आत्महत्या को रोक पाना संभव

By Prabhat Khabar Digital Desk
Updated Date
डॉ राजीव मेहता
मनोचिकित्सक, दिल्ली
delhi@prabhatkhabar.in
भारत में आत्महत्याओं को लेकर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़े जारी हुए हैं, जिनमें यह बताया गया है कि भारत में हर चार मिनट पर एक शख्स आत्महत्या कर लेता है. अगर घंटे के हिसाब से देखें, तो एक घंटे में पंद्रह भारतीय किसी न किसी वजह से अपनी ही जान ले लेते हैं. अब सवाल उठता है कि ऐसी कौन सी बातें हैं, जिनकी वजह से एक इंसान अपनी जान लेने पर आमादा हो जाता है और आिखरकार खुदकुशी कर लेता है. यह एक बेहद ही गंभीर समस्या है.
क्योंकि जब हम इसकी तह में जाते हैं, तो इसके अनेक लक्षण हमारे सामने आते हैं. और लक्षण भी इतने साधारण कि जिनको जानकर लोग कह ही नहीं सकते कि वह इंसान बीमार है. कारणों में घरेलू, पारिवारिक, निजी और सामाजिक सभी हैं, जो आत्महत्या के लिए प्रेरित करते हैं. इन सभी कारणों को मिलाकर हम डिप्रेशन कहते हैं. डिप्रेशन एक बीमारी है, जो एक इंसान की आत्महत्या के लिए बहुत खतरनाक मानी जाती है.
वैसे तो डिप्रेशन के बहुत से लक्षण हैं, लेकिन कुछ खास लक्षण हैं, जिनकी पहचान कर हम उसका इलाज कर सकते हैं. मन उदास रहना, परेशान रहना, बात-बात पर चिड़चिड़ा हो जाना, गुस्सा हो जाना, नींद कम लेना, भूख का कम लगना, प्यार करने की इच्छा का ह्रास होना, एकाग्रता का खत्म होना, शरीर में जगह-जगह दर्द होना, खासतौर पर सिर में दर्द होना, अपने आप को अच्छा न लगना, खुद को व्यर्थ महसूस करना, हीनभावना लाना, निराशा और आशाहीन महसूस करना, और इन सबके साथ ही मन में बार-बार मरने की इच्छा का जन्म लेना ही डिप्रेशन के मुख्य कारण हैं. यानी हर तरह से खुद के जीवन को निरर्थक मानकर रोने लगना और उसके बाद जो गहरी निराशा उत्पन्न होती है, तब इंसान सोचने लगता है कि भगवान उसे उठा ले. यहीं से आत्महत्या के प्रयास शुरू होते हैं और फिर मरने की योजना के साथ वह आत्महत्या कर लेता है.
जाहिर है, इन कारणों की पहचान बहुत आसान है, लेकिन जरूरी है यह है कि जो इसका मरीज है, उससे बात करके उसे इलाज के लिए डॉक्टर के पास ले जाया जाये. बजाय यह कहने के कि चल उठ सब ठीक हो जायेगा, हमें डिप्रेशन के मरीज को डॉक्टर के ही पास ले जाना चाहिए. डिप्रेशन भी दूसरी बीमारियों की तरह दवाइयों से ही ठीक होती है. इसलिए खुद डॉक्टर कभी नहीं बनना चाहिए और न ही किसी बाबा या पंडित के पास ले जाना चाहिए. क्योंकि डिप्रेशन के मरीज के लिए दवा बहुत जरूरी होती है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, साल 2020 तक डिप्रेशन की बीमारी इंसान की डिसएबिलिटी की दूसरी सबसे बड़ी वजह बन जायेगी, जबकि साल 2025-30 तक यह पहली वजह बन जायेगी. ऐसे में, अगर कोई बीमारी इस तरह से कॉमन हो रही है, तो इसका इलाज बहुत जरूरी है.
इसे यूं ही ठीक हो जायेगा के रवैये से ठीक नहीं किया जा सकता है. अगर किसी मौसम में कहीं पर डेंगू कॉमन हो गया, तो क्या उसका इलाज नहीं होता है? बीमारी तो बीमारी है, कबूतर के आंख बंद कर लेने से बिल्ली नहीं भागेगी, बल्कि कबूतर को उड़ना होगा.
