संपर्क भाषा के रूप में संस्कृत

भाषा के विकास में राज्य के संरक्षण की मुख्य भूमिका होती है. मुगलों व अंग्रेजों ने फारसी एवं उर्दू को राजभाषा बना दिया और आज तक मुफस्सिल अदालतों तथा पुलिस विभाग में उनका इस्तेमाल हो रहा है. इसी प्रकार अंगरेजों ने अंगरेजी को दुनिया भर में पहुंचा दिया. केंद्रीय विद्यालयों में तीसरी भाषा के रूप […]
भाषा के विकास में राज्य के संरक्षण की मुख्य भूमिका होती है. मुगलों व अंग्रेजों ने फारसी एवं उर्दू को राजभाषा बना दिया और आज तक मुफस्सिल अदालतों तथा पुलिस विभाग में उनका इस्तेमाल हो रहा है. इसी प्रकार अंगरेजों ने अंगरेजी को दुनिया भर में पहुंचा दिया.
केंद्रीय विद्यालयों में तीसरी भाषा के रूप में जर्मन की जगह संस्कृत रखने के विवाद पर केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने कहा कि संस्कृत पूरे देश की संपर्क भाषा हो सकती है. यह अटपटा लग सकता है, लेकिन यह विचार न तो हैरान करनेवाला है, न ही नया है. दरअसल, संविधान सभा में ऐसी सलाह प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ आंबेडकर ने स्वयं दी थी. संविधान सभा में भाषा के मुद्दे पर लंबी बहस हुई. इसके बाद यह राय बनी कि देवनागरी लिपि के साथ हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया जाये. प्रारूप प्रावधान में एक उपबंध जोड़ा गया कि अगले 15 वर्षो तक सरकारी काम में अंगरेजी का प्रयोग होता रहेगा. सितंबर 1949 में आंबेडकर ने राजभाषा के रूप में हिंदी की जगह संस्कृत लाने के लिए एक संशोधन पेश किया. संविधान (अनुच्छेद 343) में केवल राजभाषा का उल्लेख है, राष्ट्रीय भाषा का नहीं. इस प्रस्ताव पर दस्तखत करनेवालों में न सिर्फ तत्कालीन मद्रास प्रांत के राजनेता एवं प्रतिनिधि थे, बल्कि बंगाल से मुस्लिम लीग के सदस्य नहीरूद्दीन अहमद भी थे, जिन्होंने कहा, ‘मैं आपको ऐसी भाषा पेश करता हूं, जो सर्वश्रेष्ठ एवं महानतम है, तथा यह बिना भेदभाव के कठिन है, सबों के लिए सीखने में समान रूप से कठिन.’
कैलाश नाथ काटजू और राजेंद्र प्रसाद ने इसका समर्थन किया. लेकिन जवाहरलाल नेहरू इसके प्रति अन्यमनस्क रहे. हालांकि उसी संविधान सभा में 13 फरवरी, 1949 को उन्होंने संस्कृत को देश की सबसे बड़ी विरासत बताया था- ‘यदि मुझसे पूछा जाये कि सबसे बड़ा धन क्या है जो भारत के पास है, उसकी सर्वोत्तम विरासत क्या है, तो मैं बिना किसी हिचक के कहूंगा- यह संस्कृत भाषा एवं साहित्य है, और वह सब कुछ जो इसमें है. जब तक यह जीवित रहेगी, लोगों के जीवन को प्रभावित करेगी, तब तक भारत की मौलिक प्रतिभा बरकरार रहेगी.
