वाह रे लड़कियों के उद्धारक!

Published at :04 May 2015 7:13 AM (IST)
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वाह रे लड़कियों के उद्धारक!

‘‘कुछ मत पूछो मिश्र, बस इतना जान लो कि लड़की का उद्धार कर दिया. आप तो जानते ही हो कि दहेज लेने के सख्त खिलाफ रहे हैं हमलोग, हमेशा से. अच्छे खानदान की पढ़ी-लिखी लड़की, यहां आकर शहरी सोसाइटी का चाल-ढाल सीख जायेगी.’’- बड़े बेटे की शादी का कार्ड लेकर शर्मा जी अपने पड़ोसी मिठेश्वर […]

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‘‘कुछ मत पूछो मिश्र, बस इतना जान लो कि लड़की का उद्धार कर दिया. आप तो जानते ही हो कि दहेज लेने के सख्त खिलाफ रहे हैं हमलोग, हमेशा से. अच्छे खानदान की पढ़ी-लिखी लड़की, यहां आकर शहरी सोसाइटी का चाल-ढाल सीख जायेगी.’’- बड़े बेटे की शादी का कार्ड लेकर शर्मा जी अपने पड़ोसी मिठेश्वर मिश्र के यहां अलसुबह पहुंचे ही थे.

पान की पीक बाहर गमले के बगल में थूकी और अंदर बेसिन में कुल्ला कर मुंह साफ कर लिया. चाय बहुत पसंद है उन्हें, खास कर पड़ोसियों के यहां की. अरे ओ मिठौती!- आवाज लगायी और आते ही कार्ड पकड़ाते हुए कहा, ‘‘समधी मिलान के लिए तैयार रहना मिठौती, पांच दिन बाद बेटे की शादी है.’’ शादी?- मिश्र जी के पूछते ही उनका भाषण शुरू हो गया.

एक भी लाइन इधर-उधर नहीं, सेम टू सेम वही भाषण, जो चार पड़ोसियों को सुना कर आये थे. सोसाइटी में विभिन्न मुद्दों पर आयोजित सेमिनारों में उन्हें बोलने में वैसे महारत हासिल थी. अभी पिछले हफ्ते ही नारी सशक्तीकरण व दहेज प्रथा पर आठ मिनट तक धारा प्रवाह भाषण दिया था उन्होंने. खैर! बात पूरी नहीं हुई थी उनकी. चाय की फरमाइश की और सोफे पर पालथी मार बैठ गये और शुरू कर दिया बखान- ‘‘राजीव (मंझला बेटा) डॉक्टर है, अमित (छोटा बेटा) भी रिलायंस में इंजीनियर हो गया. बड़े के बिजनेस से कोई लेना-देना नहीं. लड़की राज ही तो करेगी.’’

किचन से चाय लेकर आयी मिसेज मिश्र ने तपाक से पूछ ही डाला- ‘‘भाई साब, दहेज न सही, गहने-जेवर, सामान तो दे ही रहे होंगे न, लड़की वाले. कोई यूं ही खाली हाथ तो थोड़े न बेटी विदा करता है. ’’ मिसेज मिश्र के सवाल में अभी प्रश्नवाचक चिह्न् तक नहीं लगा था कि शर्मा जी बोल पड़े, ‘‘देखिये भाभी जी, अब आप लोगों से क्या छिपाना. बेटे ने नया मकान बनवाया है. बस हमने कह दिया, बेटी को कोई दिक्कत न हो, सो पलंग-गद्दा, फ्रीज, कूलर, एसी, होम एप्लायंस वगैरह, जो बन पड़े, दे दें. बेटे को तो बस एक चरपहिया का शौक था, सो लड़की वालों ने उसका दिल रख लिया. अपनी बिटिया की शादी में हमने भी इतना किया ही था.’’

‘‘क्या भाई साब, अब ये कम है क्या कि बिजनेसमैन बेटे के लिए सर्विस वाली बहू मिली है.’’- मिश्र जी बोल पड़े- ‘सुना है, गांव में 12 बीघा खेत भी है और दो आम के बगान भी. आखिर मां-बाप के बाद सब कुछ इकलौती बेटी का ही तो हो जायेगा?’’ शर्मा जी कुछ जवाब सोच ही रहे थे कि कमरे के अंदर बैंक इंटरव्यू की तैयारी कर रही मिश्र जी की बेटी (इस बातचीत ने जिसका कंसन्ट्रेशन भंग कर डाला था) बाहर निकल आयी, और कथित संस्कार का परित्याग कर बड़ों के बीच बस इतना बोल पड़ी- ‘‘अंकल! प्लीज आप लोग लड़कियों का उद्धार करना बंद कर दीजिए.’’

निलेश कुमार भगत

प्रभात खबर, भागलपुर

nbhagat399@gmail.com

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