अब बेटियों को भी गुजाराभत्ता

Published at :19 Nov 2014 3:03 AM (IST)
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अब बेटियों को भी गुजाराभत्ता

कई सर्वेक्षणों में पाया गया है कि गुजाराभत्ता पानेवाली महिला के जीवनस्तर में भारी गिरावट आयी. गुजाराभत्ता का मसला महज कानूनी प्रावधान से हल नहीं हो पायेगा. क्योंकि कानून तो तब काम आता है, जब कोई पीड़ित उसके पास याचिका लेकर जाता है. हाल में देश के अलग-अलग न्यायालयों द्वारा बेटी को गुजाराभत्ता देने के […]

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कई सर्वेक्षणों में पाया गया है कि गुजाराभत्ता पानेवाली महिला के जीवनस्तर में भारी गिरावट आयी. गुजाराभत्ता का मसला महज कानूनी प्रावधान से हल नहीं हो पायेगा. क्योंकि कानून तो तब काम आता है, जब कोई पीड़ित उसके पास याचिका लेकर जाता है.

हाल में देश के अलग-अलग न्यायालयों द्वारा बेटी को गुजाराभत्ता देने के फैसले की खबरें आयी हैं. पिछले दिनों गुजरात हाइकोर्ट ने एक केस पर फैसला सुनाते हुए पिता को प्रति महीने छह हजार रुपये बेटी को देने का आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि अपराध दंड संहिता की धारा 125 के तहत अविवाहित बालिग पुत्री अपने पिता से गुजाराभत्ता मांग सकती है. जूनागढ़ के फैमिली कोर्ट ने पिता को गुजाराभत्ता देने का आदेश दिया था, जिसके खिलाफ यह पिता हाइकोर्ट पहुंचा था और उसने यह दलील दी थी कि यह कानूनसम्मत नहीं है. कोर्ट ने जवाब में कहा कि यदि पुत्री अविवाहित है और उसके पास आय का कोई जरिया नहीं है, तो वह गुजाराभत्ता पाने की हकदार है.

पहले गुजाराभत्ता पत्नी के रूप में पति से ही मांगा जाता था, लेकिन अब बेटियां भी अपने लिए दावा कर रही हैं. जहां तक कानून का मसला है तो वह पहले से मौजूद धारा 125 ही है, जिसका इस्तेमाल पत्नी को पति से गुजाराभत्ता देने के लिए होता था. यानी पुराने कानून की ही नयी व्याख्या की गयी है. पत्नी की जगह एक बेटी के अपीलकर्ता बनने की बड़ी वजह 2005 का घरेलू हिंसा विरोधी कानून है. इस कानून ने पहली बार हिंसा को व्यापक स्तर पर संबोधित किया, जिसका दायरा हिंसा की प्रकृति में व्यापक होने के साथ ही न सिर्फ ससुराल, बल्कि मायके को भी इसमें समेटा है. महिलाओं के उत्पीड़न तथा हिंसा से बचाव के लिए बने इसके पहले के सभी कानून ससुराल पक्ष को ध्यान में रख कर थे. घरेलू हिंसा विरोधी कानून से पहले बालिग लड़कियों के पास कोई उपाय नहीं था कि वे अपने माता-पिता द्वारा उनकी मर्जी के खिलाफ जबरन विवाह किये जाने को चुनौती दे सकें. इस कानून के प्रभावी होने के बाद कई ऐसी खबरें आयीं कि लड़कियों ने जबरन विवाह को चुनौती दी या माता-पिता को भी यह एहसास हुआ कि अब वे जोर-जबरदस्ती नहीं कर सकते.

जैसा कि कोर्ट ने यह कहा है कि यदि बेटी के पास आय का कोई जरिया नहीं है तो वह पिता से मांग सकती है. यानी पत्नी को गुजाराभत्ता देने का जो आधार है, वही बेटी के पास भी है. इसमें यह समझना भी जरूरी है कि आय का स्नेत नहीं होना एक बात है, लेकिन आय करने के लायक बनना भी एक मसला है, जिसमें माता-पिता की भी जिम्मेवारी बनती है कि वे अपनी संतानों को इस लायक बनायें कि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें. इस रूप में जूनागढ़ का वह पिता भी जिम्मेवार है कि उसकी बेटी कमाती नहीं है. यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अब भी भारतीय परिवारों में लड़कों को रोजगार लायक बनाने पर जितना जोर है, उतना लड़कियों पर नहीं, लिहाजा वे पिता या पति पर निर्भर रहती हैं. इसलिए यह जिम्मेवारी हमारे सामाजिक ताने बाने तथा परिवार के ढांचे पर जाती है कि महिलाएं आखिर ऐसी स्थिति में क्यों बनी हुई हैं?

यह सही है कि जिसके पास आय का जरिया नहीं है उसे गुजाराभत्ता चाहिए ही, लेकिन महिलाओं को इसे अंतरिम राहत पैकेज के रूप में ही देखना चाहिए. गुजाराभत्ता से गुजारा तो हो जायेगा, लेकिन स्वनिर्भरता का सुख नहीं मिल सकता. कई सर्वेक्षणों में पाया गया है कि तलाक के बाद गुजाराभत्ता पानेवाली महिला के जीवनस्तर में भारी गिरावट आयी. आगामी समय में यह आकलन करते रहना भी जरूरी है कि आय के स्नेतों पर बराबर भागीदारी के साथ ही मिल्कियत में भागीदारी की स्थिति बढ़े. यह मसला महज कानूनी प्रावधान से हल नहीं हो पायेगा. कानून तो तब काम आता है, जब कोई पीड़ित उसके पास याचिका लेकर जाता है.

आय के स्नेतों पर भागीदारी के मसले की समस्या को गंभीरता से लेने की बात को दूसरे संदर्भो में भी देखा जा सकता है. रोजगार के क्षेत्र में महिलाओं का प्रतिशत उस अनुपात में नहीं बढ़ रहा है, जिस अनुपात में उच्च शिक्षा में बढ़ रहा है. दिल्ली में हुए एक अध्ययन के मुताबिक, इस शहर में कामकाजी शक्ति में महिलाओं की भागीदारी का फीसद सिर्फ दस है. कुल 57 लाख कामकाजी लोगों में महिलाएं 5 लाख 40 हजार हैं. कामकाजी होने या नहीं होने में घर के काम पर प्रश्न उठता है कि उस काम के लिए कामकाजी होना क्यों नहीं माना जाये और अकसर गृहकार्य की महत्ता के संदर्भ में यह बात उठायी जाती है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि यहां पर कामकाजी होने का तात्पर्य उस श्रमशक्ति का जायजा लेना है जो रोजगार के रूप में होता है, जहां अपना श्रम बेच कर प्रत्यक्ष पारिश्रमिक हासिल होता हो.

यह महज दिल्ली की स्थिति नहीं है. भारत में अब भी महिलाओं का बाहर निकल कर काम करना तथा प्रत्यक्ष श्रमशक्ति का हिस्सा बनना पुरुषों की तुलना में कम है. ऐसे में तो यही कहा जा सकता है कि अंतरिम राहत के तौर पर महिलाएं अपने माता-पिता से गुजाराभत्ता की जरूर मांग करें, लेकिन अपने को इस कदर सक्षम बना लें कि वह कभी उनका भी सहारा बन सकें, मैं समझती हूं कि यह बहुत बेहतर होगा.

स्त्री मामलों की लेखिका

anjali.sinha1@gmail.com

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