एक उदार आवाज का चला जाना

Published at :03 Sep 2014 12:27 AM (IST)
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एक उदार आवाज का चला जाना

बलराज पुरी के निधन से हमने कश्मीर के मित्र, उदार लोकतंत्रवादी, मानवाधिकारों और क्षेत्रीय स्वायत्तता के पैरोकार, एक दूरदर्शी लेखक, इन सबसे पहले एक अच्छे इंसान को खो दिया है. पुरी अपने आप में एक संस्था थे, जिसकी जम्मू-कश्मीर को बहुत जरूरत थी. बलराज पुरी के निधन के साथ ही जम्मू-कश्मीर ने उदारवादी आवाज, मानव […]

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बलराज पुरी के निधन से हमने कश्मीर के मित्र, उदार लोकतंत्रवादी, मानवाधिकारों और क्षेत्रीय स्वायत्तता के पैरोकार, एक दूरदर्शी लेखक, इन सबसे पहले एक अच्छे इंसान को खो दिया है. पुरी अपने आप में एक संस्था थे, जिसकी जम्मू-कश्मीर को बहुत जरूरत थी.

बलराज पुरी के निधन के साथ ही जम्मू-कश्मीर ने उदारवादी आवाज, मानव अधिकारों के रक्षक और एक लोकतंत्रवादी विचारक को खो दिया है. विविध क्षेत्रों में अहम योगदान देनेवाले 86 वर्षीय पुरी अपने आप में एक संस्था थे, जिसकी जम्मू-कश्मीर को बहुत जरूरत थी. 30 अगस्त, 2014 को पुरी के निधन के साथ एक युग का अंत हो गया. पुरी साहब राज्य में एकता, उदारता और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक प्रतीक चेहरा बन चुके थे. वे मानव मूल्यों और स्वतंत्रता पूर्वक जीने के अधिकारों की वकालत करते थे. वरिष्ठ पत्रकार और मेरे गुरु वेद भासीन के साथ वे जम्मू की मजबूत आवाज बन कर उभरे और लंबे समय तक लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरे. राज्य में प्रतिकूल परिस्थितियों में दोनों ने साथ मिल कर जमीनी स्तर पर काम किया.

नब्बे के दशक के मध्य में ‘कश्मीर टाइम्स’ में अपने कार्यकाल के दौरान कई मौकों पर उनसे मिलने का मौका मिला. मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करने की उनकी उत्सुकता और अथक प्रयास, युवाओं के लिए अनुकरणीय था. कश्मीर में 1990 के दशक के शुरू में सशस्त्र विद्रोह और हिंसा के कारण जम्मू और कश्मीर के बीच एक लाइन खिंच गयी. जाहिर तौर पर जम्मू और आसपास के जिलों में भारत विरोधी बैनर के समर्थन में कोई नहीं था. उस समय कश्मीर के लोगों के प्रति एकता प्रदर्शित करना सवालों के परे था. तब पुरी साहब खुलकर सामने आये और कश्मीरी जनता के साथ खड़े हुए. एक उदारवादी नागरिक के तौर पर उन्होंने मानवाधिकारों की वकालत करनेवाले जस्टिस राजिंदर सच्चर और कुलदीप नैय्यर जैसे लोगों के साथ मिल कर काम किया और कश्मीर में फैली अराजकता पर रिपोर्ट तैयार की. इससे न केवल कश्मीरियों को ‘आतंकवादी’ के रूप में देखा जाना कम हुआ, बल्कि अलगाववादी खेमे में भी उनकी पकड़ मजबूत हुई. निश्चित तौर पर उन्होंने कश्मीर में चल रही ‘आजादी की मुहिम’ के स्वरूप का समर्थन नहीं किया, लेकिन वह मानवाधिकारों को ध्यान में रखते हुए आतंकवाद से निपटने के पक्षधर थे. इसका भारत भर में कार्यरत विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं पर व्यापक प्रभाव पड़ा.

उन्होंने जो कुछ भी किया वह मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों को संरक्षित करने के लिए ही था और इसी में उनका पूर्ण विश्वास था. वे अपने छात्र जीवन से ही जन अधिकारों के लिए विभिन्न अभियानों के माध्यम से जुड़े रहे. 1942 में उन्होंने उर्दू साप्ताहिक ‘पुकार’ के संपादक पद से अपने बेमिसाल कैरियर की शुरुआत की. विभिन्न आयामों को छूती हुई सात दशकों की यात्र के दौरान उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. वे भारत छोड़ो आंदोलन, कश्मीर छोड़ो आंदोलन, जम्मू-कश्मीर जन सम्मेलन में भी शरीक हुए. प्रदेश में व्याप्त उथल-पुथल के दौर में वे जवाहर लाल नेहरू, शेख मोहम्मद अब्दुल्ला और इंदिरा गांधी के काफी करीबी रहे. पुरी साहब वर्ष 1948 से 1964 तक लगातार, खास कर कश्मीर के मसले पर जवाहर लाल नेहरू के संपर्क में बने रहे. वे जम्मू और कश्मीर में अंतरक्षेत्रीय सद्भावना को बढ़ाने के लिए प्रयासरत रहे. ‘क्षेत्रीय स्वायत्तता के उनके फॉमरूले को नेहरू और शेख अब्दुल्ला ने साझा तौर पर स्वीकार किया और जुलाई, 1952 में प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसकी घोषणा की गयी थी’. 1953 में शेख अब्दुल्ला के अपदस्थ होने के बावजूद उनकी दोनों पक्षों में विश्वसनीयता बनी रही. उन्होंने इंच-दर-इंच गतिरोधों को समाप्त करने का प्रयास किया.

पुरस्कार विजेता लेखक के रूप न केवल उन्होंने आम लोगों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी, बल्कि पर्यावरण के प्रति भी जागरूक रहे. मानव मूल्यों और लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति समझ और सेवा के लिए उन्हें ‘पद्मभूषण’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. राज्य में जब भी सामाजिक ताने-बाने को सांप्रदायिकता से खतरा पैदा हुआ, उन्होंने विकासशील राजनीति के उत्साही समर्थक के तौर पर आगे बढ़ कर हस्तक्षेप किया. लोकतांत्रिक अधिकारों और न्याय के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए उन्होंने एक पत्रकार और लेखक के रूप में सराहनीय कार्य किया. पुरी शायद राज्य के पहले लेखक थे जिन्होंने 1993 में सशस्त्र विद्रोहियों के संदर्भ में ‘कश्मीर टूवार्डस इनसरजेंसी’ लिखा. कश्मीर विवाद पर वे बिना किसी भय के अपना मत रखते थे.

यद्यपि उन्होंने जम्मू व लद्दाख में क्षेत्रीय स्वायत्तता की मजबूती की वकालत की थी. यहां तक कि पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान लेह में स्वतंत्र हिल डेवलपमेंट काउंसिल की स्थापना में अहम भूमिका अदा की. उनके विचारों की खिलाफत करनेवाले लोगों के बीच भी उनको सम्मान प्राप्त था. उनके निधन से हमने कश्मीर के मित्र, उदार लोकतंत्रवादी, मानवाधिकारों व क्षेत्रीय स्वायत्तता के पैरोकार, एक दूरदर्शी लेखक, इन सबसे पहले एक अच्छे इंसान को खो दिया है.

शुजात बुखारी

वरिष्ठ पत्रकार

dell@prabhatkhabarin

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