बाढ़ नीति जरूरी

Updated at : 14 Aug 2019 2:36 AM (IST)
विज्ञापन
बाढ़ नीति जरूरी

कर्नाटक, केरल, बंगाल, आंध्र प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड समेत देश के विभिन्न इलाकों में बाढ़ और तेज बारिश का कहर जारी है. इन क्षेत्रों में मरनेवालों की संख्या 227 तक जा पहुंची है. प्रभावितों की संख्या लाखों में है तथा हजारों हेक्टेयर में लगी फसल तबाह हो चुकी है. इससे पहले बिहार और असम की बाढ़ […]

विज्ञापन

कर्नाटक, केरल, बंगाल, आंध्र प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड समेत देश के विभिन्न इलाकों में बाढ़ और तेज बारिश का कहर जारी है. इन क्षेत्रों में मरनेवालों की संख्या 227 तक जा पहुंची है. प्रभावितों की संख्या लाखों में है तथा हजारों हेक्टेयर में लगी फसल तबाह हो चुकी है. इससे पहले बिहार और असम की बाढ़ में भी 200 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं. इसी मौसम में मुंबई में भी दो बार बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है.

ऐसे में हमारे सामने यह सवाल फिर खड़ा है कि आखिर साल-दर-साल आनेवाली बाढ़ को रोकने तथा जान-माल की रक्षा करने के ठोस उपाय क्यों नहीं हो रहे हैं. इसी साल मई में ओड़िशा में आये भयावह चक्रवात में प्रशासनिक तत्परता के कारण हजारों लोगों की जान बचायी गयी थी. साल 1999 के चक्रवात में जहां 10 हजार से अधिक लोग मारे गये थे, इस बार 64 जानें गयीं.
ऐसी तैयारी देश के अन्य भागों में क्यों नहीं की जा सकती है, जबकि हमें मालूम है कि जलवायु परिवर्तन, दिशाविहीन विकास योजनाओं, अनियोजित शहरीकरण, नदी क्षेत्रों में अतिक्रमण आदि कारणों से बाढ़ और सूखे की बारंबारता निरंतर बढ़ती ही जा रही है? जल संरक्षण और प्रबंधन पर जोर देने की नवगठित जलशक्ति मंत्रालय की पहल स्वागतयोग्य है, परंतु इसे प्राथमिकता देने की जरूरत है.
राष्ट्रीय स्तर पर गाद हटाने और जल निकासी की व्यवस्था दुरुस्त होनी चाहिए, ताकि कटाव को रोका जा सके एवं बाढ़ नियंत्रण के उपाय ठीक से लागू हो सकें. तटबंध बनाना या उनकी ऊंचाई बढ़ाना कोई स्थायी समाधान नहीं है और यह बेहद खर्चीला भी है. कुछ कारकों के अलावा बाढ़ के कारण हर जगह लगभग समान हैं. इस साल बिहार और मुंबई में बाढ़ का बड़ा कारण बहुत अधिक मात्रा में बारिश का होना रहा है.
जुलाई के दूसरे सप्ताह में 12 राज्यों में 60 फीसदी से अधिक अधिशेष बारिश हुई थी. इसे देखते हुए नीति-निर्धारकों को जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से लेना होगा. डूब क्षेत्र में घनी बस्तियां, जंगलों का क्षरण, आबादी के घनत्व से अधिक गाद पैदा होना आदि कारण मानव-निर्मित हैं. ब्रह्मपुत्र और गंगा नदी के बाढ़ से इन कारणों के गंभीर असर को समझा जा सकता है.
पड़ोसी देशों के साथ और राज्यों के बीच जल समझौतों एवं बांधों को लेकर नये सिरे से विचार-विमर्श होना चाहिए. नदियों के लिए सरकारी आवंटन में विषमता में भी सुधार अपेक्षित है. अभी देश में 5,254 बड़े बांध हैं तथा 447 निर्माणाधीन हैं. बांधों को लेकर विशेषज्ञों व पर्यावरणविदों की चिंताओं को अनसुना करना भी ठीक नहीं है.
केंद्रीय जल आयोग और बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम की उपलब्धियां सराहनीय हैं, पर सच है कि बाढ़ की त्रासदी लगातार गंभीर हो रही है. इनकी सघन समीक्षा कर दीर्घकालिक नीति बनानी चाहिए. इस साल बारिश से सूखे जलाशयों में पानी जमा होना सकारात्मक है. ऐसे में हमें हर स्तर पर पानी संरक्षित करने पर ध्यान देना चाहिए और बाढ़ से बचाव के लिए ठोस कदम उठाना चाहिए.
विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola