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स्मृति शेष: जनतंत्र के सच्चे सिपाही थे डीपी त्रिपाठी

Updated at : 03 Jan 2020 6:44 AM (IST)
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स्मृति शेष: जनतंत्र के सच्चे सिपाही थे डीपी त्रिपाठी

प्रो आनंद कुमार समाजशास्त्री delhi@prabhatkhabar.in स्मृति शेष 29 नवंबर 1952 – 2 जनवरी 2020 राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के महासचिव और पूर्व राज्यसभा सदस्य देवी प्रसाद त्रिपाठी का महाप्रस्थान एक अत्यंत दुखद समाचार है. उन्होंने अपनी लंबी सार्वजनिक जीवन यात्रा में अनेक चुनौतियों को देखा था और हर मौके पर यशस्वी बनकर आगे बढ़े थे. […]

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प्रो आनंद कुमार
समाजशास्त्री
delhi@prabhatkhabar.in
स्मृति शेष
29 नवंबर 1952 – 2 जनवरी 2020
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के महासचिव और पूर्व राज्यसभा सदस्य देवी प्रसाद त्रिपाठी का महाप्रस्थान एक अत्यंत दुखद समाचार है. उन्होंने अपनी लंबी सार्वजनिक जीवन यात्रा में अनेक चुनौतियों को देखा था और हर मौके पर यशस्वी बनकर आगे बढ़े थे. मेरा उनका सत्तर के दशक से लगभग चार दशकों का मित्र-संबंध रहा है. इस लंबी अवधि में उनकी खूबियों को नजदीक से जानने का मैंने अवसर पाया. जेएनयू के छात्र-संघ के अध्यक्ष के रूप में जब आपातकाल में उनकी गिरफ्तारी हुई, तो देश की गैर-कांग्रेसी राजनीति के अनेक शिखर पुरुषों को नजदीक से जानने का उन्हें अवसर मिला.
एक अत्यंत सामान्य परिवार की पृष्ठभूमि में जन्म लेकर देवी प्रसाद त्रिपाठी ने विद्या-साधना और लोकतंत्र की हर बारीकियों को जाना. निश्चित रूप से देवी प्रसाद त्रिपाठी हमारी पीढ़ी के कई मायनों में बेहद लोकप्रिय और सफल राजनीतिज्ञाें में रहे हैं. उनके चार दशक लंबे सार्वजनिक जीवन, जो इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शुरू होकर देश की संसद तक रहा, उसमें विशेष सम्मान और योगदान का सिलसिला रहा है.
देवी प्रसाद त्रिपाठी से मेरा परिचय 1970 के दशक से जेएनयू छात्र-संघ की प्रशिक्षण भूमि में परस्पर दूरी वाले दो संगठनों के कार्यकर्ता के रूप में तो हुआ, लेकिन उन्होंने अपने शिष्टाचार और सरोकार के साथ लगातार निकटता बढ़ाते रहनेवाला आचरण किया. लोकतांत्रिक मूल्यों और आंदोलनों में भी हमारे पास साथ-साथ काम करने के कई अवसर आये. हर मौके और मंच पर देवी प्रसाद त्रिपाठी, जिन्हें निकट से जाननेवाले डीपीटी कहना पसंद करते थे, अपनी अलग जगह और छाप बना लेते थे. उनके व्यक्तित्व में एक प्रकार का चुंबकीय प्रभाव था, जिससे वह अपने पूरे जीवनभर मित्रों और प्रशंसकों का दायरा बढ़ाते चले गये थे.
डीपीटी के व्यक्तित्व में तीन उल्लेखनीय विशेषताएं थीं, जिनके आधार पर वह राष्ट्रीय राजनीतिक जीवन में बहुत कम समय में ही एक छात्र नेता से शिखर राजनीति के कुशल प्रतिनिधि बने. एक तो उनको विभिन्न विचारधाराओं- धर्म से लेकर धार्मिक परंपराओं तक का गहरा ज्ञान था.
यह उनकी खासियत थी. इलाहाबाद विवि और जेएनयू के विद्यार्थी जीवन में इसके कारण वह सर्वदलीय सभाओं से लेकर भारतीय और विदेशी साहित्यकारों की गोष्ठियों तक समान रूप से आकर्षक वक्ताओं में बुलाये जाते थे. दूसरे, उनके आचरण में एक अनूठी मिठास थी, जिसके जरिये वह वैचारिक विविधताओं में जीने के बावजूद अपने जीवन के विभिन्न मोड़ों पर साथ रह चुके स्त्री-पुरुषों के साथ एक अटूट रिश्ता बनाये रखते थे. राजनीति में यह एक विशेष गुण है, जो बाकी नेताओं में प्राय: दुर्लभ ही रहता है.