और डिप्रेशन तो किसी मौसम या किसी जगह का मोहताज नहीं है, बल्कि भारत के साथ ही पूरी दुनिया भर में पायी जाती है. इंसान जितना मशीनी होता जा रहा है, वह जितना ही आधुनिक होता जा रहा है, उसमें तनाव भी उसी तरह से बढ़ता जा रहा है. यह तनाव ही डिप्रेशन पैदा कर रहा है.
जिस तरह से हमारा शरीर बाहरी कंपन, तापमान आदि को महसूस करने के लिए हमारे दिमाग में अलग-अलग केमिकल हैं, ठीक उसी तरह से खुश रहने के और संयमित रहने के भी अलग-अलग केमिकल हैं.
जब हमारे जीवन में संघर्ष बढ़ेगा और उससे तनाव उपजेगा, तो हमारे दिमाग में खुशी और संयमित रहने के ये रसायन धीरे-धीरे कम होते जायेंगे. डिप्रेशन बढ़ता जायेगा. जब ये रसायन कम होते हैं, तो एक प्रकार के लक्षण देते हैं.
कभी चिड़चिड़ा होने का लक्षण सामने आता है, तो कभी बार-बार गुस्सा होने का. कभी खुद को बेकार समझने का लक्षण सामने आयेगा, तो कभी जीवन को खत्म करने का. ठीक उसी तरह से, जिस तरह से इंसुलिन की मात्रा कम हो जाये, तो शुगर के लक्षण सामने आने लगते हैं. या फिर कैल्शियम कम होते हैं, तो हड्डियों के कमजोर होने के लक्षण दिखने लगते हैं.
ऐसे में जरूरी है कि मरीज को किसी बाबा-वाबा के पास न ले जाकर उसे डॉक्टर के पास ले जाया जाये, जो दवा के जरिये उन खुश के लिए जिम्मेदार रसायन के कम होने को रोक सके. मात्र यही उपाय कारगर है. हालांकि, योगा और एक्सरसाइज भी डिप्रेशन को कम करने में कारगर हैं.
गीता के अठारहवें अध्याय में अर्जुन से भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि अर्जुन, तू क्षत्रिय है इसलिए तू युद्ध तो करेगा ही, क्योंकि यही तुम्हारा स्वभाव है. यह मात्र उदाहरण के लिए कह रहा हूं. हालांकि, मेरे कहने का अर्थ यह है कि आदमी का स्वभाव एक सीमा में जाकर अपने नियंत्रण में नहीं रहता है. इसको नियंत्रित करने के लिए ही रसायन युक्त दवाइयों का इस्तेमाल किया जाता है.
जब भी कोई व्यवहार या स्वभाव है जरूरत से ज्यादा हो या फिर जरूरत से ज्यादा समय सीमा तक के लिए हो, जो इंसान के सामाजिक, व्यावसायिक और निजी जिंदगी पर असर डालने लगे, तो वह बीमारी है. डिप्रेशन भी ऐसी ही बीमारी है, जो इंसान के लक्षणाें में बदलाव और उसके स्वभाव में परिवर्तन से समझी जा सकती है. मसलन, एक-दो बार मैंने गुस्सा किया, तो यह चलेगा. लेकिन अगर रोज गुस्सा होकर मैं अपने बच्चे को चांटा मारूं, तो यह बीमारी है.
पुरुषों में आत्महत्या की दर ज्यादा है, क्योंकि महिलाओं के मुकाबले पुरुष किसी काम को अंत तक अंजाम देने की प्रवृत्ति रखते हैं. हम अपने समाज में जब भी किसी व्यक्ति में डिप्रेशन के लक्षणों को देखें, तो हमारी जिम्मेदारी है कि हम उसे अच्छे से मनोचिकित्सक के पास लेकर जायें. कभी भी उसे मात्र तसल्ली न दें कि चिंता मत करो, सब ठीक हो जायेगा.
उसे यह मत कहें कि फलां बाबा के पास जाकर अपने जीवन को बदलने का उपाय पूछ लो. इससे डिप्रेशन ठीक नहीं होगा और इंसान फिर आत्महत्या की तरफ रुख करेगा. अगर आत्महत्या को रोकना है, तो डिप्रेशन के लक्षणों की अनदेखी करने से बचना होगा और मरीज को सहानुभूति के साथ डॉक्टर के पास लेकर जाना होगा. यही कारगर उपाय है.
(वसीम अकरम से बातचीत पर आधारित)
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