कर्मचारियों के हितों की रक्षा का वादा

देश भर में कोयला श्रमिकों की दो दिन पुरानी हड़ताल अंतत: समाप्त हो गयी, जिससे बिजली क्षेत्र को बड़ी राहत मिली. कोयले की स्थानीय आपूर्ति से चलनेवाले देश के करीब 100 ऊर्जा संयंत्रों में से 42 के पास पहली जनवरी को सिर्फ चार से सात दिन का ही कोयला बचा था. ऐसे में यदि सरकार […]
ऐसे में यदि सरकार और श्रमिक संगठनों के बीच वार्ता असफल होती, तो देश में कोयले की भारी किल्लत से बिजली उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो सकता था. इसका विभिन्न उद्योगों पर भी असर पड़ता और विकास कार्य अवरुद्ध होता. वैसे ही दो दिन में पांच लाख से अधिक कोयला खनन मजदूरों की हड़ताल के कारण उत्पादन पर 75 फीसदी तक नकारात्मक असर पड़ा है. 1974 में रेल कर्मियों की 20 दिन चली हड़ताल के बाद यह सबसे बड़ी औद्योगिक हड़ताल मानी जा रही थी.
आर्थिक सुधार के समर्थकों ने इसे कोयला उत्पादन में वृद्धि की दिशा में उठाया गया कदम बताया था, लेकिन मजदूर संगठनों ने इसे निजीकरण की पहल बताते हुए रोजगार में भारी कमी की आशंका जतायी थी. इस संदर्भ में सरकार और यूनियनों के बीच बुधवार को करीब छह घंटे तक लंबी वार्ता हुई, जिससे रास्ता निकला. समझौते के बाद हड़ताल समाप्त हो गयी.
सरकार ने यूनियनों से स्पष्ट किया कि उसकी निजीकरण की कोई योजना नहीं है. कोल इंडिया के कर्मचारियों के हितों की पूरी तरह रक्षा की जायेगी और यह सुधार केवल अर्थव्यवस्था की बेहतरी व कोयला उत्पादन बढ़ाने के लिए है. इस तरह कोयला श्रमिकों की दो दिन पुरानी हड़ताल समाप्त हो गयी. इधर, बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने और भूमि अधिग्रहण से संबंधित अध्यादेशों को लेकर भी लोगों में असंतोष है. आशा है, सरकार अपने फैसलों की सार्थकता के प्रति देश को भरोसे में लेने के लिए समुचित पहल जल्द करेगी, ताकि किसी तरह की समस्या पैदा न हो.
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