भविष्य की एक दिलचस्प झलक
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :16 Oct 2019 1:14 AM (IST)
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आकार पटेल लेखक एवं स्तंभकार aakar.patel@gmail.com एक पुराना चुटकुला है कि भविष्य के विषय में भविष्यवाणी कठिन है. मगर एक ऐसा तरीका है, जिसके द्वारा हम परिवर्तन दर की भविष्यवाणी कर सकते हैं. इसे सुप्रसिद्ध कंप्यूटर चिप कंपनी ‘इंटेल’ के संस्थापक गॉर्डन मूर के नाम पर ‘मूर का नियम’ कहते हैं. आज से पचास वर्ष […]
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आकार पटेल
लेखक एवं स्तंभकार
aakar.patel@gmail.com
एक पुराना चुटकुला है कि भविष्य के विषय में भविष्यवाणी कठिन है. मगर एक ऐसा तरीका है, जिसके द्वारा हम परिवर्तन दर की भविष्यवाणी कर सकते हैं. इसे सुप्रसिद्ध कंप्यूटर चिप कंपनी ‘इंटेल’ के संस्थापक गॉर्डन मूर के नाम पर ‘मूर का नियम’ कहते हैं.
आज से पचास वर्ष से भी अधिक समय पहले उन्होंने यह देखा कि कंप्यूटर की क्षमता प्रत्येक 18 माह पर दोगुनी हो जाती है. इसका आधार ट्रांजिस्टरों की वह संख्या थी, जिसे एक चिप पर स्थापित किया जाता है. यह न्यूटन द्वारा प्रतिपादित गति के तीसरे नियम जैसा कोई नियम नहीं, बल्कि केवल एक अवलोकन था, लेकिन यह अत्यंत सही सिद्ध हुआ और मूर द्वारा यह कहे जाने के पिछले 50 वर्षों से यह सच होता आ रहा है. कंप्यूटर की शक्ति प्रतिवर्ष कम-से-कम एक खास दर से बढ़ जाती है, जिसके नतीजतन कुछ अन्य भविष्यवाणियां भी संभव हैं.
ऐसी भविष्यवाणियां करनेवाले वर्तमान में सबसे मशहूर व्यक्ति रे कुर्जवेल हैं, जो नास्त्रेदमस जैसी शख्सीयत रहे हैं और दुनियाभर में जिन्हें दसियों लाख लोग फॉलो करते हैं. ऐसा इसलिए है कि वे खासी लंबी अवधि और अत्यंत त्रुटिहीन तरीके से ऐसा करते आ रहे हैं.
उनकी पहली पुस्तक का नाम ‘एज ऑफ इंटेलिजेंट मशीन्स’ यानी बुद्धिमान मशीनों का युग है, जिसे उन्होंने 1980 के दशक के अंतिम वर्षों में लिखना आरंभ किया था. उसमें उन्होंने मूर के नियम की एक व्याख्या का सहारा लेते हुए यह भविष्यवाणी की थी कि वर्ष 1998 में एक कंप्यूटर शतरंज के विश्व चैंपियन को पराजित कर देगा. हुआ भी यही कि आइबीएम के ‘डीप ब्लू’ नामक कंप्यूटर ने वर्ष 1997 में गैरी कास्पारोव को हरा दिया. कुर्जवेल ने कहा कि वर्ष 2010 के पूर्व ही ‘गूगल’ जैसी कोई सेवा वाई-फाई नेटवर्क पर उपलब्ध हो जायेगी. विभिन्न किताबों में की गयी अपनी सभी भविष्यवाणियों को उन्होंने वर्ष 2010 में सूचीबद्ध किया, जिनमें केवल तीन ही पूरी तरह गलत निकल सकी हैं.
यही वजह है कि अब से अगले दस वर्षों के लिए की गयी उनकी भविष्यवाणियां किसी को भी दिलचस्प लग सकती हैं, क्योंकि उनके पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए आसानी से यह कहा जा सकता है कि उनमें से लगभग सभी सच निकलेंगी. यहां यह ध्यातव्य है कि ये सभी भविष्यवाणियां विशुद्ध रूप से कंप्यूटिंग शक्ति पर आधारित हैं, क्योंकि वे कंप्यूटिंग प्रौद्योगिकी की प्रगति की माप करते हुए इसका आकलन किया करते हैं कि जब यह किसी खास स्तर पर पहुंच जाती है, तो उसके आधार पर आगे कब क्या हासिल किया जा सकता है.
