बारी-बारी हर दल ने लूटा है हमें
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :05 Dec 2014 1:03 AM (IST)
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यह बात सोचने लायक है कि जिस वर्ष झारखंड बिहार से अलग हो कर नया राज्य बना तो वह वर्ष 2000 था. यह वर्ष जैसे खुद बयां कर रहा हो 2 के बाद सिर्फ अंडे. उदाहरणार्थ एक राज्य के 2 टुकड़े हुए और प्रगति के नाम पर अनवरत अंडे देखने को मिले. इतिहास साक्षी रहा […]
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यह बात सोचने लायक है कि जिस वर्ष झारखंड बिहार से अलग हो कर नया राज्य बना तो वह वर्ष 2000 था. यह वर्ष जैसे खुद बयां कर रहा हो 2 के बाद सिर्फ अंडे. उदाहरणार्थ एक राज्य के 2 टुकड़े हुए और प्रगति के नाम पर अनवरत अंडे देखने को मिले.
इतिहास साक्षी रहा है कि बंटवारा हमेशा से ही दुखदाई होता रहा है, लेकिन झारखंड के बारे में किसी ने ऐसा नहीं सोचा था कि यह अपनी दुर्दशा की तुलना जापान के हिरोशिमा और नागासाकी से करने को मजबूर हो जायेगा. उन प्रांतों में तो ‘लिट्ल बॉय’ और ‘फैट मैन’ नाम के परमाणु बमों ने तहलका मचाया था, पर झारखंड की इस पीड़ा का जिम्मेवार कौन है?
यह बहुत बड़ा प्रश्न हमारे सामने आ खड़ा होता है. यहां की राजनीति में लूट-खसोट की ऐसी बाढ़ आयी कि प्रगति के क्षेत्र में सुखाड़ के अलावा और कुछ हाथ न लगा यहां की जनता के. विगत 14 वर्षो में जितनी भी सरकारें सत्ता में आयीं, झारखंड को उन परमाणु बमों से कम बरबाद नहीं किया है. यह नमो-नमो का नया मंत्र हमारे समक्ष नये विकल्प के तौर पर खड़ा है. अब यह देखना है कि इस चुनावी यज्ञ में नमो-नमो मंत्र पर किसकी आहुति दी जायेगी और किसका अक्षत रखा जायेगा. हमारा क्या है, हम तो कल भी दान देने वालों में से थे और आज भी दान ही देंगे.
खैर, यह झारखंड की विडंबना ही रही है कि हमारे पास इतनी प्राकृतिक संपदा होने के बावजूद हम निम्न स्तर के पायदान पर भी लड़खड़ाते हुए खड़े हैं. भाई वह दिन कब आयेगा जब ‘सोलह का डोला, छियालीस की छाती’ का अभिमान झारखंडियों को भी होगा! प्रगति की मुहर झारखंडियों के भी सीने पर चमकता हुआ दिखे, हम भी दहाड़ें तो ऐसा महसूस हो जैसे इस जंगल में सिर्फ और सिर्फ शेरों का बसेरा हो!
सुमित कुमार, रांची
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