समर्पण नीति पर और विचार हो
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :19 Mar 2015 1:52 AM (IST)
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उग्रवादियों के पुनर्वास के लिए झारखंड सरकार ने जो नयी समर्पण नीति मंजूर की है, उसमें रकम दोगुनी कर दी गयी है और आश्रितों का रोजगारमूलक पुनर्वास करने की बात कही गयी है. तत्काल दी जानेवाली रकम के बाद किस्तों में दी जानेवाली रकम विशेष शाखा की रिपोर्ट पर निर्भर करेगी. नयी पॉलिसी से नीति-नियंताओं […]
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उग्रवादियों के पुनर्वास के लिए झारखंड सरकार ने जो नयी समर्पण नीति मंजूर की है, उसमें रकम दोगुनी कर दी गयी है और आश्रितों का रोजगारमूलक पुनर्वास करने की बात कही गयी है. तत्काल दी जानेवाली रकम के बाद किस्तों में दी जानेवाली रकम विशेष शाखा की रिपोर्ट पर निर्भर करेगी.
नयी पॉलिसी से नीति-नियंताओं को उम्मीद है कि कोटिवार रकम की बढ़ोतरी प्रोत्साहन का काम करेगी और बड़ी तादाद में उग्रवादी समर्पण करेंगे. उम्मीद करने में कोई हर्ज नहीं है, पर पूर्व की नीति की समीक्षा और नयी नीति की व्यावहारिकता पर भी गंभीर विचार-विमर्श की जरूरत थी. इसकी व्यावहारिकता पर जिस गंभीर चिंतन-मनन की जरूरत थी, वह शायद नहीं हुआ. साल 2009 में उग्रवादियों के समर्पण के लिए बनी समर्पण व पुनर्वास नीति को संशोधित कर अब उग्रवादियों को दो कोटियों में बांट कर अनुदान देने का निर्णय किया है.
बी श्रेणी के नक्सलियों को समर्पण के समय 50 हजार तथा कुल ढाई लाख रुपये देने का प्रावधान था. इस श्रेणी में जोनल कमांडर से नीचे के उग्रवादी शामिल हैं. इसके अलावे उग्रवादियों के आश्रित बच्चों को शिक्षा व कानूनी सहायता भी दी जायेगी. ए श्रेणी के उग्रवादियों को समर्पण के समय तत्काल एक लाख रुपये दिये जायेंगे और बाद में पांच लाख रुपये में से शेष राशि दो किस्तों में दी जायेगी. उग्रवादी की कोटि के निर्धारण का आधार क्या होगा, इस पर नीति चुप है. कोटि का दावा संबंधित उग्रवादी पर घोषित इनामी राशि के आधार पर होगा या उग्रवादी ही इसका सबूत पेश करेगा. कहीं ऐसा तो नहीं कि इनामी उग्रवादी नियोजित तरीके से समर्पण कर अपने ऊपर घोषित राशि का एक हिस्सा पा रहा होगा. इसकी गारंटी कौन देगा कि वह हृदय परिवर्तन के कारण सरेंडर कर रहा है या वह इसे लाभ के मौके के तौर पर इसे देख रहा है.
नयी नीति कहीं उग्रवाद का पुनर्वास तो नहीं करेगी? इसके पर्याप्त सबूत मौजूद हैं कि आत्मसमर्पण के बाद मॉनीटरिंग के स्तर पर सरकार गंभीर नहीं रही है. इसका मतलब हुआ कि सरेंडर करा कर पुलिस-प्रशासन या सरकार अपना डाटा बेस बना तो लेती है, पर बाद में उसे देखने की फुरसत किसी के पास नहीं. नयी नीति इससे कैसे लड़ेगी, इसका जवाब भी चाहिए.
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