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नेहरू जयंती : भारत के एक स्वप्नद्रष्टा राष्ट्रनायक

Updated at : 14 Nov 2019 7:21 AM (IST)
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नेहरू जयंती : भारत के एक स्वप्नद्रष्टा राष्ट्रनायक

अशोक कुमार पांडेय लेखक ashokk34@gmail.com शेख अब्दुल्ला अपनी जीवनी में बताते हैं कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान के राष्ट्रीय कवि हफीज जालंधरी ने बातचीत में कहा था कि ‘हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच कोई फर्क है तो नेहरू. एक बार जब नेहरू नहीं रहेंगे तब देखेंगे हम.’ उसके बाद हफीज बाहर चले गये. थोड़ी […]

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अशोक कुमार पांडेय
लेखक
ashokk34@gmail.com
शेख अब्दुल्ला अपनी जीवनी में बताते हैं कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान के राष्ट्रीय कवि हफीज जालंधरी ने बातचीत में कहा था कि ‘हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच कोई फर्क है तो नेहरू.
एक बार जब नेहरू नहीं रहेंगे तब देखेंगे हम.’ उसके बाद हफीज बाहर चले गये. थोड़ी देर बाद अजीब मंजर था. हफीज लौटे और जमीन पर बैठकर सर पीटते हुए ‘काली जबान-काली जबान’ कहते रोने लगे. जब नेहरू के निधन की खबर आयी, तो कथित दुश्मन देश का राष्ट्रीय कवि जिसके लिए रो रहा था, वह नेहरू ही थे.
यह नेहरू की शख्सियत का वह मेयार था, जो दुनिया के बहुत कम राष्ट्राध्यक्षों को हासिल होता है. वह दौर याद कीजिये तो एक तरफ अमेरिका, एक तरफ रूस और भारत जैसा नया-नया आजाद हुआ मुल्क जहां औपनिवेशिक विरासत के रूप में सांप्रदायिक हिंसा मिली थी और भयावह गरीबी भी.
चुनौतियां इतनी थीं कि बुनियाद भी बनानी थी और इमारत को उस बुलंदी तक पहुंचाना भी था, जहां से भविष्य का ऐसा नक्शा तैयार हो सके कि लोगों की न्यूनतम जरूरतें पूरी हों और देश विश्व समुदाय के बीच सम्मानजनक तरीके से खड़ा हो सके. दो ध्रुवों की उपस्थिति में आसान था अमेरिका या रूस के पाले में खड़ा हो जाना, लेकिन नेहरू ने किसी बड़ी ताकत का पिछलग्गू होने की जगह चुना गुटनिरपेक्षता का रास्ता.
यूगोस्लाविया के टीटो, मिस्र के अब्दुल नासेर, इंडोनेशिया के सुकर्णो जैसे नेताओं के साथ जो गुटनिरपेक्ष आंदोलन उन्होंने खड़ा किया, उसने एक तो भारत सहित तीसरी दुनिया के इन मुल्कों को शीतयुद्ध के सीधे खतरों से बचाये रखा, दूसरे एक खास तरह की बार्गेनिंग की शक्ति दी, जिसका लाभ दोनों महाशक्तियों से रिश्ते बनाये रखने और मदद पाने में किया गया.
ऐसे ही देश के विकास के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था का जो मॉडल चुना गया, उसमें एक तरफ तो वंचित तबकों के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराने और शिक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाओं के राज्य द्वारा विस्तार के लिए पूरी संभावना थी, तो दूसरी तरफ औद्योगिक विकास की भी.
भारतीय पूंजीपति इस हाल में नहीं थे कि आधारभूत संरचना का विकास कर पाते. उद्योगों को आधुनिक भारत के मंदिर कहनेवाले नेहरू जानते थे कि उनके बिना कोई दीर्घकालिक विकास नहीं हो सकता, तो कृषि क्षेत्र की आत्मनिर्भरता को विकसित करने के लिए किये गये उनके प्रयास भारत को अपने व अपने दोनों पैरों पर खड़ा करने की कोशिशों के हिस्सा थे.
यही मध्यमार्ग उन्होंने शासन और धर्म के रिश्ते को लेकर भी चुना. राज्य का धार्मिक मामलों में न्यूनतम हस्तक्षेप और धर्म निरपेक्ष स्वरूप, ये वे सिद्धांत थे जिनके सहारे भारत ने दुनिया की सबसे ताकतवर सत्ता से लड़ते हुए आजादी पायी थी.
मुस्लिम लीग या संघ ने धर्म को राष्ट्र निर्माण का आधार माना था. इसीलिए पाकिस्तान एक मुस्लिम राष्ट्र बना, लेकिन कांग्रेस और नेहरू ने राष्ट्र के निर्माण का आधार धर्मनिरपेक्ष सहअस्तित्व माना था. इसीलिए भारत में सभी धर्मों और समुदायों के लिए जगह मिली थी. जीवन में कभी किसी धार्मिक नेता के साथ एक मंच पर न जाने का नेहरू का निर्णय इसी सिद्धांत के तहत था कि जनता को अपने धार्मिक विश्वासों पर अमल करने की आजादी थी, वहीं शासन को किसी भी धार्मिक पूर्वाग्रह से मुक्त होकर सभी समुदायों को समान महत्व देना था.
अक्सर हिंदू कोड बिल जैसे क्रांतिकारी कदमों का श्रेय उन्हें नहीं मिलता, लेकिन तथ्य यही है कि नेहरू न होते तो टुकड़े-टुकड़े में उस बिल को कभी पास नहीं कराया जा सकता था, जिसके खिलाफ राष्ट्रपति से लेकर कांग्रेस के भीतर अनेक महत्वपूर्ण लोग थे. इसी सिद्धांत के तहत नेहरू ने जिन राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं का निर्माण किया, उन्होंने एक नवस्वाधीन देश को वे आधार और वे मूल्य दिये, जिसने उसे दुनिया के सामने सर ऊंचा करके खड़े होने का हौसला दिया.
नेहरू के जीवनकाल में भी और उसके बाद भी उनके वैचारिक विरोधियों द्वारा उन्हें बदनाम करने की भरपूर कोशिशें की गयीं. कश्मीर से लेकर हर समस्या का उन्हें ही जिम्मेदार ठहरानेवाले अक्सर यह भूल जाते हैं कि नेहरू की वजह से ही कश्मीर भारत का हिस्सा बना, हां इसमें कुछ चुनौतियों से जूझने में कुछ गलतियां स्वाभाविक थीं. इन आलोचनाओं और कुत्सित प्रचारों के बावजूद नेहरू भारत के ही नहीं, दुनियाभर की लोकतांत्रिक जनता के मानस में गहरे बसे हैं, बसे रहेंगे.
संस्थाओं के लगातार पतन, सांप्रदायिक ताकतों के उभार और अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई के मद्देनजर आज भारतीय लोकतंत्र और संविधान ही नहीं, मानव मूल्यों की रक्षा के लिए भी नेहरू की तरफ बार-बार देखे जाने की जरूरत है.
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