काश! पूरे देश के लोग ‘ढोंगी’ होते

Published at :28 Aug 2014 11:46 PM (IST)
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काश! पूरे देश के लोग ‘ढोंगी’ होते

अच्छे दिन लाने का वादा कर दीजिए या झूठ ही बोल दीजिए, मेरे देश के लोग आपको ‘प्रधानमंत्री’ बना देंगे, लेकिन अगर आप अच्छे काम करते हैं, तो यही लोग आपको ‘ढोंगी’ कहेंगे. आप शराब-सिगरेट नहीं पीते हैं, लेकिन किसी के सामने यह बात कह कर देखिए. लोग कहेंगे, पीते तो होंगे ही, लेकिन सब […]

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अच्छे दिन लाने का वादा कर दीजिए या झूठ ही बोल दीजिए, मेरे देश के लोग आपको ‘प्रधानमंत्री’ बना देंगे, लेकिन अगर आप अच्छे काम करते हैं, तो यही लोग आपको ‘ढोंगी’ कहेंगे. आप शराब-सिगरेट नहीं पीते हैं, लेकिन किसी के सामने यह बात कह कर देखिए. लोग कहेंगे, पीते तो होंगे ही, लेकिन सब के सामने नहीं पीने का ‘ढोंग’ करते हैं.

कड़वी, लेकिन इस देश के लोगों की सच्चाई यही है. प्रमाण के तौर पर हाल के दो किस्से सुनिए. स्वतंत्रता दिवस के दिन अपने दोस्त मनेसर से मिला. उसे मायूस देखा, तो उसकी मायूसी का कारण पूछा. वह बोला, ‘‘भइया, हम ‘ढोंगी’ आदमी हैं का?’’ मैंने थोड़ा गुस्साते हुए पूछा, कौन बोला? उसने अपनी डबडबाई आखें ऊपर कीं और आपबीती सुनाते हुए कहा, ‘‘गुमटी के पास वाले स्कूल के बच्चे राष्ट्रगान गा रहे थे. इसलिए हम सावधान की मुद्रा में खड़े थे.

गुमटी के पास चाय पी रहे लोग हमसे हाल-चाल पूछे, तो हम खामोश रहे. हमारी खामोशी पर वो लोग हंसने लगे. राष्ट्रगान खत्म हुआ, तो हम, उनसे बोले कि कहीं राष्ट्रगान हो, तो हमारा कर्तव्य है कि वहां सावधान की मुद्रा में खड़े हो जायें. फिर वो लोग हमको ‘ढोंगी देशभक्त’ कह कर चिढ़ाते हुए बोले कि देशभक्ति का भावना दिल में होनी चाहिए. उसका दिखावा नहीं करना चाहिए. राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े होने से कोई देशभक्त बन जाता है क्या? हम नहीं खड़े हुए, तो क्या हम देशभक्त नहीं हैं? ढोंगी कहीं का!! बोलिए भइया, हम ‘ढोंगी’ हैं का?’’ उसे शाबासी देते हुए मैंने कहा, ‘‘सच्चे देशभक्त ‘ऐरे-गैरे’ लोगों की बातों को दिल पर नहीं लेते. अगर तुम जैसे लोग ढोंगी हैं, तो देश के हर आदमी को ढोंगी होना चाहिए.’’ पल भर में उसकी मायूसी मुस्कुराहट में बदल गयी.

दूसरी घटना मेरी कॉलोनी की है. मेरी कॉलोनी की स्ट्रीट लाइट खराब थी. खुद को टाटा-बिड़ला माननेवाले लोगों की कॉलोनी में एक स्ट्रीट लाइट ठीक करानेवाला कोई नहीं था. एक साधारण परिवार के सज्जन उठे. उन्होंने कॉलोनी के एक -एक घर से दस-दस रुपये का चंदा मांगा. पैसे इकट्ठा किये और स्ट्रीट लाइट ठीक करा दी. ‘सम्मान’ के योग्य उस ‘सज्जन’ व्यक्ति को कॉलोनीवाले ही बेईमान कहने लगे. वह घर में एक पैकेट नमक भी ले कर आते, तो यही हल्ला होता कि वह चंदे के पैसे बचा कर घर का सामान खरीद रहे हैं. उनके बेटे ने एक साधारण म्यूजिक सिस्टम खरीदा. पूरी कॉलोनी में यह बात आग की तरह फैल गयी कि उन्होंने म्यूजिक सिस्टम भी चंदे के पैसे से ही खरीदा, जबकि सच्चाई कुछ और थी. हर आदमी जो अच्छा काम करता है, सच्च देशभक्त है, सच्च समाज सेवक है, जिसमें सामूहिकता की भावना है, वह आदमी हमारे-आपके बीच के लोगों की नजरों में ‘ढोंगी’ बन जाता है. काश! पूरे देश के लोग ऐसे ‘ढोंगी’ होते, तो ये ढोंग करने की जरूरत नहीं होती.

पंकज कुमार पाठक

प्रभात खबर, रांची

pankaj.pathak@prabhatkhabar.in

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