एक सचेत मशाल होता है रचनाकार

भारतीय साहित्य की महान विभूतियों में शुमार उडुपी राजगोपालाचार्य अनंतमूर्ति की रचनाएं एवं सार्वजनिक जीवन में उनकी चेतन उपस्थिति उनकी मृत्यु के बहुत बाद भी जीवंत बनी रहेंगी. ऐसे प्रभावशाली व्यक्तित्व के विदा हो जाने की घड़ी में जब सिर्फ कन्नड़ साहित्यप्रेमी ही नहीं, बल्कि पूरा देश शोक-संतप्त है, कर्नाटक में कुछ लोगों द्वारा उनकी […]
भारतीय साहित्य की महान विभूतियों में शुमार उडुपी राजगोपालाचार्य अनंतमूर्ति की रचनाएं एवं सार्वजनिक जीवन में उनकी चेतन उपस्थिति उनकी मृत्यु के बहुत बाद भी जीवंत बनी रहेंगी. ऐसे प्रभावशाली व्यक्तित्व के विदा हो जाने की घड़ी में जब सिर्फ कन्नड़ साहित्यप्रेमी ही नहीं, बल्कि पूरा देश शोक-संतप्त है, कर्नाटक में कुछ लोगों द्वारा उनकी मृत्यु पर उत्सव मनाने व आतिशबाजी जैसी व्यथित करनेवाली खबरों से देश आहत है.
महात्मा गांधी और डॉ राममनोहर लोहिया के समाजवादी विचारों के समर्थक यूआर अनंतमूर्ति हिंदुत्व की सांप्रदायिक राजनीति के विरोधी थे. बीते लोकसभा चुनाव के दौरान अनंतमूर्ति ने एक कार्यक्रम में बयान दिया था कि अगर नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन जाते हैं, तो वे यहां नहीं रहेंगे.
हालांकि बाद में इस बयान पर अफसोस जताते हुए उन्होंने कहा था कि वे भावनाओं में बह गये थे. फिर भी, चुनावी नतीजे के बाद कुछ कथित मोदी-समर्थकों ने उन्हें पाकिस्तान जाने का टिकट भेजा था. उनकी मृत्यु पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गहरा दुख जताया है, लेकिन उनके तथाकथित समर्थकों द्वारा जश्न मनाने से उनकी प्रतिष्ठा को भी आघात पहुंचा है. डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे मानवतावादी दृष्टिकोण वाले महान नेताओं का अनुसरण करनेवाले भाजपा नेताओं को समाज एवं संस्कृति विरोधी तत्वों की ऐसी हरकतों पर तत्काल लगाम लगाना चाहिए.
यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे देश में महान कवियों, लेखकों, फिल्मकारों एवं चित्रकारों पर हमले की घटनाएं पिछले कुछ वर्षो में बढ़ी हैं. हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की संकीर्ण राजनीति करनेवाले तत्वों ने ही चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन को भी देश से बाहर जाने और नागरिकता छोड़ने पर मजबूर कर दिया था. ऐसे ही तत्वों के द्वारा परेशान किये जाने के बाद महान साहित्यकार मुक्तिबोध ने दशकों पहले चेताया था कि ‘ये फासीवादी ताकतें एक दिन हमारा कलम छीन लेंगी.’ रचनाकार किसी भी देश एवं समाज के लिए एक सचेत मशाल की तरह होते हैं, जिन्हें एक धरोहर की तरह संभाल कर रखा जाना चाहिए. जहां रचनाकारों के साथ घृणित व्यवहार होगा, वहां का समाज सांस्कृतिक रूप से कभी समृद्ध नहीं हो सकता है.
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