सुदृढ़ हों बैंक

सक्षम बैंकिंग प्रणाली आर्थिक स्थिरता और बढ़ोतरी का मुख्य आधार होती है. आज हमारा देश दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, किंतु परिसंपत्तियों के हिसाब से सौ सबसे बड़े बैंकों में सिर्फ एक भारतीय बैंक- स्टेट बैंक- शामिल है. इसका सीधा मतलब है कि आर्थिक विकास और बैंकों के स्वास्थ्य में समुचित संतुलन नहीं […]
सक्षम बैंकिंग प्रणाली आर्थिक स्थिरता और बढ़ोतरी का मुख्य आधार होती है. आज हमारा देश दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, किंतु परिसंपत्तियों के हिसाब से सौ सबसे बड़े बैंकों में सिर्फ एक भारतीय बैंक- स्टेट बैंक- शामिल है. इसका सीधा मतलब है कि आर्थिक विकास और बैंकों के स्वास्थ्य में समुचित संतुलन नहीं है.
इसके लिए विशेषज्ञों का एक समूह पचास साल पहले हुए बैंकों के राष्ट्रीयकरण को दोष देता है. जुलाई, 1969 में 14 बैंकों को और अप्रैल, 1980 में छह बैंकों के राष्ट्रीयकृत किया गया था. कुछ जानकारों का मानना है कि सामाजिक बेहतरी और गरीबी निवारण में इस कदम ने बेहद अहम भूमिका निभायी है क्योंकि इससे सभी तबकों और आर्थिक गतिविधियों के लिए धन मुहैया होना आसान हो गया. आज जन-धन योजना, लाभुकों के खाते में हस्तांतरण, छोटे, मझोले उद्यमों व स्टार्ट-अप के लिए धन उपलब्ध कराने, शिक्षा के लिए ऋण देने जैसी पहलों की अगुवाई सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ही कर रहे हैं.
नब्बे के दशक के शुरू से बैंकिंग प्रणाली में सुधार के लिए सरकारें विभिन्न समितियों का गठन करती रहीं तथा उनकी सिफारिशों को लागू करने की कवायद हुई. पिछले कुछ सालों से बढ़ती गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों की समस्या का समाधान करने तथा परिवारों एवं परियोजनाओं के लिए धन मुहैया कराने के लिए सरकार व रिजर्व बैंक ने प्रबंधन के स्तर पर सुधार के अनेक उपाय किये हैं.
ऐसे में राष्ट्रीयकरण को कोसने से बेहतर है कि कमियों और उन्हें दूर करने के लिए जरूरी कदमों पर ध्यान दिया जाना चाहिए. बरसों से जारी बड़े कारोबारियों में आमदनी छुपाने की प्रवृत्ति तथा बैंक प्रबंधन और सत्ता की राजनीति से उनके नापाक गठजोड़ ने बैंकों के बही-खाते पर नकारात्मक असर डाला.
इसका नतीजा फंसे हुए कर्जों के रूप में हमारे सामने है. बीते पांच सालों में दिवालिया कानून, कर्ज चुकाने में सक्षम होने के बाद भी आनाकानी करनेवाले लोगों पर कार्रवाई, बैंकों के प्रबंधन पर नकेल तथा विभिन्न बैंकों के विलय से बड़े व मजबूत बैंक बनाने की कोशिशों से बैंकिंग क्षेत्र में आत्मविश्वास का संचार हुआ है. इस वर्ष के बजट में सरकार ने 70 हजार करोड़ रुपये (10 अरब डॉलर) की पूंजी उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है.
चार सालों में सरकार बैंकों को तीन ट्रिलियन रुपये (43.81 अरब डॉलर) दे चुकी है. रिजर्व बैंक ने भी उन बैंकों को अतिरिक्त पूंजी मुहैया कराने की घोषणा की है, जो परिसंपत्तियों की खरीद करेंगे या गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को कर्ज देंगे.
बैंकों से पैसे नहीं ले पानेवाले लाखों परिवारों को कर्ज देनेवाली करीब 10 हजार पंजीकृत वित्तीय कंपनियों को भी सरकार ने भी कुछ छूट देने की घोषणा की है. आंतरिक और विदेशी कारकों की वजह से अर्थव्यवस्था की बढ़त को तेज करना बड़ी चुनौती है. उम्मीद है कि सुधार की प्रक्रिया जारी रहने से आगामी दिनों में बैंक इस चुनौती का सामना मजबूती से कर सकेंगे
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