ePaper

संस्कृति के एक सिपाही का जाना

Updated at : 18 Jun 2019 7:09 AM (IST)
विज्ञापन
संस्कृति के एक सिपाही का जाना

कुमार प्रशांत गांधीवादी विचारक k.prashantji@gmail.com मुझे अच्छा लगा कि गिरीश रघुनाथ कर्नाड को संसार से वैसे ही विदा किया गया, जैसे वे चाहते थे- नि:शब्द! कोई तमाशा न हो, कोई शवयात्रा न निकले, कोई सरकारी अायोजन न हो, कोई क्रिया-कर्म भी नहीं, भीड़ भी नहीं, सिर्फ निकट परिवार के थोड़े से लोग हों- ऐसी ही […]

विज्ञापन
कुमार प्रशांत
गांधीवादी विचारक
k.prashantji@gmail.com
मुझे अच्छा लगा कि गिरीश रघुनाथ कर्नाड को संसार से वैसे ही विदा किया गया, जैसे वे चाहते थे- नि:शब्द! कोई तमाशा न हो, कोई शवयात्रा न निकले, कोई सरकारी अायोजन न हो, कोई क्रिया-कर्म भी नहीं, भीड़ भी नहीं, सिर्फ निकट परिवार के थोड़े से लोग हों- ऐसी ही विदाई वे चाहते थे….
मुंबई में समुद्र के पास, बांद्रा में उनके अस्त-व्यस्त घर में लंबी चर्चा समेटकर हम बैठे थे. जीवन का अंत कैसे हो, ऐसी कुछ बात उस दिन वैसे ही निकल पड़ी थी अौर मैंने कहा था कि कभी बापू-समाधि (राजघाट ) पर, शाम को घूमते हुए अचानक ही जयप्रकाशजी ने कहा: ‘मुझे यह समाधि वगैरह बनाना बहुत खराब लगता है… जब ईश्वर ने वापस बुला लिया, तो धरती पर अपनी ऐसी कोई पहचान छोड़ने में कैसी कुरूपता लगती है!
… हां, कोई बापू जैसा हो कि जिसकी समाधि भी कुछ कह सकती है, तो अलग बात है…. समाज परिवर्तन की धुन में लगे हम सबकी समाधि इसी समाधि में समायी हुई माननी चाहिए.’ फिर मेरी तरफ देखते हुए कहा, ‘तुम लोग ध्यान रखना कि मेरी कोई समाधि कहीं न बने!’ गिरीश बड़े गौर से मुझे सुनते रहे. अाज जयप्रकाश की समाधि कहीं भी नहीं है. गिरीश धीमे से बोले, ‘अच्छा, यह सब तो मुझे पता ही नहीं था!… मैं जेपी को जानता ही कितना था! …लेकिन कुमार, यह अपनी कोई पहचान छोड़कर न जानेवाली बात बहुत गहरी है….’
मैं उनको जानता था, पढ़ा भी था, पर मिला नहीं था कभी. इसलिए ‘धर्मयुग’ के दफ्तर में जब धर्मवीर भारतीजी ने मुझसे कहा, ‘प्रशांतजी, ये हैं गिरीश कर्नाड!’ तो मैंने इतना ही कहा था, ‘जानता हूं!’ गिरीश कर्नाड ने अात्मीयता से हाथ अागे बढ़ाया. जब तक गीतकार वसंतदेव उनसे मेरे बारे में कुछ कहते रहे, वे मेरा हाथ पकड़े सुनते रहे अौर फिर बोले, ‘मुझे बहुत खुशी हुई यह जानकर कि ऐसे गांधीवाले भी हैं!’
साल 1984 की बात है. फिल्म ‘उत्सव’ की तैयारी का दौर था- शूद्रक के अति प्राचीन नाटक ‘मृक्षकटिक’ का हिंदी फिल्मीकरण! शशि कपूर से मेरा परिचय था, तो मैं जानता था कि वे ऐसी किसी फिल्म की कल्पना से खेल रहे हैं. बात गिरीश कर्नाड की तरफ से अायी थी. तब कला फिल्मों का घटाटोप था. शशि कपूर मसाला फिल्मों से पैसे कमा कर, कला फिल्मों में लगा रहे थे.
मुझे लगता था कि उनकी इस चाह का कुछ लोग अपने मतलब के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. ‘उत्सव’ के साथ भी कुछ ऐसा ही तो नहीं? भारतीजी चाहते थे कि उनकी तरफ से मैं ‘उत्सव’ के बनने की प्रक्रिया को देखूं-समझूं अौर फिर इस पर लिखूं. मैंने उनकी बात स्वीकार की अौर तब से गिरीश से मिलना होने लगा.
