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अर्थव्यवस्था में स्त्रियां

Updated at : 08 Jul 2019 7:21 AM (IST)
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अर्थव्यवस्था में स्त्रियां

विकास और समृद्धि की सभ्यतागत यात्रा में स्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान है. यदि हमारी अर्थव्यवस्था को वृद्धि की राह पर अग्रसर रहना है और 2024 तक पांच ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य को हासिल करना है, तो महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने एवं उनके सशक्तीकरण के लिए निरंतर प्रभावी उपाय जरूरी हैं. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने […]

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विकास और समृद्धि की सभ्यतागत यात्रा में स्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान है. यदि हमारी अर्थव्यवस्था को वृद्धि की राह पर अग्रसर रहना है और 2024 तक पांच ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य को हासिल करना है, तो महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने एवं उनके सशक्तीकरण के लिए निरंतर प्रभावी उपाय जरूरी हैं.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने महिलाओं के लिए अनेक प्रावधानों का उल्लेख करते हुए अपने बजट भाषण में स्वामी विवेकानंद के एक अर्थपूर्ण और प्रासंगिक कथन को उद्धृत किया था. उन्होंने कहा था कि विश्व का कल्याण तब तक नहीं हो सकता है, जब तक महिलाओं की स्थिति में बेहतरी नहीं होती है. किसी चिड़िया के लिए एक पंख से उड़ पाना संभव नहीं है.
इस आदर्श को अपनाते हुए केंद्रीय बजट में प्रस्तावित किया गया है कि जन-धन खाताधारक महिला खाते में बचत नहीं होने पर पांच हजार रुपये तक की निकासी कर सकती है. इसी तरह से स्वयं सहायता समूह की एक महिला सदस्य मुद्रा योजना के तहत एक लाख रुपये तक का ऋण ले सकती है. इस संबंध में यह भी एक उल्लेखनीय तथ्य है कि मुद्रा ऋण योजना के 70 प्रतिशत लाभार्थी महिलाएं हैं. राष्ट्रीय ग्रामीण जीविका योजना के आवंटन में भी बढ़ोतरी की गयी है. महिला एवं बाल कल्याण के आवंटन को भी बढ़ाया गया है.
वित्त मंत्री का यह दृष्टिकोण नीतिगत और दिशागत स्तर की सकारात्मकता को इंगित करता है कि सरकार महिला केंद्रित नीति बनाने की परंपरा से अलग हट कर महिलाओं के नेतृत्व में पहलकदमी पर बल देगी. सरकार के रुख का एक अहम पहलू यह है कि ग्रामीण महिलाओं के विकास को प्रमुखता देने का निश्चय किया गया है. इन प्रयासों से अनेक स्तरों पर परिवर्तन की संभावनाएं बढ़ जाती हैं.
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देकर पूरी आर्थिकी को एक ठोस आधार मिल सकता है और इसके लिए आवश्यक है कि ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी बढ़े. इसमें कोई दो राय नहीं है कि बीते सालों में महिलाओं की स्थिति बेहतर हुई है, पर यह भी सच है कि कार्य-बल में महिलाओं की हिस्सेदारी घटती जा रही है. ऐसा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कमजोरी तथा शहरों में रोजगार के अवसरों की कमी के कारण भी हो रहा है तथा इसलिए भी कि महिलाओं को लेकर सामाजिक पूर्वाग्रह अब भी बरकरार हैं.
बजट में हुई पहलों से इस रुझान में बदलाव की उम्मीद बढ़ी है. बैंकों तथा कल्याण योजनाओं के सहयोग से महिलाएं उद्यमिता के लिए उत्साहित होंगी. महिलाओं की राह में लचर स्वास्थ्य सेवा तथा बढ़ते अपराध बाधक बनते रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार द्वारा महिलाओं व बच्चों के स्वास्थ्य को ध्यान में रख कर अनेक योजनाओं और कार्यक्रमों का संचालन हो रहा है.
अब जब उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम करने के लिए कदम उठाये जा रहे हैं, तो इससे उनके शोषण में भी कमी आयेगी. आर्थिक सक्षमता से वे सशक्त और सक्रिय होंगी. उम्मीद है कि सरकार द्वारा बजट की घोषणाओं को संसद से पारित कर जल्दी अमली जामा पहनाने की कोशिश होगी.
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