मसलन, आज से 30 वर्ष पूर्व यह अनुमान किया जा सकता था कि किसी चीज को लघु रूप देने (मिनिएचराइजेशन) तथा टचस्क्रीन प्रक्रिया में सफलता हासिल हो जाने के पश्चात स्मार्टफोन कम कीमत में ही उपलब्ध होने लगेंगे. पर प्रौद्योगिक दुनिया के बाहर कोई अन्य व्यक्ति तब इसकी कल्पना नहीं कर सका था. ‘हमारा फोन एक तरह से हमारा ही विस्तार है और इसकी सहायता से हम किसी भी प्रश्न का उत्तर दे सकेंगे, इसकी स्थिति (लोकेशन) की मदद से हम विश्व में किसी भी स्थल की तलाश कर सकेंगे.’ हममें से कितने ऐसे हैं, जो वर्ष 1990 के आस-पास ऐसी भविष्यवाणी कर सकते थे?
कुर्जवेल कहते हैं कि अगले दशक में यदि सभी नहीं, तो अधिकतर रोगों का आसानी से उपचार हो सकेगा. उनका अनुमान है कि यह नैनो-बोट यानी अत्यंत सूक्ष्म रोबोट की वजह से संभव होगा, जिन्हें हमारे रक्त प्रवाह में प्रविष्ट कराया जा सकेगा. मानव जाति की औसत जीवन प्रत्याशा में तेजी से वृद्धि होती जा रही है और भारतीयों के लिए यह वर्ष 1960 के 40 साल से कुछ ही अधिक के स्तर से बढ़कर अब 70 साल से कुछ ही पीछे तक पहुंच चुकी है. रोगों से लड़ने की शक्ति में नाटकीय वृद्धि के बल पर इसमें और 30 साल की बढ़ोतरी संभव है.
यह एक ऐसी उपलब्धि होगी, जो पहले विरले ही किसी के नसीब में हुआ करती थी. बाह्यकंकाल तथा कृत्रिम अंगों का समांतर विकास भविष्य में यह संभव कर देगा कि सौ वर्ष की उम्र वाले लोग भी पहले की तुलना में कहीं अधिक गतिशील तथा सक्रिय रहा करें. ऐसे में सेवानिवृत्ति की उम्र पर भी पुनर्विचार करना होगा.
कुर्जवेल कहते हैं कि आज से पंद्रह वर्ष बाद आभासी वास्तविकता (वर्चुअल रियलिटी) को वास्तविकता से भिन्न नहीं किया जा सकेगा, जिसका अर्थ यह होगा कि लोग आभासी 3-डी दुनिया में प्रवेश कर भी उतने ही प्रामाणिक तौर पर देख, छू और सुन सकेंगे, जितना हम आज कर रहे हैं.
बहुत-से लोग अपनी समस्त समस्याओं के साथ वास्तविक जगत की बजाय ऐसी ही एक कृत्रिम मगर लगभग पूर्ण दुनिया में रहना अधिक पसंद करेंगे. कुर्जवेल यह भी भविष्यवाणी करते हैं कि हमारी चेतना डिजिटल दुनिया से इतनी तद्रूप यानी मिलती-जुलती हो जायेगी कि हम स्वयं को नये शरीरों में अपलोड एवं डाउनलोड कर सकेंगे.
प्रौद्योगिक दुनिया में रहनेवाले कुछ अन्य लोग यह मानते हैं कि जब हम ऐसी क्षमता से संपन्न हो जायेंगे, तो हमारा भविष्य और अधिक अंधकारमय हो उठेगा.
पर वहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें इस पर संदेह है कि यह सब अत्यंत निकट है और हमारे अनुमान से भी अधिक तेज गति से हमारी ओर बढ़ा आ रहा है. यदि हम इसके विषय में सोचने लगें, तो पायेंगे कि वर्तमान में हम साइबोर्ग, यानी अर्ध मानव तथा अर्ध रोबोट ही हैं.
हमारी वर्तमान समस्या डाटा दर में कमी की है, यानी हम डाटा के इनपुट में बहुत धीमे हैं, क्योंकि हम टाइप करने में केवल अपनी उंगलियों से काम ले रहे हैं. ‘ध्वनि कमांड’ के साथ ही यह कुछ और तीव्र हो सका है और ‘विचार कमांड’ के रूप में इसका अगला कदम भी दृष्टिगोचर हो चुका है.
फिर जैसे भारत जैसे गरीब मुल्क में भी आज स्मार्टफोन लगभग प्रत्येक व्यक्ति के लिए सुलभ हो चुका है, उसी तरह भविष्य की यह प्रौद्योगिकी भी सर्वसुलभ ही होगी.
वैसी स्थिति में एक अकेले मानव के रूप में हमारी क्षमताएं नाटकीय रूप से बढ़ जायेंगी. जो लगनशील या मेहनती होंगे, वे ऐसी चीजें उत्पादित कर सकेंगे, जिन्हें पहले सिर्फ बड़ी कंपनियां निर्मित किया करती थीं. पर जो उतने कर्मठ नहीं हैं, उनका जीवन भी काफी अधिक दिलचस्प तथा आज से अत्यंत अलग होगा.
(अनुवाद: विजय नंदन)
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