राजस्व का बंटवारा

केंद्र सरकार द्वारा करों से अर्जित राजस्व को राज्यों के बीच वितरित करना भारतीय शासन व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आयाम है. राज्यों की हिस्सेदारी का निर्धारण वित्त आयोग करता है. वर्ष 1950 में कुल कर वसूली का 10 फीसदी राज्यों को आवंटित किया गया था. यह आंकड़ा समय के साथ बढ़ता गया और 14वें वित्त […]
केंद्र सरकार द्वारा करों से अर्जित राजस्व को राज्यों के बीच वितरित करना भारतीय शासन व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आयाम है. राज्यों की हिस्सेदारी का निर्धारण वित्त आयोग करता है. वर्ष 1950 में कुल कर वसूली का 10 फीसदी राज्यों को आवंटित किया गया था.
यह आंकड़ा समय के साथ बढ़ता गया और 14वें वित्त आयोग ने इसे 42 फीसदी तक कर दिया था. हालांकि आगामी वित्त वर्ष के बजट के साथ प्रस्तुत 15वें वित्त आयोग के सुझाव में इसमें एक फीसदी की मामूली कटौती की गयी है ताकि पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य की संरचना में हुए बदलाव और सुरक्षा की जरूरतों के लिए अधिक धन मुहैया कराया जा सके.
लेकिन आयोग ने अतिरिक्त 7735 करोड़ रुपये की भी व्यवस्था की है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि किसी भी राज्य को पिछली बार मिली राशि से कम आवंटन न मिले. इस सुझाव से सरकार से सहमत नहीं है. उसका कहना है कि यह एक नया सिद्धांत है. उम्मीद है कि सरकार और आयोग इस संबंध में जल्दी ही कोई समाधान निकाल लेंगे. बहरहाल, असली विवाद राज्यों के बीच बंटवारे के असंतुलन का है. हालांकि आयोग ने हिस्सेदारी को लगभग पहले की ही तरह रखा है, किंतु बांटने का सूत्र बदल दिया है. इस वजह से जहां महाराष्ट्र, राजस्थान, अरुणाचल प्रदेश और बिहार को फायदा होता दिख रहा है, वहीं कर्नाटक, केरल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश को नुकसान संभावित है. वैसे तो बंटवारे का हिसाब हर पांच साल में तय होता है, लेकिन मौजूदा आयोग के लिए यह अवधि छह साल है.
ऐसे में अनेक राज्य असंतुष्ट हो सकते हैं तथा वे भेदभाव का आरोप लगा सकते हैं. इस आयोग के कार्यकाल में दक्षिण भारतीय राज्य पहले ही अपनी आपत्ति दर्ज करा चुके हैं. उनका एक बड़ा तर्क यह है कि बीते दशकों में उन्होंने अपनी आबादी को नियंत्रित किया तथा अपेक्षाकृत अधिक आर्थिक विकास किया है. ऐसे में उन्हें राजस्व में समुचित हिस्सा नहीं मिलना निराशाजनक होगा.
इस बात में दम है, पर यह भी समझा जाना चाहिए कि यदि पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत के राज्यों को अधिक वित्त का आवंटन नहीं होगा, तो उनकी आकांक्षाएं पूरी करने में मुश्किल होगी. यह स्थिति राष्ट्रीय विकास में बाधक होगी. आवंटन बढ़ाने से पिछड़े राज्यों में विकास योजनाओं को गति देने में मदद मिलेगी और वे देश को आगे ले जाने में अधिक सहयोग कर सकेंगे. आयोग की रिपोर्ट में राज्यों को भी ऊर्जा क्षेत्र में घाटे को कम कर पिछड़े जिलों में शिक्षा व अन्य कार्यक्रमों पर ध्यान देने की सलाह दी गयी है.
अधिक आवंटन का उपयोग इन पहलों में किया जा सकेगा. बहरहाल, आयोग की अंतिम रिपोर्ट कुछ महीने के बाद आयेगी, सो सरकारों तथा वित्त आयोग के पास आपत्तियों के निपटारे के लिए समय है. जोर इस बात पर होना चाहिए कि आवंटन का सही उपयोग सुनिश्चित किया जाये.
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