फिर अराजकता की राह पर पाकिस्तान!

By Prabhat Khabar Digital Desk
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निर्माण से लेकर अब तक पाकिस्तान में करीब 32 सालों तक सैन्य शासन रहा है. केवल एक बार ही संसद (2008 से 2013) अपने पूरे कार्यकाल तक सैन्य-हस्तक्षेप के बिना शासन संभालने में कामयाब रही. यह तथ्य साबित करता है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र की लुका-छिपी के बीच सेना ही सर्वोच्च सत्ता के रूप में मौजूद रही है.

करीब सवा साल पहले एक चुनी हुई सरकार को चुनावों में हरा कर नवाज शरीफ प्रधानमंत्री बने थे, तो आस जगी थी कि पाकिस्तान में लोकतंत्र ने जड़ जमाना शुरू कर दिया है. परंतु, अपने राजनीतिक इतिहास की गतिधारा के अनुरूप पाकिस्तान फिर से फौजी शासन के दरवाजे पर खड़ा जान पड़ता है. पिछले चुनाव में पूर्व क्रिकेटर इमरान खान की पार्टी को अच्छी-खासी सीटें मिली थीं, पर इमरान का आरोप था कि नवाज धांधली के बूते चुनाव जीते हैं.

इमरान तभी से नवाज से इस्तीफा मांग रहे हैं. उनकी मांग को धार्मिक नेता ताहिर उल कादिरी का समर्थन प्राप्त है और दोनों समर्थकों की भारी भीड़ के साथ राजधानी इसलामाबाद में बैरीकेड तोड़ते हुए उस रेडजोन तक जा पहुंचे हैं, जहां पाकिस्तान की संसद और प्रधानमंत्री का आवास है. खबरों के मुताबिक सेना ने नवाज शरीफ से कहा है कि वह स्थिति को संभालने में मदद के लिए तैयार है, बशर्ते शरीफ सरकार शासन में सेना को भागीदार बनाएं. हालांकि अभी स्पष्ट नहीं है कि पाकिस्तान में हालात क्या करवट लेंगे, पर लगता है कि पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख राहिल शरीफ का इरादा नवाज सरकार का तख्तापलट करने का नहीं है.

जानकार मानते हैं कि पाकिस्तानी सेना आतंकवाद का खुलेआम एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहती है और नवाज शरीफ के प्रभावी रहते ऐसा करना संभव नहीं. जाहिर है, सत्ता में अपरोक्ष भागीदार होकर ही वह अपने मन की कर सकती है. ऐसी स्थिति भारत के लिए कठिन साबित होगी, क्योंकि तब उसे दो-मुंहे पाकिस्तान से सामना होगा. नवाज से उसे लोकतंत्र की भाषा में निपटना होगा, जबकि सेना के आतंकवाद से सैन्य-भाषा में. विदेश सचिव स्तर की वार्ता से हाथ खींचने के सही कदम के बाद भारत को चाहिए कि वह पाकिस्तान में विस्फोटक होती स्थिति के मद्देनजर सीमा पर चौकसी बढ़ाते हुए स्थिति पर पैनी नजर रखे.

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