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यात्राओं का उद्देश्य

Updated at : 13 Jun 2019 7:25 AM (IST)
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यात्राओं का उद्देश्य

कविता विकास लेखिका kavitavikas28@gmail.com गर्मी की छुट्टियां खत्म होने में अब थोड़े ही दिन बचे हैं. अपनी यात्राओं से लोग लौट रहे हैं. पर जिन्हें पहले टिकट नहीं मिला था, वे अब जाने को तैयार हैं. हर जगह खचाखच भीड़ और ऊपर से गरमी की भयावहता. इस समय अगर ट्रेनें लेट चलती हैं, तब यात्रियों […]

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कविता विकास

लेखिका

kavitavikas28@gmail.com

गर्मी की छुट्टियां खत्म होने में अब थोड़े ही दिन बचे हैं. अपनी यात्राओं से लोग लौट रहे हैं. पर जिन्हें पहले टिकट नहीं मिला था, वे अब जाने को तैयार हैं. हर जगह खचाखच भीड़ और ऊपर से गरमी की भयावहता. इस समय अगर ट्रेनें लेट चलती हैं, तब यात्रियों की हालत का अंदाजा लगाइये. कितनी कोफ्त होती है! गर्म हवाएं और पसीने से तर-ब-तर औरत, बच्चे और बूढ़े.

इत्तेफाकन एक प्लेटफॉर्म पर मेरी मौजूदगी थी, जहां मैंने सामाजिकता का एक नया आयाम देखा. फर्श पर प्लास्टिक की चादर पर एक नामी कंपनी के बड़े अधिकारी सपरिवार लेटे हुए थे, जिन्हें एसी के बिना शायद ही रहने की आदत हो.

प्लेटफॉर्म की धूल भरी गरमी में अपनी नातिनों के साथ यात्रा की यादें शेयर करते हुए वे बड़ी सहजता से ठहाके लगा रहे थे. दूसरी ओर बरेली का एक किसान परिवार अपनी तीन बेटियों के साथ दार्जिलिंग जा रहा था. एक बंगाली लड़की अपनी मां को केदारनाथ घुमाने ले जा रही थी. कहीं जाने का जोश था, तो कहीं लौटने की बेसब्री. इरादे इतने मजबूत थे कि 44-45 डिग्री तापमान उन पर हावी नहीं हो रहा था.

यात्राओं का मकसद भी यही है. कुछ नया सीखने और कुछ नया देखने का उमंग सभी विषमताओं पर भारी होता है. हम जिस दुनिया को लड़कियों के लिए महफूज नहीं मानते हैं, उसी दुनिया में एक बेटी अपनी मां को तीर्थ कराने ले जा रही है. कितना कुछ अलग है आम धारणा से.

धूप, गरमी, हवा, तूफान सब अपनी जगह हैं, पर आदमी की इच्छाशक्ति अपनी जगह. यात्राएं अपनी इच्छाशक्ति पर विजय पाने की एक छोटी सी कोशिश हैं, क्योंकि इस समय होनेवाली घटनाओं पर हमारा वश नहीं चलता.

सुख पाने से बड़ा ध्येय सुख में लिपटी खुशी को पाना होता है. जीवन की आपाधापी ने हमें सुख के करीब तो कर दिया है, पर आनंद से दूर कर दिया है. दिन भर मशीन बना मनुष्य रात में थक कर सो जाता है.

इसलिए यात्राएं सुकून भरा लम्हा देती हैं, जिसमें परिवार का सान्निध्य होता है या दोस्तों की नजदीकियां. यात्रा के समय किसी की तबियत बिगड़ जाये, या किसी की पाॅकेटमारी हो जाये या कोई किसी हादसे का शिकार हो जाये, तो मदद के लिए उठते हाथ आदमियत की पहचान कराते हैं. यह इस बात को भी बतलाता है कि भौतिकवादी समाज में अभी भी संवेदनशीलता जीवित है.

मुझे याद है, एक कवि सम्मेलन में आ रही एक कवयित्री की अटैची चोरी हो जाती है, जिसमें उनके कपड़े वगैरह थे. जब वह आयीं, तो किसी ने पहनने के लिए साड़ी दी, तो किसी ने काॅस्मेटिक्स. उन्हें लौटने के पैसे भी दिये गये.

यथासंभव मदद देखकर उनकी आंखें नम हो गयीं. यही तो सामाजिकता है. हम आज के युग में सबसे अलग-थलग भले ही रहते हों, पर जरूरत पड़ने पर जब हम किसी के काम आते हैं, तो यह जीवन की एक उपलब्धि बन जाती है. यह नेक काम हमें अपने ऊपर गर्व करने का मौका देता है.

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