बिरसा पर सिर्फ राजनीति न करें, चरित्रवान भी बनें

Published at :15 Nov 2014 1:51 AM (IST)
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बिरसा पर सिर्फ राजनीति न करें, चरित्रवान भी बनें

अनुज कुमार सिन्हा 15 नवंबर (यानी आज) बिरसा मुंडा का जन्म दिन. लंबे संघर्ष और सैकड़ों लोगों की कुर्बानी के बाद जब झारखंड राज्य बना, तो इसके लिए 15 नवंबर का ही दिन चुना गया था. किसी और दिन भी राज्य का गठन हो सकता था, लेकिन इस तिथि को ही इसलिए चुना गया क्योंकि […]

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अनुज कुमार सिन्हा
15 नवंबर (यानी आज) बिरसा मुंडा का जन्म दिन. लंबे संघर्ष और सैकड़ों लोगों की कुर्बानी के बाद जब झारखंड राज्य बना, तो इसके लिए 15 नवंबर का ही दिन चुना गया था. किसी और दिन भी राज्य का गठन हो सकता था, लेकिन इस तिथि को ही इसलिए चुना गया क्योंकि यह बिरसा मुंडा का जन्म दिन है.

झारखंड के लोग इसे पवित्र दिन मानते हैं. इस दिन को चुनने के पीछे उद्देश्य था कि इसी बहाने बिरसा को श्रद्धांजलि दी जाये. उस बिरसा को जिन्होंने अंगरेजों के खिलाफ कभी हार नहीं मानी. पीछे हटने को मजबूर किया. वही बिरसा, जिन्होंने अंगरेजों की दमन नीति के खिलाफ यहां के लोगों को एकजुट किया, संघर्ष किया.

इसी दिन को चुनने के पीछे यह उम्मीद भी छिपी थी कि जो भी झारखंड में राज करेगा, कम से कम बिरसा के आदर्श, चरित्र को ध्यान में रखेगा. उनके उलगुलान को याद रखेगा. यह दिन उन्हें भटकने से रोकेगा, रास्ता दिखाता रहेगा. उनके (नेताओं के) चरित्र को मजबूत रखेगा.

हुआ इसका ठीक उलटा
बिरसा (मुंडा) को हम सभी नायक मानते हैं. ऐसे ही नहीं. बिरसा ने शोषण के खिलाफ जो संघर्ष किया था, अपने आंदोलन के दौरान जैसी नेतृत्वक्षमता का परिचय दिया था, उसके कारण उन्हें याद किया जाता है. नायक माना जाता है. उन्हें भगवान कहा जाता है. झारखंड आंदोलन के दौरान दलों ने, संगठनों ने इसी बिरसा भगवान का नाम ले-लेकर लोगों को संगठित किया था. राज्य बनने के बाद बिरसा के नाम पर राजनीतिक दलों ने, नेताओं ने राजनीति की. उनके नाम का इस्तेमाल किया. राजनीति से लेकर व्यापार तक से उनका नाम जोड़ा. होटल से लेकर दुकान तक खोली. दुकानदारी चलायी. वोट बैंक के रूप में बिरसा के नाम का इस्तेमाल किया गया, लेकिन वे बिरसा के मूल उद्देश्यों से भटक गये. राज्य बनने के बाद यह उम्मीद बंधी थी कि यहां के राजनेता (चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों), बिरसा के बताये रास्ते पर चलेंगे, बिरसा जैसा चरित्रवान होंगे. लेकिन अपवाद को छोड़ दें तो बिरसा के आदर्शो को अपनानेवाले नेता नजर नहीं आते. हां, उनके अनुयायी, जिन्हें बिरसाइत कहा जाता है, आज भी बिरसा के बताये रास्ते पर चल रहे हैं. सादा जीवन, ईमानदारी उनकी खासियत है. लेकिन इनकी संख्या काफी कम है. जो बिरसाइत बचे हैं, वे हाशिये पर हैं, जिनकी सुध लेनेवाला कोई नहीं.
बिरसा ने लोगों को अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया लेकिन उनके नाम पर राजनीति करनेवाले नेता आज उन्हीं गरीबों का शोषण कर रहे हैं, जिनकी लड़ाई बिरसा ने लड़ी थी. जंगलों में रहनेवाले गरीबों के हालात नहीं बदले. पेट में अनाज नहीं, तन पर कपड़े नहीं, लेकिन ये लोग बेईमान नहीं हैं. उनमें नैतिकता है, संतोषी हैं. इसके ठीक उलट, बिरसा के नाम पर राजनीति करनेवाले आज करोड़ों में खेल रहे हैं, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं, ईमानदारी से दूर-दूर का संबंध नहीं.
जाति और धर्म की राजनीति करने से इन्हें समय नहीं मिलता. जब मन किया, बिरसा के नाम का इस्तेमाल किया लेकिन बिरसा के नाम पर चल रही योजनाओं में भी गड़बड़ी करने से ये नहीं चूकते. बिरसा सिर्फ एक आंदोलनकारी नहीं थे, एक संगठन थे, एक आदर्श थे, सही मायने में एक लीडर थे जिनके पास अपने साथियों को साथ लेकर चलने, उन्हें एकजुट करने की क्षमता थी. ऐसी बात नहीं कि हर राजनेता आज भटक गया है. इसी झारखंड में पुराने नेताओं को देखिए. ऐसे-ऐसे जनप्रतिनिधि भी रहे, जिन्होंने सादगी से अपना पूरा जीवन व्यतीत किया. इसी झारखंड में ऐसे-ऐसे विधायक-सांसद और मंत्री रहे, जिन्होंने पैसा नहीं कमाया, अपने बेटों, भ़ाइयों को नौकरी नहीं दी, पैरवी नहीं की, बेईमानी नहीं की, चरित्रवान रहे, लेकिन अब ऐसे नेता दिखते नहीं. नेताओं में नैतिकता नहीं दिखती. बेईमानी इनका धंधा बन गया है. बिरसा के मूल चरित्र को लोग भूलने लगे हैं. उसका पालन नहीं करते.
आज झारखंड जिस दोराहे पर खड़ा है, वहां नेताओं को चरित्रवान होना होगा. उन्हें बिरसा और उनके चारित्रिक गुण को याद करना होगा, अपनाना होगा. यह काम आसान नहीं है. जिस तरीके से समाज में गिरावट आयी है, पैसे का बोलबाला है, चारों ओर भ्रष्टाचार है, ऐसे में बिरसा के रास्ते पर चल कर ही झारखंड को पटरी पर लाया जा सकता है.
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