से होते हैं, सबसे ज्यादा वैज्ञानिक शोध एवं निबंध इजरायल से प्रकाशित होते हैं और 24 प्रतिशत इजरायली कामगार डिग्रीधारी सुशिक्षित हैं.
वह दुनिया की रक्षा तकनीक और साइबर विकास का प्रमुख केंद्र है. यह सब केवल उसने अपनी उस कुशलता और स्वाभिमान के बल पर किया, जो उसे पिछले एक हजार साल से वांछित था. 1958 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण इजरायल के राष्ट्रपिता बेन गूरियन से मिलने येरूशलम गये थे. उस समय बेन गूरियन की वे विराट और उदार छवि से बहुत प्रभावित हुए थे. बेन गूरियन ही ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने मजबूत शत्रुओं से घिरे देश इजरायल को स्वाभिमान से विजयी होना सिखाया. जो हिब्रू भाषा एक हजार साल से लिखी और पढ़ी नहीं जाती थी, उसको उन्होंने इजरायल की राष्ट्रभाषा घोषित किया और आज हिब्रू में इजरायल की संसद से लेकर मीडिया का सारा काम होता है.
दुनिया भर से यहूदियों ने आकर इजरायल को बसाया और यही ऐसा देश है, जिसकी 40 प्रतिशत से ज्यादा आबादी दुनिया के बाकी हिस्सों, जिनमें भारत शामिल है, से आयी. ऐसे इजरायल ने भारत के नागरिकों को हमेशा प्रेरणा दी है और निश्चित रूप से प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा उन सभी देशों की यात्रााओं से भिन्न और विशिष्ट होगी, जहां वे पिछले दिनों गये हैं.
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