गांव और झोंपड़ी की यात्राएं
Updated at : 08 May 2019 6:13 AM (IST)
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क्षमा शर्मा वरिष्ठ पत्रकार kshamasharma1@gmail.com छुट्टियां आ रही हैं. लोग अपने बाल-बच्चों समेत कहीं बाहर जाने का कार्यक्रम बना रहे हैं. इन दिनों बहुत से लोग बच्चों को गांव घुमाने ले जाते हैं.गांवों में लोग कैसे रहते हैं, चक्की पर आटा पीसते हैं कि नहीं, गाय-भैंस कैसे पालते हैं, दूर तक लहराते खेतों को देखना […]
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क्षमा शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
kshamasharma1@gmail.com
छुट्टियां आ रही हैं. लोग अपने बाल-बच्चों समेत कहीं बाहर जाने का कार्यक्रम बना रहे हैं. इन दिनों बहुत से लोग बच्चों को गांव घुमाने ले जाते हैं.गांवों में लोग कैसे रहते हैं, चक्की पर आटा पीसते हैं कि नहीं, गाय-भैंस कैसे पालते हैं, दूर तक लहराते खेतों को देखना कैसा होता है, गांव का खान-पान कैसा होता है आदि.
हिंदी फिल्मों में दिखे गांव एकाएक रुचि का विषय बन गये हैं. ये प्रेमचंद की कहानियों में आनेवाले गांव नहीं है. इसमें तो गांव का खाना परोसने के लिए बड़े-बड़े ढाबों, होटलों की व्यवस्था है. विदेशी लोग भारी संख्या में इन्हें देखने आते हैं.
जो चीजें अब गांव की दुनिया से भी विदा हो रही हैं- जैसे चक्की, चूल्हा, नारियल की रस्सी की खाट, बोरसी, खरल, छाछ बिलोने वाली बड़ी-बड़ी मथानियां, बैल गाड़ियां आदि को भी बहुत सी जगहों पर शो पीस की तरह रखा जाता है.
इन्हें इस्तेमाल करती औरतें भी दिखायी जाती हैं. यही नहीं, कच्ची दीवारों वाले छप्पर पड़े घर भी दिखाये जाते हैं. यह बात अलग है कि बारिश के दिनों में इन घरों में रहनेवालों पर जो बीतती है, वह नहीं बताया जाता, क्योंकि इससे यात्रियों का मनोबल गिर सकता है. वे तो भारत के गांवों को किसी अचरज की तरह देखने आते हैं, उनकी समस्याएं हल करने थोड़े ही आते हैं.
इस पर्यटन में गांव की औरतों को कुछ पैसे देकर अपने-अपने स्थान के गीत, नाच-गाने के लिए भी रखा जाने लगा है. क्योंकि लंबे घूंघट काढ़े अपनी-अपनी भाषा में बोलती ये औरतें पढ़े- लिखे साधन संपन्न शहरी वर्ग को बहुत मुदित करती हैं. उनका रहन-सहन अच्छे फोटो खींचने में बहुत मदद देता है. उनके गहने बड़े आकर्षक लगते हैं.
चूल्हे पर बनती रोटी इन औरतों की आंखों को चाहे जितनी पनीली बनाती हो, खाने में बड़ी अच्छी लगती है. उनकी वेशभूषा, बानी-बोली सुनकर सब चकित होते हैं. उनके अधनंगे बच्चे भरे पेट वाले बच्चों को अपनी सुविधाओं का अहसास दिलाते हैं. उनके स्कूल देखकर भी साथ आये बच्चे सवाल करते हैं- अरे स्कूल ऐसे भी होते हैं? गांव और गरीबी दिखाकर पैसे बटोरना नया चलन है. इसीलिए बहुत सी जगहों पर कई बार नकली गांव भी निर्मित किये जाते हैं.
अब तो झुग्गी-झोपड़ी टूरिज्म भी चल पड़ा है. मुंबई में स्थित एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी-झोपड़ी काॅलोनी धारावी को देखने के लिए भी टूरिस्ट आने लगे हैं.
इन छोटी जगहों पर बड़े-बड़े परिवार कैसे रहते हैं, उनकी दिनचर्या कैसी है, वे गरीबी में कैसे जीते हैं, कौन सी भाषा बोलते हैं, गरीबी से कैसे जूझते हैं, आदि बातें देखना-सुनना बहुतों के लिए अभूतपूर्व मनोरंजन है, यानी उनके दुख दूसरों के आनंद का विषय है.
यह विडंबना ही है कि जहां सरकारें गरीबी हटाने की बात करती हैं, वहां अपने देश में पैसा कमाने के लिए गरीबी भी खूब बिक रही है. गरीब का क्या होता है, उसकी दिक्कतें, मजबूरी और मुसीबतें क्या हैं, उनसे भला किसी को क्या मतलब है! दुख है कि गरीबी भी इन दिनों पैसा कमाने का साधन है.
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