..इस सफाई में हैं बड़े-बड़े गुन

Published at :13 Nov 2014 11:33 PM (IST)
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..इस सफाई में हैं बड़े-बड़े गुन

अभी देश का माहौल है बड़ा चकाचक है. जिधर देखिए सफाई अभियान चल रहा है. कोई घर की, कोई गली की, कोई नुक्कड़ की, तो कोई सड़क की सफाई में लगा हुआ है. क्या नेता, क्या अभिनेता, क्या कर्मचारी, क्या अधिकारी- सभी हाथों में झाड़ू लिए गंदगी से ‘जंग’ करते नजर आ रहे हैं. हर […]

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अभी देश का माहौल है बड़ा चकाचक है. जिधर देखिए सफाई अभियान चल रहा है. कोई घर की, कोई गली की, कोई नुक्कड़ की, तो कोई सड़क की सफाई में लगा हुआ है. क्या नेता, क्या अभिनेता, क्या कर्मचारी, क्या अधिकारी- सभी हाथों में झाड़ू लिए गंदगी से ‘जंग’ करते नजर आ रहे हैं.

हर ओर नजारा ऐसा है, मानो अब देश में कोई बेरोजगार नहीं रहा. सभी हाथों में झाड़ू-कुदाल लिये बेरोजगारी को मुंह चिढ़ा रहे हैं. जिसका झाड़ू-कुदाल से छत्तीस का आंकड़ा था, उसने भी इससे दोस्ती कर ली. इसी सफाई अभियान के दौरान एक दिन मुङो अपने गांव जाने का मौका लगा. वहां नुक्कड़ पर ही मेरे बचपन का दोस्त फुलटन मिल गया. उसके हाथ में झाड़ू देख कर मैं चौंक गया. मन ही मन सोचने लगा कि जिसने आज तक ताश के पत्ते के अलावा कभी किसी चीज से दोस्ती नहीं की, उसके हाथ में झाड़ू, वो भी सड़क की सफाई के लिए. धूल के गुबार में उसने मुङो नहीं पहचाना, थोड़ी देर बाद जब धूल छंट गयी, तो मैंने आश्चर्य से उससे पूछा- ‘‘तुम फुलटन ही हो न?’’ इस पर उसने तपाक से जवाब दिया- ‘‘हां, तुमने सही पहचाना.

तुम तो शहर चले गये, लेकिन मैं किस्मत का मारा, बेरोजगारी का सताया गांव में ही रह गया.’’ मैंने कहा, ‘‘वो सब तो ठीक है, लेकिन तुम्हारे हाथ में झाड़ू? मुङो बड़ा आश्चर्य है कि जिसने कभी अपने खेत- खलिहान का दर्शन नहीं किया, कभी गाय-बकरी की देखभाल नहीं की, कभी अपने दरवाजे भी झाड़ू नहीं चलाया, आज वह गांव की सड़क साफ कर रहा है.’’ इस बात पर उसने कहा , ‘‘भाई, झाड़ू की महिमा तो अब समझ में आयी. बड़े-बड़े नेता व अभिनेता इसके मुरीद होते जा रहे हैं तो मैं किस खेत की मूली. खैर जो हो, इस अभियान से पहले तक जो लोग मुङो नाकारा और नालायक समझते थे, अब मैं उनकी नजर में भी अच्छा बनता जा रहा हूं. चलो इसी बहाने बेरोजगारी तो दूर हुई.’’ फिर फुलटन ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि आजकल अखबार व टीवी भी पर अधिकतर खबरें सफाई अभियान से ही संबंधित हैं.

वैसे कई जगह ऐसा भी हो रहा है कि जब तक फोटोग्राफर फ्लैश चमका रहे हैं, बस तभी तक हाथ में झाड़ू रहता है. जैसे ही फोटोग्राफर गया, वैसे ही हाथ में डीटॉल साबुन लेकर लोग खड़े हो जाते हैं. कई जगह लोग खुद ही मिट्टी या पेड़ पत्तियां डाल कर उसकी सफाई कर रहे हैं.

अगर ऐसा ही चलता रहा, जो जल्द ही वीआइपी लोगों के लिए फूलों से बना सुगंधित कूड़ा भी बाजार में आ जायेगा. इसी क्रम में एक छुटभैये नेता से मुलाकात हुई. उनका सफाई अभियान को लेकर नजरिया ही अलग था. उन्होंने कहा कि भाई सफाई अभियान की महिमा ही अलग है, इसने तो कइयों को रोजगार दे दिया. जिसे लोग नाकारा समझते थे अब तो वह भी बुद्धिजीवियों और माननीयों की गिनती में शामिल हो गया. जय हो सफाई अभियान की..

जीवन कुमार सिंह

प्रभात खबर, भागलपुर

jeevanmc3@gmail.com

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