दूसरे कार्यकाल में विदेश नीति
Updated at : 06 Jun 2019 5:49 AM (IST)
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पुष्पेश पंत वरिष्ठ स्तंभकार pushpeshpant@gmail.com प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में अपने शपथ-ग्रहण समारोह से ही यह संकेत दे दिया था कि भारतीय राजनय को गतिशील बनाकर वह राष्ट्रहित को प्राथमिकता देंगे. उनके पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह दूसरे कार्यकाल तक पस्त हो चुके थे और अपनी विश्वसनीयता खो चुके थे. ऐसा जान पड़ता था कि पाकिस्तान […]
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पुष्पेश पंत
वरिष्ठ स्तंभकार
pushpeshpant@gmail.com
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में अपने शपथ-ग्रहण समारोह से ही यह संकेत दे दिया था कि भारतीय राजनय को गतिशील बनाकर वह राष्ट्रहित को प्राथमिकता देंगे. उनके पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह दूसरे कार्यकाल तक पस्त हो चुके थे और अपनी विश्वसनीयता खो चुके थे.
ऐसा जान पड़ता था कि पाकिस्तान हो या चीन, भारत की सुरक्षा को अक्षत रखने में वह और उनकी सरकार अक्षम है. अर्थशास्त्री के रूप मे उनकी ‘ख्याति’ कवच का काम करने में असमर्थ रही. पर यह सुझाना तर्कसंगत नहीं है कि मात्र उनके लकवाग्रस्त प्रदर्शन की तुलना में ही मोदी की उपलब्धियां उल्लेखनीय हैं.
असाधारण सक्रियता के साथ मोदी ने दुनियाभर के देशों के दौरे किये, घर पर शाही मेहमानों का स्वागत किया और भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर निश्चय ही नये विकल्प उद्घाटित किये. आवश्यकतानुसार ही चीन और पाकिस्तान के प्रति सख्ती या नरमी का रुख अपनाया गया तथा नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे अक्सर बेचैन पड़ोसियों को तुष्टीकरण के बिना कमोबेश संतुष्ट रखा जा सका.
कांग्रेसी निरंतर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के दावों को झुठलाने में लगे रहे, पर पांच साल के कार्यकाल में शर्म-अल-शेख जैसा फजीता नहीं हुआ. बहरहाल, यह सब अतीत-व्यतीत है. अहम सवाल यह है कि मोदी के दूसरे कार्यकाल में विदेश नीति तथा राजनय के क्षेत्र में निरंतरता और परिवर्तन का क्या संतुलन बैठाया जा सकता है.
इस बार शपथ ग्रहण समारोह के लिए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को नहीं न्यौता गया, हालांकि उन्होंने मोदी को बधाई देने में देर नहीं लगायी थी. दक्षेस (सार्क) से नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, और श्रीलंका सस्नेह आमंत्रित मेहमान थे. यह साफ संदेश था कि इस बार पाकिस्तान के कारण सार्क का बोझ नहीं ढोया जायेगा. इस बार ‘बिम्सटेक’ के दोस्तों को तरजीह दी गयी.
इस संगठन की सामरिक तथा आर्थिक उपयोगिता चीन की प्रतिद्वंद्विता का मुकाबला करने के संदर्भ में तो है ही, दक्षिण-पूर्व एशिया के उन देशों के साथ राष्ट्रीय हितों का समायोजन करने में भी है, जिनकी आबादी का बहुसंख्यक हिस्सा इस्लाम के अनुयाइयों का है. यह दक्षिण एशियाई मुसलमानों के दिलो-दिमाग से पाकिस्तान का असर मिटाने का प्रयास है. बांग्लादेश और मलेशिया के मुसलमानों की संख्या यदि इंडोनेशिया तथा भारत के मुसलमानों के साथ जोड़ दी जाये, तो पाकिस्तान का कद बौना नजर आता है.
‘बिम्सटेक’ के अलावा उज्बेकिस्तान एवं किर्गिस्तान जैसे शंघाई सहकार संगठन के मित्र राष्ट्रों को भी बुलाया गया था. इन देशों की पहचान इस्लामी ही है, परंतु यह सऊदी-सुन्नी कट्टरता से मुक्त हैं. ये शिया नहीं हैं, पर ऐतिहासिक रेशम राजमार्ग पर स्थित होने के कारण ईरान के करीब हैं. उसे अपना शत्रु नहीं समझते हैं.
शपथ-ग्रहण के तत्काल बाद हुए मंत्रालयों के आवंटन में चौंकानेवाला फैसला यह था कि पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर को विदेश मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया.
चूंकि, सुषमा स्वराज ने सेहत की वजह से चुनाव नहीं लड़ा था, तो ये अटकलें लगायी जा रही थीं कि इस बार यह मंत्रालय किसी और को मिलेगा. कोई यह अनुमान नहीं लगा सकता था कि विदेश सेवा के एक अवकाशप्राप्त अधिकारी को यह जिम्मेदारी मिलेगी. जयशंकर विलक्षण प्रतिभाशाली हैं, साथ ही प्रधानमंत्री के विश्वासपात्र भी. उन्होंने अमेरिका और चीन में भारत के राजदूत के रूप में काम किया है.
अब लाल-बुझक्कड़ी इस बात को लेकर जारी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से उनके संबंध कैसे रहेंगे? कई लोग यह मानते हैं कि गुप्तचर संगठन में काम कर चुके डोभाल को विदेश मंत्रालय के अधिकारी अपना समकक्ष नहीं मानते तथा प्रधानमंत्री पर उनके प्रभाव के कारण ईर्ष्यादग्ध रहते हैं.
जयशंकर को काबीना मंत्री बनाये जाने के तत्काल बाद डोभाल की भी पदोन्नति हो गयी है तथा यह ऐलान किया गया है कि वह पांच साल तक इस पद पर बने रहेंगे. यह सोचने का कोई कारण नहीं है कि प्रधानमंत्री की इस भरोसेमंद जोड़ी में कोई दरार पड़ सकती है. इसके पहले भी पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रह चुके हैं और उनकी सलाह से ही विदेश नीति संचालित हुई है.
जहां तक सैद्धांतिक मतभेद का सवाल है, जयशंकर और डोभाल दोनों ही (अति) यथार्थवादी हैं तथा पाकिस्तान एवं चीन के साथ प्रतिद्वंद्विता का निर्वाह नेहरूयुगीन आदर्शवादी अदूरदर्शिता के साथ नहीं करना चाहते.
अमेरिका के साथ घनिष्ठता के बारे में दिवंगत साम्यवादी पार्टियों के अतिरिक्त सर्वदलीय सहमति है. संकट इस बात का है कि अमेरिका की हर इच्छा को पूरा करने के बाद इसके एवज में कुछ हासिल करने के लालच में भारत ठोकर खा सकता है. मसलन, ईरान पर अमेरिका द्वारा अंकुश लगाने से हमारे उभयपक्षीय संबंधों में तनाव.
मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करवाने में चीन की रजामंदी अमेरिकी कृपाकटाक्ष से संभव हुई, यह अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का दावा है. अमेरिका और चीन के बीच अभी वाणिज्य युद्ध जारी है. भारत को यहां भी सतर्क रहने की जरूरत है. अफगानिस्तान के दलदल में फंसने से बचने की जरूरत है. अमेरिका के लिए ‘अफ-पाक’ क्षेत्र संवेदनशीलता है, हमारे लिए प्राथमिकताएं दूसरी हैं.
बृहत्तर भारत का जो क्षेत्र हिंदू-बौद्ध-सूफी इस्लामी सांस्कृतिक विरासत का साझेदार है, वही हमारा नैसर्गिक प्रभावक्षेत्र है. दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य एशिया, मॉरीशस के अलावा विश्वव्यापी प्रवासी भारतीय हमें उन दूसरे देशों से अलग करते हैं, जिनकी हस्ती क्षेत्रीय ही हो सकती है.
देश की आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियां कम नहीं हैं. कट्टरपंथी आतंकवाद, माओवाद, अलगाववाद तथा इनका गठजोड़ विकास को बाधित करता रहा है. अमित शाह द्वारा गृह मंत्रालय का दायित्व संभालने के बाद इस शूल के समूल उन्मूलन के लिए रक्षा मंत्रालय के साथ संयुक्त अभियान संचालित हो सकता है. नये रक्षा मंत्री पूर्व गृह मंत्री रह चुके हैं.
भारत की अखंडता तभी निरापद रह सकती है, जब इन तीन मंत्रालयों में प्रतिस्पर्धा नहीं, परस्पर पूरक सहयोग हो. हमारी समझ में मोदी निर्वाचित प्रधानमंत्री जरूर हैं, पर उनकी कार्य-शैली अमेरिकी राष्ट्रपति सरीखी है. अपने ‘नवरत्नों’ का सदुपयोग करने में वह समर्थ नजर आते हैं.
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