गिरीश का महाराष्ट्र से रिश्ता कुछ मजेदार-सा था. मां-पिता छुट्टियों में घूमने महाराष्ट्र के माथेरान में अाये थे. इसी घूमने में मां ने माथेरान में उनको जन्म दिया. अाज भी माथेरान के रजिस्टर में लिखा है : 19 मई 1938; रात 8.45 बजे. सो गिरीश मराठी से अनजान नहीं थे, लेकिन थे कन्नड़भाषी! भाषा का इस्तेमाल करना अौर भाषा में से अपनी खुराक पाना, दो एकदम अलग-अलग बातें हैं. गिरीश कन्नड़ भाषा से ही जीवन-रस पाते थे. इसलिए ही तो इंग्लैंड के अॉक्सफोर्ड में पढ़ाई के बाद भी वे विदेश में बसे नहीं, भारत लौटे अौर जो कुछ रचा, वह सब कन्नड़ में!
इतिहास, राजनीति, सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराएं, मिथक, किंवदंतियां, यौनिक अाकर्षण का जटिल संसार- सबको समेटकर अपनी देशज जमीन से कहानियां निकालना अौर उन्हें अाधुनिक संदर्भ देकर बुनना, गिरीश कर्नाड का यह देय हम कभी भूल नहीं सकते. ‘ययाति’ अौर ‘तुगलक’ ने इसी कारण रंगकर्मियों का ध्यान खींच लिया कि ऐसी जटिल संरचना को मंच पर उतारना चुनौती थी, जिसे गिरीश ने साकार कर दिखाया था. गिरीश कर्नाड अव्वल दर्जे के अध्येता-नाट्य लेखक थे.
बहुत सधे हुए व साहसी निर्देशक थे. अभिनय में उनकी खास गति नहीं थी, लेकिन वे सिद्ध सह-कलाकार थे. कहीं से हमें वह धागा भी देखना व पहचानना चाहिए, जो उसी वक्त मराठी में विजय तेंडुलकर, हिंदी में मोहन राकेश व बांग्ला में बादल सरकार बुन रहे थे. यह भारतीय रंगकर्म का स्वर्णकाल था. इब्राहीम अल्काजी, बीवी कारंत, प्रसन्ना, विजया मेहता, सत्यदेव दुबे, श्यामानंद जालान, अमल अल्लाना जैसे अप्रतिम रंगकर्मियों ने इस दौर में अपना सर्वश्रेष्ठ दिया. यह भारतीय रंगकर्म का पुनर्जागरण काल था.
फिल्म ‘उत्सव’ का बनना पूरा हुअा अौर हमारा साथ-संपर्क भी कम हुअा. गिरीश कर्नाड हमारे दौर में अत्यंत संवेदनशील मन व अत्यंत प्रखर अभिव्यक्ति के सिपाही बन गये.
राजनीतिक-सामाजिक सवालों पर वे हमेशा बड़ी प्रखरता से हस्तक्षेप करते थे. निशांत, मंथन, कलियुग से लेकर सुबह, सूत्रधार अादि फिल्मों में आप इस गिरीश कर्नाड को खोज सकते हैं. मालगुडी डेज में गिरीश नहीं होते, तो क्या होता, हम इसकी कल्पना करें जरा! वीएस नायपाल जिस नजर से भारतीय सभ्यता की जटिलताअों को देखते-समझते हैं अौर फिसलते हुए सांप्रदायिक रेखा पार कर जाते हैं, उसे पहली चुनौती गिरीश कर्नाड ने ही दी थी.
वे गिरीश कर्नाड ही थे, जिन्होंने ‘अरबन नक्सल’ जैसे मूर्खतापूर्ण अारोप व गिरफ्तारी का प्रतिकार करते हुए, बीमारी की हालत में, जब सांस लेने के लिए उन्हें ट्यूब भी लगा था, समारोह में अाये थे अौर गले में वह पोस्टर लटका रखा था, जिस पर लिखा था : मी टू अरबन नक्सल! वे तब संस्कृति के सिपाही की भूमिका निभा रहे थे.
विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola