द्विपक्षीय संबंधों में दूरदर्शिता जरूरी

By पुष्पेश पंत
Updated Date
प्रो पुष्पेश पंत
अंतरराष्ट्रीय मामलों
के जानकार
pushpeshpant@gmail.com
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा को लेकर वैसा उत्साह नहीं है, जैसा ऐसे किसी राजकीय अतिथि की अगवानी के लिए स्वाभाविक है. कारण तलाशने के लिए बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है.
एक ओर महाभियोग के कटघरे से मुक्त हुए ट्रंप राहत की सांस ले रहे हैं और अपना पुनर्निर्वाचन अवश्यंभावी समझ आत्ममुग्ध बड़बोेलेपन में व्यस्त हैं, तो दूसरी ओर दिल्ली विधानसभा चुनाव में करारी हार के साथ-साथ नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में देशव्यापी आंदोलनों ने मोदी-शाह जोड़ी की छवि को निश्चित ही नुकसान पहुंचाया है. विश्लेषकों का यह कहना निराधार नहीं है कि दोनों ही पक्ष आंतरिक चुनौतियों से मतदाताओं का ध्यान बंटाने के लिए कूटनीतिक उपलब्धियों का दावा करने को मजबूर हुए हैं. हमारी राय में दुनिया के सबसे शक्तिशाली इंसान का देश के सबसे ताकतवर नेता के साथ मुलाकात के प्रति उदासीन रहना या इसका अवमूल्यन करना नादानी है.
जिस समय यह दौरा हो रहा है, अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक बेहद नाजुक मुकाम पर है. चीन कोरोना वायरस की भयावह चपेट में है और सिर्फ उसी की नहीं, पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था इस अप्रत्याशित संकट के कारण डांवाडोल है. ब्रिटेन यूरोपीय संघ से बाहर निकल चुका है, पर यह साफ नहीं है कि इस कदम का उसकी और भारत जैसे उन देशों की आर्थिकी पर क्या असर पड़ेगा, जो उसके साथ घनिष्ठ रूप से जुडे हैं.
ट्रंप एवं मोदी एक-दूसरे के प्रशंसक हैं और अपनी दोस्ती का इजहार समय-समय पर करते रहे हैं. ट्रंप इस बात से पुलकित हैं कि गुजरात में स्वागत के लिए लाखों लोगों की भीड़ उमड़ेगी, जो मेडिसन स्क्वायर में मोदी के लिए इकट्ठा जमावड़े से कई गुना बड़ी होगी. वह यह भी ऐलान कर चुके हैं कि फेसबुक पर अनुसरण करनेवाले पैमाने पर वह पहले पायदान पर हैं, तो दूसरे पायदान पर मोदी. ये दिल्लगी की बातें राष्ट्रहित साधन के लिए बहुत सार्थक नहीं हैं. असली मुद्दा दोनों देशाें के सामरिक व आर्थिक हितों में संयोग/सन्निपात या टकराव का है.
यह स्पष्ट करने की जरूरत भी है कि आज का भारत नेहरूयुगीन गुटनिरपेक्ष देश नहीं है. जब से आर्थिक सुधारों का दौर शुरू हुआ है और भारत ने भूमंडलीकरण का मार्ग चुना है, समाजवादी नीतियों की तिलांजलि दे दी गयी है.
सरकार कांग्रेस की अगुवाईवाली हो या भाजपा की, दोनों इस बारे में एकमत हैं कि आज अमेरिका के साथ विचारधारा के आधार पर कोई टकराव नहीं है. इसके साथ, व्लादिमीर पुतिन के शासन में रूस का चेहरा एशिया से यूरोप और मध्य-पूर्व की तरफ मुड़ा है. आज इस 'महाशक्ति' के साथ किसी 'विशेष' संबंध का दावा भारत नहीं कर सकता. रूस ने न केवल चीन के साथ अपने संबंधों को बड़े कौशल से संतुलित किया है, बल्कि दक्षिण एशिया में पाकिस्तान को भी भारत की तरफदारी से असहज नहीं किया है.
