स्पष्ट नहीं है हमारी विदेश नीति

Published at :21 Aug 2014 12:50 AM (IST)
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स्पष्ट नहीं है हमारी विदेश नीति

पिछली केंद्र सरकार की आलोचना यह थी कि वह सिर्फ प्रतिक्रियात्मक नीति पर चलती थी और आगत का अनुमान लगा पानेवाले किसी संतुलित नीति के अभाव में किस घटना पर प्रतिक्रिया दी जाये और किस पर नहीं, इस ऊहापोह में पड़ी रहती थी. पाकिस्तान के साथ बातचीत या समझौते करने या किसी अन्य प्रकार के […]

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पिछली केंद्र सरकार की आलोचना यह थी कि वह सिर्फ प्रतिक्रियात्मक नीति पर चलती थी और आगत का अनुमान लगा पानेवाले किसी संतुलित नीति के अभाव में किस घटना पर प्रतिक्रिया दी जाये और किस पर नहीं, इस ऊहापोह में पड़ी रहती थी. पाकिस्तान के साथ बातचीत या समझौते करने या किसी अन्य प्रकार के द्विपक्षीय प्रयासों में कोई नुकसान नहीं है, अगर ये प्रयास समुचित सोच-समझ से तैयार रणनीतिक दृष्टिकोण पर आधारित हों.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि सभी भारतीय, सीमा के दोनों ओर के गिने-चुने पागलों के अलावा, भारत और पाकिस्तान के बीच शांति एवं सद्भावना की बहाली के आकांक्षी हैं. दोनों देशों को आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन पर तथा एक-दूसरे के विरुद्ध प्रत्यक्ष-परोक्ष युद्ध पर खर्च को कम करने पर ध्यान देने की जरूरत है. लेकिन शांति की कोशिश के लिए भी रणनीति, सुविचारित नीति और प्रयास की निरंतरता की आवश्यकता होती है. बिना इनके न तो शांति के और न ही भारत के हित साधे जा सकते हैं. मेरी चिंता पाकिस्तान के बरक्स नीति के अभाव, अबूझ अस्पष्टता और अगांभीर्य को लेकर है, जो पाकिस्तान को लेकर वर्तमान सरकार की विशिष्टताएं बन गयी हैं.

वर्तमान प्रधानमंत्री ने चुनाव प्रचार के दौरान पिछली सरकार की पाकिस्तान संबंधी नीतियों के विरुद्ध कठोर तेवर दिखाया था. उन्होंने कड़े शब्दों में यूपीए सरकार की पाकिस्तान के प्रति नरमी की बखिया उधेड़ी और अनेक दफा यह कहा कि जब हमारे सैनिक सीमा पर शहीद हो रहे हैं, तो भारत सरकार पाकिस्तान से बात कर रही है तथा नृशंस मुंबई हमले के आरोपितों को सजा नहीं दी सकी है. उन्होंने इस स्थिति को नीतिविहीन कायरता की संज्ञा दी थी.

लेकिन, सत्ता में आते ही उन्होंने पहला काम यह किया कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को दक्षिण एशिया के अन्य नेताओं के साथ अपने शपथ-ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया. यह एक अच्छा संकेत था, जो हमारे नजदीकी पड़ोसियों के साथ संबंधों की बेहतरी के नये इरादे को व्यक्त कर रहा था. लेकिन, ध्यान देने की बात यह है कि यह पहल नीतिगत कार्ययोजना के अंतर्गत सुविचारित रणनीतिक कदम कम, जल्दबाजी में लिया गया फैसला अधिक थी, खासकर ऐसी स्थिति में, जब देश में न तो कोई विदेश मंत्री था, न कोई राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और न ही कोई मंत्रिमंडल था.

यदि यह पाकिस्तान के साथ तनावपूर्ण संबंधों के दायरे से बाहर एक मैत्रीभाव का सूचक था, तो इसका लक्ष्य तो उसी समय टूट गया जब पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के दिल्ली में रहते हुए ही विदेश मंत्रलय ने पाकिस्तान की तीखी आलोचना करते हुए संवाददाता सम्मेलन कर दिया था. जैसा कि हमें बताया गया, नवाज शरीफ ने जम्मू-कश्मीर का मसला यात्र के मैत्रीभाव के कारण नहीं उठाया. लेकिन, उनके संयम के बावजूद उनके देश की नीतियों पर हमारे हमले ने पाकिस्तान में उनके समर्थन को क्षीण कर दिया. मीडिया समेत लगभग हर वर्ग ने उन पर भारत के आगे झुक जाने का आरोप लगाया. इसका नतीजा यह हुआ कि मैत्रीभाव के लिए की गयी इस यात्र ने पाकिस्तान के भारत-विरोधी कठोर रुख रखनेवाली लॉबी को ही मजबूत किया.

