जॉब जकारिया से खास बातचीत : विटामिन-ए नहीं मिलने से मर गये 24 हजार बच्चे

Published at :29 Apr 2015 5:42 AM (IST)
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जॉब जकारिया से खास बातचीत : विटामिन-ए नहीं मिलने से मर गये 24 हजार बच्चे

आप अपने घर (गृह प्रदेश केरल) जा रहे हैं. जॉब्स ओन कंट्री..खुश होंगे. हंसते हैं…पर इतनी संतुष्टि कहीं नहीं मिलेगी. क्यों? झारखंड में काम करने का जितना अवसर मिला, लोगों का जितना प्यार व सहयोग मिला, खास कर मीडिया व सरकार का भी, ये सब कहीं और मिल पायेगा, इस पर मुङो शक है. झारखंड […]

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आप अपने घर (गृह प्रदेश केरल) जा रहे हैं. जॉब्स ओन कंट्री..खुश होंगे.

हंसते हैं…पर इतनी संतुष्टि कहीं नहीं मिलेगी.

क्यों?

झारखंड में काम करने का जितना अवसर मिला, लोगों का जितना प्यार व सहयोग मिला, खास कर मीडिया व सरकार का भी, ये सब कहीं और मिल पायेगा, इस पर मुङो शक है.

झारखंड में अपने तीन साल के काम को आप कैसे आंकते हैं.

कई मुद्दों पर सफलता मिली. कई बार बहुत कुंठित व निराश भी हुआ. बच्चों व किशोरों के कुपोषण पर हम लगातार चिंतित रहे हैं. इसके निराकरण के लिए एक बॉडी बनाने की वकालत करते रहे हैं. अब एक न्यूट्रिशन काउंसिल (पोषण परिषद) का गठन हो रहा है. पोषण सहायिका की नियुक्ति भी हो रही है. आयरन गोली की खरीद हुई. वहीं कुपोषण मुक्त अभियान चलाने पर सरकार की सैद्धांतिक सहमति है.

ये सब सफलताएं हैं. वहीं यूनिसेफ के लाख प्रयास के बाद भी झारखंड के बच्चों को तीन साल तक विटामिन-ए की खुराक नहीं मिली. आप जानते हैं, झारखंड में विटामिन-ए की कमी से हर वर्ष करीब आठ हजार बच्चों की मौत होती है. इस तरह तीन साल में करीब 24 हजार बच्चों की मौत की जिम्मेवारी कौन लेगा? यह एक ऐसा मुद्दा है, जिसे सोच कर आज भी मैं बहुत फ्रस्ट्रेशन (कुंठा या चिंता) महसूस करता हूं.

विटामिन-ए की खरीद के लिए मैं व्यक्तिगत रूप से मुख्यमंत्री व राष्ट्रपति के सलाहकार के विजय कुमार सहित तीन मुख्य सचिवों से मिला था. सबने कहा था कि तुरंत खरीदेंगे. पर ऐसा नहीं हुआ. अभी भी गर्भवती माताओं को प्रसव से पहले तथा बाद में छह हजार रु की वित्तीय सहायता देने की घोषणा तो हुई, पर इसे लागू नहीं किया गया है. उसी तरह खुले मे शौच रोकने का कार्यक्रम धीमा चल रहा है.

अपने राज्य में कई समस्याएं हो सकती हैं. आपकी समझ से सबसे बड़ी समस्या क्या है.

स्वास्थ्य व शिक्षा का स्तर हमारी सबसे बड़ी समस्या है. मैं मानता हूं कि शिक्षा ऐसी चीज है, जो ठीक हो, तो बाकी समस्याओं का समाधान खुद हो जायेगा. केरल में सिर्फ अच्छी शिक्षा है. दरअसल अशिक्षा एक ऐसी समस्या है, जो दूसरी समस्याओं की तरह दिखती नहीं है. स्वास्थ्य खराब हो, गरीबी हो या कुछ और, यह सब दिखता है. भारत के सभी 35 राज्यों के सर्वे में झारखंड का स्थान 34 वां है. हमें अपने स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा (क्वालिटी एजुकेशन) देनी होगी. पांचवीं-छठी क्लास में पढ़ रहे हमारे बच्चे क्लास वन की पढ़ाई नहीं कर सकते. ऐसी शिक्षा से किसका भला होगा. मेरी बहन काफी पढ़ी-लिखी है.

