गुड गवर्नेस की जानलेवा हड़बड़ी!

Published at :12 Nov 2014 11:45 PM (IST)
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गुड गवर्नेस की जानलेवा हड़बड़ी!

विकासमूलक लफ्फाजियों से चल रही हमारी सरकार के वित्तमंत्री को अपने बजट भाषण में लगता है कि दिल्ली के एम्स सरीखे चंद संस्थान और बनवा दिये जायें, तो स्वास्थ्य-सेवा के मामले में हर नागरिक के लिए रामराज्य आ जायेगा. एक सर्जन, एक सहयोगी डॉक्टर और कुछ सहायक! बस इतने से लोगों के बूते छह घंटे […]

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विकासमूलक लफ्फाजियों से चल रही हमारी सरकार के वित्तमंत्री को अपने बजट भाषण में लगता है कि दिल्ली के एम्स सरीखे चंद संस्थान और बनवा दिये जायें, तो स्वास्थ्य-सेवा के मामले में हर नागरिक के लिए रामराज्य आ जायेगा.

एक सर्जन, एक सहयोगी डॉक्टर और कुछ सहायक! बस इतने से लोगों के बूते छह घंटे में 83 महिलाओं की नसबंदी! मतलब पौने पांच मिनट से भी कम समय में एक महिला की नसबंदी की गयी! छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के एक गांव में लगे नसबंदी शिविर की यह घटना जानलेवा हड़बड़ी की अपने आप में मिसाल है. खबरों के मुताबिक संक्रमण से अब तक 11 महिलाओं की मौत हो चुकी है. दुआ करिये कि महिलाओं की मौत का यह भयावह सिलसिला आगे न बढ़े.

आखिर ऐसी हड़बड़ी किसलिए? क्या सर्जन साहब की कनपटी पर किसी ने बंदूक रखी थी? जाहिर है, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था. यदि जिला अस्पताल के सर्जन व उनके सहयोगी डॉक्टरों के हाथ चिकित्सीय देखभाल के तमाम मानकों को तोड़ते हुए चले, तो भी माना जाना चाहिए कि ऐसा किसी आपातकालीन स्थिति में ही हुआ होगा. इस स्थिति की व्याख्या में ही उस जानलेवा हड़बड़ी का राज छुपा है. सर्जन के हाथ महिलाओं की स्वास्थ्य-रक्षा को अपना कर्त्तव्य मान कर नहीं चल रहे थे, बल्कि ‘टारगेट’ मान कर अपना हाथ चला रहे थे. ‘टारगेट’ बुनियादी रूप में सेना का शब्द है. सेना को युद्ध में अपने ‘टारगेट’ पर निशाना साधना होता है. ‘टारगेट’ को जल्दी मार गिराने में उसकी सफलता है. ‘टारगेट’ यानी एक ऐसी चीज जो अपने विध्वंस के लिए ही खड़ी है.

सेना का यह शब्द-विशेष और उससे जुड़ी आक्रामकता का भाव आज के हमारे विकासपरक लोकतंत्र में भी चला आया है. बाजार अपने विस्तार में आक्रामक है, कंपनियां अपना सामान बेचने और उसके अनुकूल टेलीविजनी छवि रचने में आक्रामक हैं और राज्यसत्ता मानव-विकास का अपना ‘टारगेट’ पूरा करने में आक्रामक है. सरकारी परिवार नियोजन कार्यक्रम का ‘टारगेट’ पूरा करने के लिए नसबंदी शिविर लगाया गया था. सर्जन साहब को जिला स्तर पर दिया गया सरकारी ‘टारगेट’ पूरा करना था. उनका जिला राज्य में मानव-विकास सूचकांक की सीढ़ी पर बाकी जिलों से ऊंचा दिखे और ऐसे जिलों के बूते छत्तीसगढ़ राज्य मानव-विकास के सूचकांक की सीढ़ी पर बाकी राज्यों की अपेक्षा तेजी से सीढ़ी चढ़ता साबित किया जा सके-सर्जन साहब की हड़बड़ी का स्नेत इसी सोच में छुपा है. सोच को पूरा करने के लिए संसाधनों का अभाव हो, तो फिर मानवीय-विकास का राजकीय कर्म मनुष्यता से द्रोह का उपक्रम बन कर रह जाता है. सोचें कि यह घटना मात्र डॉक्टरों की लापरवाही के कारण हुई-जैसा कि छत्तीसगढ़ सरकार कहती है या इसका रिश्ता ग्रामीण स्वास्थ्य-ढांचे में व्याप्त अभाव से है?

सरकारी स्वास्थ्य ढांचे से संबंधित आधिकारिक आंकड़े कहते हैं कि बिलासपुर की घटना अपने को दोहराते रहने के लिए बाध्य है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रलय की रिपोर्ट ‘रूरल हेल्थ स्टैटिक्स इन इंडिया 2012’ के अनुसार, देश के 6,36,000 गांवों में रहनेवाली 70 करोड़ आबादी के लिए, कुल 1,48,366 स्वास्थ्य उपकेंद्र, 24,049 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 4,833 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 74.9 प्रतिशत सर्जन, 65.1 प्रतिशत प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ, 79.6 प्रतिशत फिजिशियन तथा 79.8 प्रतिशत बाल-रोग विशेषज्ञों की कमी है. स्वास्थ्य मंत्रलय की परिभाषा के अनुसार एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को पहाड़ी तथा जनजातीय क्षेत्रों में 80 हजार आबादी तथा मैदानी क्षेत्रों में 1 लाख 20 हजार आबादी की स्वास्थ्य संबंधी विशिष्ट जरूरतों को पूरा करना होता है. इस मानक के हिसाब से छत्तीसगढ़ में 194 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र होने चाहिए, लेकिन अभी 148 ही हैं.

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रेफरल होते हैं और बीमार की स्थिति की गंभीरता के लिहाज से उनका नंबर बाद में आता है. ग्रामीणों के लिए प्रशिक्षित डॉक्टर से इलाज का शुरुआती बिंदु प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है. रिपोर्ट के अनुसार, देश के ग्रामीण क्षेत्रों में साल 2005-2012 के बीच प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या महज 813 बढ़ी है. इस पर भी डॉक्टरों तथा अन्य चिकित्साकर्मियों की संख्या वांछित संख्या से 10.3 प्रतिशत कम है. एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को पहाड़ी और जनजातीय क्षेत्र में 20 हजार तथा मैदानी क्षेत्र में 30 हजार आबादी को स्वास्थ्य सेवा देने की जिम्मेवारी है. लेकिन उनकी संख्या में कमी से बिहार में एक केंद्र को फिलहाल औसतन 49,423, झारखंड में 75,870 और छत्तीसगढ़ में 26,456 लोगों की स्वास्थ्य संबंधी प्राथमिक जरूरतों को पूरा करना पड़ रहा है. छतीसगढ़ में मौजूदा केंद्रों की संख्या भी वांछित संख्या से कम है.

ग्रामीण चिकित्सा-ढांचे का यह अभाव मानव-द्रोह का लक्षण है. अचरज कीजिए कि विकासमूलक लफ्फाजियों से चल रही हमारी सरकार के वित्तमंत्री को अपने बजट भाषण में लगता है कि दिल्ली के एम्स सरीखे चंद संस्थान और बनवा दिये जायें, तो स्वास्थ्य-सेवा के मामले में हर नागरिक के लिए रामराज्य आ जायेगा.

चंदन श्रीवास्तव

एसोसिएट फेलो, सीएसडीएस

chandanjnu1@gmail.com

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