जलवायु पर जवाबदेही
Updated at : 25 Sep 2019 12:36 AM (IST)
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हमारी धरती अभूतपूर्व जलवायु संकट का सामना कर रही है. यदि गंभीरता से इस संकट का समाधान नहीं किया गया, तो बहुत जल्दी जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा. इस संबंध में कई सालों से हो रहे प्रयासों के बावजूद ठोस नतीजे सामने नहीं आ रहे है, बल्कि स्थिति लगातार बिगड़ती ही जा […]
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हमारी धरती अभूतपूर्व जलवायु संकट का सामना कर रही है. यदि गंभीरता से इस संकट का समाधान नहीं किया गया, तो बहुत जल्दी जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा. इस संबंध में कई सालों से हो रहे प्रयासों के बावजूद ठोस नतीजे सामने नहीं आ रहे है, बल्कि स्थिति लगातार बिगड़ती ही जा रही है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय साझेदारी और देशों की जिम्मेदारी पर चर्चा के लिए आयोजित संयुक्त राष्ट्र बैठक से बहुत उम्मीदें थीं, परंतु पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने निराशा जतायी है.
उनका मानना है कि कई देशों ने कार्बन उत्सर्जन रोकने और पर्यावरण बचाने के लिए अपने लक्ष्यों को संशोधित किया है तथा नयी प्रतिबद्धताओं का निर्धारण किया है, लेकिन यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि सराहनीय होते हुए भी ऐसे संकल्प पहले के आयोजनों में भी लिये जाते रहे हैं.
इस सम्मेलन में 66 देशों ने ग्रीन हाउस गैसों पर अंकुश लगाने के पहले के संकल्प को बढ़ाया है, पर वैश्विक उत्सर्जन में इन देशों का हिस्सा सात प्रतिशत से भी कम है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैकरां ने भी इस सम्मेलन को संबोधित किया. ये दोनों नेता स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन को बढ़ाकर कार्बन को नियंत्रित करने के लिए प्रयासरत हैं.
अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने जानकारी दी कि भारत-फ्रांस के अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन पहल में लगभग 80 देश शामिल हो चुके हैं. पानी बचाने और प्लास्टिक का इस्तेमाल घटाने से लेकर रसोई गैस वितरण और वनारोपण जैसे कार्यक्रमों की चर्चा करते हुए उन्होंने 2022 तक 175 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा पैदा करने के लक्ष्य तथा इसे बाद में 450 गीगावाट तक ले जाने के इरादे का उल्लेख किया.
राष्ट्रपति मैकरां ने भी यूरोपीय संघ की ओर से अगले साल तक महत्वाकांक्षी उद्देश्यों के निर्धारण का भरोसा दिलाया है. जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, सही दिशा में प्रयास उपदेश देने से अच्छा है, इस सम्मेलन में कुछ ठोस निर्णय नहीं होना निराशाजनक है.
निश्चित रूप से पर्यावरण बचाने और धरती को गर्म होने से बचाने की जिम्मेदारी भारत जैसे विकासशील देशों और अविकसित देशों पर भी है, लेकिन तुलनात्मक रूप से बहुत अधिक कार्बन उत्सर्जित करनेवाले विकसित देशों को इस कोशिश में आगे रहना चाहिए.
बीते शुक्रवार 150 से अधिक देशों में लाखों स्कूली छात्र सड़कों पर उतरकर सरकारों और उद्योगों से अपने भविष्य की गारंटी मांग रहे थे. न्यूयॉर्क में इस सम्मेलन के सामने भी प्रदर्शन हुआ था तथा अनेक कार्यकर्ता बैठकों में भी शामिल हुए थे. फिर भी, यह सम्मेलन एक औपचारिकता बनकर रह गया.
कई देशों में गर्मी, बाढ़, सूखे और जंगलों में आग की घटनाएं, प्रदूषण से हवा का जहरीला होना तथा पानी की कमी जैसे संकेत गंभीर होते जा रहे हैं. इसका खामियाजा खासकर एशिया और अफ्रीका के देशों को भुगतना पड़ रहा है, जो पहले से ही गरीबी, कुपोषण, विषमता जैसी समस्याओं से घिरे हैं. ऐसे में विकसित देशों पर दबाव डालकर वैश्विक जवाबदेही को सुनिश्चित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.
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