बंदा डरता है सिर्फ लिंक फेल होने से!
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :12 Jan 2015 5:52 AM (IST)
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पंकज कुमार पाठक प्रभात खबर, रांची हाल ही में मोबाइल के सिमकार्ड की एक समस्या लेकर टेलीफोन कंपनी के दफ्तर गया. वहां के अधिकारी ने बेरुखी से मेरी समस्या सुनी और एक लाइन में जवाब दिया, ‘‘सर, लिंक फेल है. अभी हम कुछ नहीं कर पायेंगे. काम चल रहा है.’’ वह तोते की तरह एकसांस […]
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पंकज कुमार पाठक
प्रभात खबर, रांची
हाल ही में मोबाइल के सिमकार्ड की एक समस्या लेकर टेलीफोन कंपनी के दफ्तर गया. वहां के अधिकारी ने बेरुखी से मेरी समस्या सुनी और एक लाइन में जवाब दिया, ‘‘सर, लिंक फेल है. अभी हम कुछ नहीं कर पायेंगे.
काम चल रहा है.’’ वह तोते की तरह एकसांस में सबकुछ बोल गया. लिंक यानी कनेक्टिविटी या नेटवर्क. दरअसल, कंप्यूटर के इस जमाने में आपका काम तभी पूरा होगा, जब संबंधित दफ्तर में लिंक हो. क्योंकि आज का समय लिंक बिना सब सून का है. कार्यालय निजी कंपनी का हो या सरकारी कंपनी का, वहां कर्मचारियों की मौजूदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण है, लिंक का होना.
क्योंकि लिंक के बिना कार्यालय, रोजगार के बिना युवा और नेटवर्क के बिना स्मार्टफोन, तीनों ही बेकार माने जाते हैं. एक जमाना था, जब दफ्तरों में बाबुओं के न मिलने की शिकायत रहती थी. आज टेक्नोलॉजी के इस जमाने में दफ्तरों में लिंक न मिलने की या ‘लिंक फेल’ होने की शिकायत रहती है.
हालांकि निजी कंपनियों में एक उम्मीद होती है कि बताये गये समय तक लिंक या कनेक्टिविटी शुरू हो जायेगी. लेकिन सरकारी दफ्तरों से गायब लिंक और रेलवे से आनेवाले मेहमान कब तक आयेंगे, यह तो सिर्फ भगवान ही बता सकते हैं. सरकारी दफ्तरों में लिंक का जाना, कर्मचारियों को बाहर जाकर पान खाने का बहाना मिलने जैसा है.
पिछले दिनों सरकारी बैंक का एक अनुभव सुनिए. बैंक की एक शाखा में कष्ट से जूझते ग्राहकों की लाइन में खड़ा होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहा था. बैंक के कंप्यूटर पर बैठा क्लर्क, की-बोर्ड पर ग्राहकों के नाम की स्पेलिंग ऐसे ढूंढ़ रहा था, जैसे किसी पहेली को सुलझा रहा हो.
मेरे आगे-पीछे खड़े ग्राहक उनकी इस प्रतिभा के कारण शब्दों की मर्यादा पार कर रहे थे. एक बोला, ‘‘जल्दी करिए सर, आपके काम करने की स्पीड देख कर कछुआ भी शरमा रहा है.’’ दूसरा बोला, ‘‘कितना घूस दिये थे सर, क्लर्क बनने के लिए?’’ तीसरे ने कुरकुरे के अंदाज में चुटकी ली और कहा, ‘‘थोड़े स्लो छे.. पर मारो छे.’’ दूसरी तरफ वो क्लर्क था, जिस पर इन टीका-टिप्पणियों का कोई असर नहीं हुआ.
वह एक -एक नोट कभी उंगलियों पर पानी लगाकर गिनता, तो कभी मशीन में डाल कर. फिर नोटों की जांच करता. मोटी खाल में तंज की सूई कहां चुभती है! खैर, घंटे भर बाद मेरा नंबर आया, जबकि मुझसे पहले सिर्फ सात लोग थे. मैंने अपनी पासबुक देते हुए कहा, इसे अपडेट कर दीजिए. अगले ने मुझे देखा, मेरी पासबुक देखी, अपना कंप्यूटर देखा और बोला, ‘‘लिंक फेल है.’’
उसका जवाब सुन कर मुझे ऐसा लगा, जैसे पूरी रात जाग कर तैयारी करने के बावजूद मैं अगले दिन की परीक्षा में फेल हो गया हूं. मैंने अपनी मायूस पासबुक को बैग में डाला और बैंक से गुनगुनाते हुए बाहर निकला, तेरी गलियों में न रखेंगे कदम.. आज के बाद..
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