वह केरल के प्राइमरी स्कूल में शिक्षिका है. मैं देखता हूं कि वह घर में भी खूब बढ़ती है. 10-12 साल की सर्विस के बाद उसे 20 हजार रु वेतन मिलता है. इधर झारखंड में शिक्षकों को 35 हजार रु मिल रहे हैं. यानी यहां शिक्षकों को पैसे कम नहीं मिल रहे. झारखंड में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के लिए कम से कम पांच साल का एक बड़ा अभियान चलना चाहिए. यूनिसेफ का मानना है कि प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों की पढ़ाई में उनकी मातृभाषा का भी उपयोग होना चाहिए. किताबें भले हिंदी-अंगरेजी में हो. झारखंड की कई भाषाओं को सरकार ने द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया है, पर व्यवहार में यह नहीं हो रहा. अब आपको दो राज्यों की कमान संभालनी है. क्या यह मुश्किल नहीं है.

केरल व तमिलनाडु में व्यवस्था अच्छी है. कई काम, जिसे करने में वक्त लगता है. इन राज्यों में तुरंत हो जाता है. वहां का समाज भी संवेदनशील है. खास कर मां व बच्चे के प्रति. केरल में गर्भवती महिला की मौत अस्वीकार्य है. आपको विश्वास नहीं होगा. यदि केरल में प्रसव के दौरान किसी महिला की मौत होती है, तो वहां के अखबारों में पहले पन्‍नों की यह हेडलाइन होती है.

केरल के एक इलाके में तीन माह के दौरान पांच जनजातीय बच्चों की मौत पर लोगों ने इतनी तीखी प्रतिक्रिया दिखायी कि सरकार को उस इलाके में नयी योजना शुरू करनी पड़ी. इधर झारखंड में चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के पास केस नहीं आते. पर वहां चुनौतियां दूसरी है. केरल में किशोर बच्चों में आत्महत्या की प्रवृत्ति है. वहां बच्चों से मां-बाप की अपेक्षाएं बहुत अधिक है. यह भी एक कारण है.

क्या आप मानते हैं कि लोग संवेदनशील हों, तभी सरकार काम करती है.

यह सही है. लोग संवेदनशील व जागरूक हों, तो सरकार चुप नहीं रह सकती. लोकतंत्र में लोक की संवेदनशीलता जरूरी है. सिर्फ सरकार बना देना हमारा काम नहीं है. झारखंड में लोगों को धीरे-धीरे जागरूक व संवेदनशील बनाने का काम मीडिया कर रहा है. मीडिया को नहीं पता कि उसके पास कितनी शक्ति है. मैं तो मानता हूं कि समाज में परिवर्तन का काम मीडिया ही कर सकती है.

झारखंड में अपने कार्यकाल के दौरान आप कब सबसे ज्यादा दुखी या फिर खुश हुए.

मैं कह चुका हूं. बच्चों को तीन वर्ष से विटामिन-ए नहीं मिलना मेरी लिए सबसे दुखद है. विमला प्रधान समाज कल्याण मंत्री थी. उस वक्त अति कुपोषित बच्चों के लिए जीवन आशा कार्यक्रम शुरू हुआ था. स्वास्थ्य विभाग ने गर्भवती माताओं के लिए राज्य भर में ममता वाहन चलाने का निर्णय लिया था. इन दोनों वक्त मैं बहुत खुश हुआ था.

अंतिम सवाल. झारखंड को आप किस रूप में याद करना चाहेंगे.

झारखंड जैसा प्यार व सम्मान मुङो कहीं नहीं मिलेगा. एक बार मैं मोरहाबादी स्थित एक होटल कुछ खाने गया था. पैसे देने की बारी आयी, तो वहां के वेटर ने मुझसे कहा कि मैंने अपने मालिक से बात करके आपको 15 फीसदी की विशेष छूट दिलायी है, क्योंकि आप झारखंड के आदिवासियों के लिए बहुत काम कर रहे हैं. मेरे लिए यह अविस्मरणीय था. झारखंड में मैं मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव से जब चाहे मिल सकता था. तमिलनाडु में अम्मा (निवर्तमान मुख्यमंत्री व वर्तमान सरकार की रिमोट कंट्रोलर जयललिता) से मिलने में मेरे पसीने छूटने वाले हैं, यह मैं जानता हूं.

यूनिसेफ, झारखंड के प्रमुख जॉब जकारिया अब राज्य छोड़ कर जा रहे हैं. उन्हें केरल व तमिलनाडु का यूनिसेफ प्रमुख बनाया गया है. फरवरी 2011 में झारखंड आने वाले जॉब ने अपनी लगन-मेहनत तथा बच्चों के अधिकार, उनकी शिक्षा व स्वास्थ्य के प्रति अपनी संवेदनशीलता के कारण अपनी जगह बनायी.

स्वभाव से बेहद विनम्र, समाज के गंभीर मुद्दों के प्रति जज्बा से अपनी पूरी टीम के साथ काम करनेवाले जॉब जकारिया ने प्रभात खबर संवाददाता संजय से झारखंड का अनुभव साझा किया.

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