उनकी तीसरी और सबसे बड़ी खूबी थी उनके पास आत्मविश्वास का मजबूत होना. वह अपने धुन के पक्के थे, इसलिए वैचारिक लचीलापन रखते हुए छात्र-संघ की पहली सीढ़ी चढ़ने के बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा में प्रबल अवरोधों के बावजूद पीछे मुड़ कर नहीं देखा. मित्र बनाने और मैत्री निभाने में उनको दलों की दीवारें बांध नहीं पाती थीं, इसलिए उन्होंने इलाहाबाद विवि में गैर-वामपंथी मंच से शुरुआत करके जेएनयू में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट छात्र संगठन की अगली कतार मेेंं उन्होंने अपनी जगह बनायी.
संपूर्ण क्रांति आंदोलन से सहमत न होने के बावजूद आपातकाल में जेएनयू के छात्र-संघ अध्यक्ष होने के नाते हुई गिरफ्तारी के दौरान इंदिरा विरोधी राष्ट्रीय नेताओं से उनका निकट का परिचय हुआ. उन्होंने जिस धीरज से आपातकाल विरोधी राजनीतिक मोर्चे के साथ सहमना-संबंध बनाया, उससे उनका राजनीतिक कौशल बहुतों को पसंद आया. इसलिए आपातकाल के बाद की राजनीतिक उथल-पुथल में बगैर एक स्पष्ट जनाधार के भी अपने नेतृत्व कौशल के जरिये उन्होंने राजीव गांधी से लेकर हेमवंती नंदन बहुगुणा और चंद्रशेखर के अंतरंग दायरे में प्रवेश हासिल किया.
डीपीटी व्यावहारिक राजनीति के अच्छे जानकार थे. इसलिए मित्रों के बढ़ते दायरे के बावजूद अधिकांश मौकों पर अपनी पसंद के दल की अंदर की गुटबंदी के शिकार भी हो जाते थे. फिर भी उन्होंने एक प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष और संसदीय लोकतंत्र के राजनीतिक भूगोल में बराबर अपनी असरदार उपस्थिति बनाये रखी.
यह उनके लिए सौभाग्य की बात थी कि अनेक राष्ट्रीय नेताओं में से एनसीपी के संस्थापक और अध्यक्ष शरद पवार ने उनकी प्रतिभा का उचित सम्मान किया और अपने दल का महामंत्री, प्रवक्ता और सांसद भी बनाया. त्रिपाठी ने शरद पवार की पार्टी से अपने कई राजनीतिक मित्रों को स्थायी रूप से जोड़ दिया. इसलिए सिर्फ महाराष्ट्र में ही मुख्य आधार होने के बावजूद उनकी क्षमता के चलते एनसीपी का उत्तर भारत की अनेक प्रांतीय राजधानियों में उपस्थिति दर्ज हो सकी.
डीपी त्रिपाठी की लंबी और अनेक मापदंडों पर सफल राजनीतिक यात्रा का प्रत्यक्षदर्शी होने के नाते मुझे यह याद करने में संकोच नहीं है कि वह मूलत: एक साहित्य प्रेमी और सत्संग प्रेमी नेता थे. इसलिए अपने व्यस्त राजनीतिक जीवन के बावजूद हफ्ते-दो हफ्ते में साहित्यिक-सांस्कृतिक मित्रों के साथ सरस शाम बिताने का समय वह निकाल लेते थे.
उन्होंने अपनी बौद्धिक पत्रिका ‘थिंक इंडिया’ के जरिये प्रासंगिक और महत्वपूर्ण प्रश्नों को लगातार रेखांकित किया. लोहिया की शताब्दी में अनूठी फिल्म बनवाने से लेकर नामवर सिंह के अभिनंदन में सबसे उल्लेखनीय योगदान करने तक उनके नीर-क्षीर-विवेक के अनेक उदाहरण हम सबको हमेशा ही याद आयेंगे.
डीपी त्रिपाठी के असामयिक निधन से देश की राजधानी के राजनीतिक मंचों से लेकर बौद्धिक समागमों तक एक खास जगह सूनी रहेगी. उन्होंने आपातकाल के बाद के राजनीतिक सच को अपने तरीके से पहचाना और जिया भी.
अत्यंत उच्चस्तरीय हैसियत बनाने में सफलता के बावजूद अपनी लाचारगी के दिनों में मित्रों का साथ भी बनाये रखा. राजनीति के बारे में उन्होंने इस मान्यता को अपने खास तरीके से गलत साबित किया कि राजनीति में रिश्ते टिकाऊ नहीं होते. उन्होंने अपने निजी अनुभवों से यह निष्कर्ष निकाला था कि राजनीति टिकाऊ हो न हो, आपसी रिश्तों को टिकाऊ बनाना ही जीवन की सफलता की सबसे बड़ी कसौटी है.
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