आज पुतिन को भारत की जरूरत वैसी नहीं, जैसी तब थी, जब रूस अराजकता और दीवालियेपन की कगार पर खड़ा था. सैनिक साजो-सामान की खरीद हो या साइबेरिया में तेल गैस की खोज के लिए पूंजी निवेश, आज पुतिन के पास दूसरे विकल्प हैं. मध्य-पूर्व में अमेरिका को संतुष्ट करने की ललक ने भारत को ईरान तथा फिलिस्तीनियों से अलग किया है. हम अनायास सऊदी अरब तथा इजरायल के करीब पहुंच चुके हैं.
इन सब का निष्कर्ष यह नहीं निकाला जा सकता है कि अमेरिका के साथ टकराव या मतभेद की गुंजाइश नहीं है. मोदी 'मेक इन इंडिया', 'मेड फॉर इंडिया' पर जोर देते हैं, तो ट्रंप की प्राथमिकता 'अमेरिका फर्स्ट' है. वह एकाधिक बार यह दोहरा चुके हैं कि चीन की तरह भारत का सस्ता श्रम और माल अमेरिकी मेहनतकशों को बेरोजगार बनाता रहा है.
वह उन अमेरिकी कंपनियों को दंडित करने की धमकी देते रहे हैं, जो उनकी चेतावनी अनसुनी कर भारत में (तथा चीन में) उत्पादक इकाइयां स्थापित कर रहे हैं या वहां से बीपीओ चला रहे हैं. यह नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि ट्रंप भूमंडलीकरण द्वारा प्रोत्साहित मुक्त व्यापार की समग्र व्यवस्था को तहस-नहस करने का बेलगाम अभियान चला रहे हैं.
यह कल्पना नहीं की जा सकती है कि इस यात्रा के दौरान दो देशों के बीच कुछ ऐसे सौदे पटाये जा सकेंगे, जो दोनों के लिए बराबर लाभदायक हों. ट्रंप की कोशिश रहेगी कि भारत अपने बाजार अमेरिकी उत्पादों तथा सेवाओं के लिए खोल दे, परंतु भारत के उत्पाद और सेवाएं बदले में ऐसी सहूलियत पाने की आशा नहीं कर सकते. दुर्भाग्य से सुर्खियां वीजा की संख्या तक सीमित रह जाती हैं, जबकि पड़ताल इस बात की होनी चाहिए कि अमेरिका के साथ भारत के व्यापार को संतुलित करने के प्रयासों का असर हमारी आबादी के किस तबके पर पड़ेगा? जिन सौदों को लेकर चर्चा गर्म है, उनमें हेलिकॉप्टरों से लेकर मुर्गी की टांगें तक शामिल हैं.
फल, सब्जियां, दूध से तैयार होनेवाली चीजें जब बड़े पैमाने पर आयात की जायेंगी, तब क्या हमारे किसानों-पशुपालकों की स्पर्द्धा के लिए समतल मैदान बचा रहेगा? इसी तरह की आशंकाएं तपती धरती और मौसम में बदलाव के कारण पर्यावरणीय संकट से जुड़ी हैं. ट्रंप की नजर में यह खतरा काल्पनिक है या अमेरिका को पछाड़ने की शातिर साजिश. जाहिर है, भारत इस सोच को यथावत कबूल नहीं कर सकता.
हाल में अमेरिका ने भारत को विकासशील देशों की सूची से बाहर कर दिया है. तो हम क्या यह समझें कि विकासशील देशों को दी जानेवाली रियायतों से हम वंचित किये जा रहे हैं? कब तक हम यही सोच कर हुलसते रहेंगे कि अमेरिका हमारा समर्थन सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के बारे में करता है तथा आतंकवादियों को पनाह देने के मुद्दे पर पाकिस्तान की कड़ी आलोचना करता है? सोचने लायक बात यह है कि क्या ठोस कदम अमेरिका ने पाकिस्तान पर अंकुश लगाने के लिए या भारत को परमाण्विक ईंधन की आपूर्ति करनेवाले परिवार का सदस्य बनाने के लिए उठाये हैं?
भारत-अमेरिका संबंधों को मोदी-ट्रंप की जुगलबंदी तक सीमित नहीं रखा जा सकता है. इस वक्त जब तुर्की, मलेशिया तथा नेपाल आदि भारत की तात्कालिक परेशानियों का लाभ उठाकर हम पर दबाव डालने का प्रयास कर रहे हैं, अमेरिका से सामरिक सहयोग के एवज में समुचित प्रतिदान के बारे में दूरदर्शी तरीके से सोचने की अनिवार्यता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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