आश्चर्य नहीं है कि नयी सरकार के दो महीनों के कार्यकाल में जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा 19 बार युद्ध-विराम का उल्लंघन किया गया है. यह सर्वविदित है कि बिना उकसावे के किये गये ऐसे हमले मुख्य रूप से घाटी में अतिवादियों और आतंकवादियों की घुसपैठ से ध्यान हटाने के लिए किये जाते हैं. घाटी में आतंकवादी हमलों में आयी तेजी इस बात का प्रमाण है. पिछले सप्ताह ही दक्षिण कश्मीर में सीमा सुरक्षा बल के काफिले पर आतंकियों द्वारा दुस्साहसी हमला किया गया, जिसमें छह सुरक्षाकर्मी घायल हो गये. इस वारदात के बाद श्रीनगर में एक हमला किया गया. हमारे सुरक्षा बल के जवान वीरतापूर्वक इस आतंकी हिंसा का सामना कर रहे हैं. लेकिन जवाबी कारवाई या ऐसी घटनाओं को रोकने के इरादे से की जानेवाली पूर्व कारवाईयों के लिए सर्वोच्च राजनीतिक स्तर पर नीतिगत स्पष्टता की आवश्यकता होती है. दुर्भाग्यवश, इसकी अनुपस्थिति दिख रही है.

गत 13 जून को हमारे विदेश मंत्रलय ने एक वक्तव्य जारी किया कि ‘सीमा पर शांति पाकिस्तान के साथ सामान्य संबंधों की पूर्व शर्त है.’ दो दिन बाद रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने जम्मू यात्रा के दौरान इस बात को दुहराया. उन्होंने कहा कि नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान द्वारा किया किया जा रहा युद्ध-विराम का उल्लंघन तुरंत रुकना चाहिए. इन बातों का पाकिस्तान पर कोई असर नहीं पड़ा. जुलाई में ऐसी आठ घटनाएं हुईं और अगस्त में अब तक इतनी ही वारदातें हो चुकी हैं, जिनमें घाटी में हमारे रक्षा बलों पर और श्रीनगर में नागरिकों पर हमले भी शामिल हैं.

स्पष्ट कहें, तो लगातार होती इन उकसावापूर्ण हरकतों पर सरकार की प्रतिक्रिया समझ से परे है. जून में घोषित इस सार्वजनिक रुख के बावजूद कि सीमाओं पर शांति पाकिस्तान के साथ संबंधों के सामान्यीकरण के लिए पूर्व शर्त है, सरकार ने इसलामाबाद में 25 अगस्त को विदेश सचिव स्तर की बातचीत की घोषणा कर दी थी. अब विरोध के कारण उन्हें यह वार्ता स्थगित करने की भी घोषणा करनी पड़ी है. अगर सरकार सोच-समझकर चलती, तो पहले ही इस बैठक की घोषणा नहीं करती.

भारत और पाकिस्तान के बीच आखिरी बार विदेश सचिव स्तर की बातचीत वर्ष 2013 के सितंबर में हुई थी. तब ऐसी वार्ताएं 2013 की जनवरी में स्थगित कर दी गयी थीं. उस समय भी स्थगन का कारण पाकिस्तान द्वारा सीमा पर युद्ध-विराम का लगातार उल्लंघन ही था. अब जब ऐसे उल्लंघनों की निरंतरता निर्बाध बनी हुई है, तब सरकार, जो कि पाकिस्तान की ऐसी हरकतों से कठोरता से निपटने की जरूरत पर बल देते हुए सत्ता में आयी है, ऐसी वार्ताओं को स्थगित करने की पूर्ववर्ती नीति से पलट गयी थी. उसे बहुत देर से यह बात समझ में आयी. और अगर यह बातचीत होती भी, तब भी दोनों देशों के विदेश सचिव बिना किसी ठोस कार्ययोजना के ही मिलते. उनके पास संयुक्त बैठकों को फिर से शुरू करने का भी कोई प्रस्ताव नहीं था. दोनों देशों के विदेश सचिवों की बैठक सिर्फ बैठक करने की खानापूर्ति से अधिक कुछ और नहीं होता.

पाकिस्तान ने लगातार विस्फोटक आक्रामकता के साथ सुनियोजित तुष्टिकरण की नीति अपनायी है. पिछली सरकार की आलोचना यह थी कि वह सिर्फ प्रतिक्रियात्मक नीति पर चलती थी और आगत का अनुमान लगा पानेवाले किसी संतुलित नीति के अभाव में किस घटना पर प्रतिक्रिया दी जाये और किस पर नहीं, इस ऊहापोह में पड़ी रहती थी.

मेरा मानना है कि पाकिस्तान के साथ बातचीत या समझौते करने या किसी अन्य प्रकार के द्विपक्षीय प्रयासों में कोई नुकसान नहीं है, अगर ये प्रयास समुचित सोच-समझ से तैयार रणनीतिक दृष्टिकोण पर आधारित हों. अब तक, हमारी नयी केंद्र सरकार ने ऐसा दृष्टिकोण रखने का कोई सबूत नहीं दिया है.

पवन के वर्मा

सांसद एवं पूर्व प्रशासक

pavankvarma1953 @gmail.com

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