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पेशेवर ईमानदारी जरूरी

Updated at : 15 Jan 2020 12:19 AM (IST)
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पेशेवर ईमानदारी जरूरी

समाज में डॉक्टरों को ईश्वर का दूसरा रूप माना जाता है. उनसे यह अपेक्षा भी होती है कि वे पेशे के आदर्शों के प्रति ईमानदारी बरतें. अफसोस की बात है कि कई डॉक्टर व अस्पताल कमाई के लिए मरीजों की गैर-जरूरी जांच कराते हैं और उन्हें महंगी या ज्यादा दवाई लेने की सलाह देते हैं. […]

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समाज में डॉक्टरों को ईश्वर का दूसरा रूप माना जाता है. उनसे यह अपेक्षा भी होती है कि वे पेशे के आदर्शों के प्रति ईमानदारी बरतें. अफसोस की बात है कि कई डॉक्टर व अस्पताल कमाई के लिए मरीजों की गैर-जरूरी जांच कराते हैं और उन्हें महंगी या ज्यादा दवाई लेने की सलाह देते हैं. इस गलत काम में दवा कंपनियों की मिलीभगत भी होती है.
खबरों के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शीर्ष कंपनियों से इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने की चेतावनी दी है. उन्होंने कहा है कि कारोबारी कायदों को दरकिनार करने के ऐसे रवैये सरकार को कड़े कानून बनाने के लिए मजबूर कर रहे हैं. कुछ महीने पहले स्वयंसेवी संगठन साथी द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि कंपनियां ज्यादा दवा और अन्य सामान बेचने के लिए डॉक्टरों को महंगी चीजें, विदेश यात्राओं और सेक्स वर्करों आदि का लालच देती हैं.
अमेरिका समेत अनेक देशों में भी ऐसी हरकतों के बारे में रिपोर्ट आ चुकी हैं. हमारे देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या कम होने तथा उनमें समुचित संसाधनों के अभाव के कारण बड़ी संख्या में लोगों को निजी अस्पतालों की सेवाएं लेनी पड़ती हैं. एक अध्ययन के अनुसार, सामान्य उपचार करानेवाले 75 प्रतिशत से अधिक और भर्ती होनेवाले 60 प्रतिशत से अधिक रोगी इन्हीं जगहों पर जाते हैं.
ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में 2018 में प्रकाशित शोध में जानकारी दी गयी थी कि भारत में सालभर में करोड़ों लोग इलाज के भारी खर्च की वजह से गरीबी के शिकार हो जाते हैं. लगातार बढ़ते खर्च का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 2004 से 2014 के बीच भर्ती होनेवाले शहरी मरीज के खर्च में औसतन करीब 176 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी. ग्रामीण रोगी के लिए यह आंकड़ा 160 फीसदी से ज्यादा रहा था. वर्ष 2016 की आर्थिक समीक्षा में जानकारी दी गयी थी कि सरकारी अस्पताल की तुलना में निजी अस्पताल का खर्च चार गुना अधिक है.
एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया है कि इलाज के खर्च में बढ़त मुद्रास्फीति की दर से दोगुनी गति से हो रही है. इसमें भर्ती के खर्च से अधिक वृद्धि सामान्य उपचार में होने का आकलन भी है. उल्लेखनीय है कि हाल के महीनों में मुद्रास्फीति में तेज बढ़त हुई है. जाहिर है कि खर्च का बढ़ना पेशेवर सांठगांठ से जुड़ा हुआ है. देश की आबादी का बड़ा हिस्सा गरीबों और कम आमदनी के लोगों का है.
कंपनियों के मुनाफे और अस्पतालों की कमाई के लिए ऐसे तबकों का शोषण हो रहा है. अस्पतालों द्वारा खर्च के अनाप-शनाप ब्यौरा तैयार करने और जांच के नाम पर वसूली करने के मामले अक्सर चर्चा में रहते हैं. गरीब परिवारों को बीमा मुहैया करानेवाली आयुष्मान भारत योजना में भी भ्रष्टाचार के जरिये पैसा उगाहने के आरोप में कई अस्पताल जांच के दायरे में हैं. उम्मीद है कि प्रधानमंत्री की चेतावनी के बाद हालात सुधरेंगे और कंपनियां रिश्वत का लालच देकर दवा बेचने से बाज आयेंगी.
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