यह एक कड़वा सच है कि अब बहुत कम लोग संस्कृत बोलते एवं समझते हैं. यह किसी राज्य की भी भाषा नहीं है. 2001 की जनगणना के अनुसार, मात्र 14,135 व्यक्तियों ने संस्कृत को मातृभाषा के रूप में दर्ज कराया. हालांकि, प्राचीन काल में लंबे समय तक संस्कृत संपर्क भाषा थी, जब उसे सिर्फ ‘भाषा’ के नाम से जाना जाता था. कई संस्कृतज्ञों का मत है कि संस्कृत को राष्ट्रीय भाषा बना कर भाषा को लेकर चल रहा विवाद खत्म किया जा सकता है. इतने कम लोगों द्वारा बोली जानेवाली भाषा कब की खत्म हो गयी होती. चूंकि यह हिंदुओं के पूजा-पाठ एवं कर्मकांड की भाषा है, इसलिए अमर है. इसीलिए अन्य समुदायों को संस्कृत अपनाने में हिचक हो सकती है. उनका विश्वास जीतने के लिए जरूरी है कि संस्कृतज्ञ बार-बार यह न दोहरायें कि ब्रrा के द्वारा इस भाषा का साक्षात्कार दिव्य जगत के ऋषियों को कराया गया और यह अभी भी दिव्य जगत की भाषा है और इसे देववाणी कहते हैं.
मैक्स मूलर को लॉर्ड मैकॉले ने वेदों का अनुवाद करने के लिए नियुक्त किया था, ताकि भारतीय संस्कृति का विकृत रूप पेश किया जा सके. उस समय जर्मनी का ब्रिटेन से दोस्ताना संबंध नहीं था. ईस्ट इंडिया कंपनी उन्हें वेदों तथा अन्य हिंदू शास्त्रों के अनुवाद के लिए 200 पाउंड प्रति वर्ष देने को तैयार हो गयी. उन्होंने ईसाई धर्म का प्रचार करने के उद्देश्य से यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. जुलाई 1962 को उन्होंने पत्नी को पत्र लिखा, ‘मैं जो कर सकता हूं, वह यह कि अपने धर्म के खिलाफ जो सबसे बुरा कहा जा सकता है, वह मैंने पढ़ा एवं सुना है. हमारी मुश्किलें मनुष्यों के सिद्घांत से पैदा होती हैं, न कि ईश्वर के सिद्घांत से.’ परंतु जब मूलर ने वेद एवं अन्य शास्त्र पढ़े, तो वह अभिभूत हो गया और अपने पूर्वाग्रहों को छोड़ कर उसने वेदों का अद्भुत अनुवाद किया.
संस्कृतज्ञों को चाहिए कि वे भाषा में थोड़ा लचीलेपन की गुंजाइश रखें. संस्कृत दो शब्दों-‘सम एवं कृत’- के मेल से बना है. ‘सम’का अर्थ है ‘सम्यक’, जब कि कृत का अर्थ है किया हुआ. यानी यह परिपूर्ण है. बाद में उच्चारण एवं व्याकरण की अशुद्घियों के कारण प्राकृत भाषा की उत्पत्ति हुई, जो निचले तबके में बोली जाने लगी. शूद्रक, भवभूति, कालिदास के नाटकों में अभिजन तो शुद्ध संस्कृत में बोलते हैं, जबकि आमजन प्राकृत बोलते हैं. यह स्थिति वैसी है जैसी आज अंगरेजी की है जो अभिजन की भाषा है. आमजन हिंदी या क्षेत्रीय भाषा बोलता है.
भाषा के विकास में राज्य के संरक्षण की मुख्य भूमिका होती है. मुगलों-अंग्रेजों ने फारसी-उर्दू को राजभाषा बना दिया और आज तक मुफस्सिल अदालतों तथा पुलिस में उनका इस्तेमाल हो रहा है. अंगरेजों ने अंगरेजी को दुनिया भर में पहुंचा दिया. शेक्सपीयर के समय में यह एक क्षेत्रीय भाषा थी. 1604 में प्रकाशित अंगरेजी के पहले शब्दकोश में केवल 3 हजार शब्द थे. इसमें स्पष्ट लिखा था कि हिब्रू, ग्रीक, लैटिन एवं फ्रेंच से लिये गये अंगरेजी भाषा के शब्दों का यह शब्दकोश है.
सुधांशु रंजन
वरिष्ठ टीवी पत्रकार
sudhanshuranjan@hotmail.com
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