स्वतंत्रता के ध्येय

Updated at : 15 Aug 2019 12:17 AM (IST)
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स्वतंत्रता के ध्येय

पंद्रह अगस्त, 1947 से अनवरत चल रही राष्ट्र यात्रा में विकास एवं समृद्धि के अनगिनत सुनहरे मील के पत्थर हैं. स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष और बलिदान इस यात्रा के आधार भी हैं तथा आदर्श भी. औपनिवेशिक शासन ने देश को भौतिक रूप से जीर्ण-शीर्ण कर दिया था, परंतु हमारे पुरखों ने युगों से संचित नैतिक […]

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पंद्रह अगस्त, 1947 से अनवरत चल रही राष्ट्र यात्रा में विकास एवं समृद्धि के अनगिनत सुनहरे मील के पत्थर हैं. स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष और बलिदान इस यात्रा के आधार भी हैं तथा आदर्श भी. औपनिवेशिक शासन ने देश को भौतिक रूप से जीर्ण-शीर्ण कर दिया था, परंतु हमारे पुरखों ने युगों से संचित नैतिक मूल्यों, आध्यात्मिकता और आत्मबल को संबल बनाकर हमारे लिए स्वतंत्रता का अर्जन किया. स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हम उन सेनानियों और राष्ट्रनिर्माताओं का स्मरण करते हुए उनके सपनों के भारत के सृजन का संकल्प दुहराते हैं. यह राष्ट्रीय पर्व हमें अपनी उपलब्धियों के गौरव गान का दिवस तो है ही, अपनी सफलताओं और असफलताओं को सामने रख आत्ममंथन का दिवस भी है.

यह स्वयं को परखने का दिन है. हम अन्न उत्पादन में आत्मनिर्भर तो हो गये हैं, पर आज भी हर थाली में अनाज नहीं पहुंचाया जा सका है. अनाज उपजानेवाला किसान अपनी मेहनत का समुचित दाम नहीं पाता. आर्थिक विषमता की स्थिति यह है कि धनकुबेर मालामाल हैं और निचले पायदान पर खड़ी आबादी बमुश्किल दो जून की रोटी जुटा पाती है.
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने पंक्ति में खड़े सबसे अंतिम व्यक्ति की परवाह की सलाह दी थी. बाबासाहेब ने कहा था कि आर्थिक और सामाजिक बराबरी के बिना राजनीतिक बराबरी का कोई अर्थ नहीं रह जाता है. इसी तरह से दलितों, वंचितों और आदिवासियों को राष्ट्रीय जीवन में वह स्थान हासिल नहीं हो सका है, जिसके वे मानवीय और संवैधानिक तौर पर हकदार हैं.
भारत विविधताओं का देश है, यह मात्र एक मुहावरा नहीं है. यह हमारे देश की विशिष्टता को इंगित करता है, जहां हजारों पहचानें, भाषाएं, संस्कृतियां, जीवन शैलियां, धार्मिक और पारंपरिक मान्यताएं आदि एक राष्ट्रीय अस्मिता की आगोश में पलती-बढ़ती हैं. इनके परस्पर सह-अस्तित्व को सुनिश्चित करना एक राष्ट्रीय उत्तरदायित्व है. विविधताओं को वैमनस्यता का नहीं, सामंजस्य का आधार बनाया जाना चाहिए.
दुर्भाग्य से जातिगत, जातीय, क्षेत्रीय, भाषाई, धार्मिक आदि कारकों को हिंसा का कारण बनाया जाता है. निश्चित रूप से विधायिका, कार्यपालिका और न्यायिक व्यवस्था को राष्ट्र को उत्तरोत्तर आगे बढ़ाने के प्रयासों की अगुवाई करनी है, पर हम नागरिक निर्वाचित प्रतिनिधियों, सरकारों और लोकसेवकों को यह कार्यभार देकर निश्चिंत नहीं हो सकते हैं.
हमें भी उत्तरदायित्व का निर्वाह करना है, कर्तव्यों को निभाना है और समृद्ध व विकसित भारत गढ़ने की प्रक्रिया में सहभागी होना है. सरकारों के अच्छे कामों को लोगों तक पहुंचाने और उनकी अनुचित नीतियों की आलोचना करने में नागरिकों की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए. स्वतंत्रता के ध्येय अपूर्ण हैं, इस सच को अंगीकार करते हुए हम सभी देश को विकसित एवं समृद्ध राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रण लें.
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