गांधी कथा के सच्चे सत्याग्रही का जाना
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :16 Mar 2015 1:20 AM (IST)
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अफ्रीका में कहावत है कि किसी बुजुर्ग का जाना एक पुस्तकालय के जाने जैसा है. गांधीव्रती नारायण देसाई के अंतिम सांस लेने के साथ दुनिया से गांधी-कथा का एक पुस्तकालय चला गया है. गांधीजी ने अपने संघर्ष और स्वप्न के भीतर जैसा भारत रचना चाहा था, उसकी छाप करोड़ों आदर्शवादी लोगों के दिल में अगर […]
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अफ्रीका में कहावत है कि किसी बुजुर्ग का जाना एक पुस्तकालय के जाने जैसा है. गांधीव्रती नारायण देसाई के अंतिम सांस लेने के साथ दुनिया से गांधी-कथा का एक पुस्तकालय चला गया है. गांधीजी ने अपने संघर्ष और स्वप्न के भीतर जैसा भारत रचना चाहा था, उसकी छाप करोड़ों आदर्शवादी लोगों के दिल में अगर 21वीं सदी में भी बसी हुई है, तो उसे बसाये और बचाये रखने में एक सच्चा तथा ऊर्जा से भरपूर स्वर नारायण देसाई का भी था.
गांधी जीवित हैं, क्योंकि गांधी की कथा जीवित है और गांधी की कथा जीवित है, क्योंकि उसे अपने मन-वचन-कर्म से जीवित रखनेवाले बचे रह गये कुछ लोगों में नारायण देसाई अन्यतम थे. उनका पालन-पोषण 1930 और 1940 के दशक में गांधी के सान्निध्य में ही साबरमती और सेवाग्राम के आश्रमों में हुआ. छत्रछाया पिता महादेव देसाई की मिली, जो स्वयं गांधी के दैनंदिन को एक निजी सचिव की नजर से देखते और संवारते थे.
नारायण देसाई ने अपनी विरासत को ही अपने भावी का आधार बनाया. मसलन, पिता महादेव देसाई की जीवनी लिखने के लिए उन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला, और उन्होंने जिस गुजरात विद्यापीठ के चांसलर का पद संभाला, उसे स्वयं गांधीजी ने 1920 में स्थापित किया था.
अपने सर्वाधिक कर्मकुशल दिनों में अगर उन्होंने बिनोबा के भूदान आंदोलन और जेपी की संपूर्ण क्रांति में जीवन का रास्ता देखा, तो इसलिए कि उस वक्त किसी सत्याग्रही के लिए यही सबसे सुचिंतित आदर्श और आह्वान था. ऐसे आदर्श लक्ष्य तक न भी पहुंचें, तो भी उन्हें साकार करने का स्वप्न जीवित रहता है. नारायण देसाई के मन में भी सत्याग्रह का स्वप्न जीवित रहा. तभी तो बाद के दिनों में जब उन्होंने ग्राम-स्वराज्य और सर्वोदयी भावना से तापी जिले में एक स्कूल की नींव रखी, तो उसका नाम संपूर्ण क्रांति विद्यालय रखा.
वे अथक सत्याग्रही थे और सत्याग्रह की कथा को मौजूदा राजनीति तथा समाज की नैतिक आलोचना के रूप में जीवित रखना चाहते थे. अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित नारायण देसाई ने 80 पार की उम्र में भी इसी भावना से गांधी-कथा के वाचन को एक नया आयाम दिया. गांधी-कथा जब भी याद की जायेगी, नारायण देसाई की कथा भी याद की जायेगी.
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