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देश को जीवंत वामपंथ की जरूरत

Updated at : 17 Apr 2019 7:34 AM (IST)
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देश को जीवंत वामपंथ की जरूरत

डॉ संजय बारू वरिष्ठ पत्रकार द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के लेखक sanjayabaru@gmail.com आम चुनावों के रिपोर्ताज एवं विश्लेषणों के रोजाना शोरगुल तथा आपाधापी में भारतीय राजनीति के उस एक अहम रुझान को वह अहमियत नहीं दी जा रही है, जिसका वह हकदार है. यह रुझान कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम नीत वाममोर्चे के […]

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डॉ संजय बारू
वरिष्ठ पत्रकार
द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के लेखक
sanjayabaru@gmail.com
आम चुनावों के रिपोर्ताज एवं विश्लेषणों के रोजाना शोरगुल तथा आपाधापी में भारतीय राजनीति के उस एक अहम रुझान को वह अहमियत नहीं दी जा रही है, जिसका वह हकदार है.
यह रुझान कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम नीत वाममोर्चे के उस अचानक क्षय का है, जिसके विषय में अधिकतर चुनाव भविष्यवाणियों का कहना यह है कि पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में जहां उसका खाता तक न खुलने के आसार हैं, वहीं केरल में उसके केवल चार-पांच सीटों तक सिमट जाने की संभावनाएं हैं. यदि जहां-तहां वह एकाध सीटें निकाल ले, तो भी भारतीय राजनीति के इतिहास में यह एक ऐसी ऐतिहासिक घड़ी होगी, जब वाममोर्चे के सभी लोकसभा सदस्यों की संख्या एक अंक में बतायी जा सकेगी. यह एक खेदजनक स्थिति होगी. कोई कम्युनिस्टों से सहमत हो अथवा नहीं, यह एक अलग बात है, मगर भारत को राजनीतिक वाम की जरूरत अपनी जगह कायम रहेगी.
वर्ष 1952, 1957 एवं 1962 में संपन्न पहले, दूसरे और तीसरे आम चुनावों के दरम्यान कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) संसद में एकमात्र सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी, हालांकि उसके सदस्यों की संख्या सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी से कहीं कम हुआ करती थी.
इस पार्टी के दोफाड़ हो जाने के बाद वर्ष 1967 के आम चुनावों से विजयी सीपीआई एवं सीपीएम की सम्मिलित सांसद संख्या 42 थी, जो भारतीय जनसंघ के 35 सांसदों से अधिक थी.
वर्ष 1977 में आपातकाल की समाप्ति के बाद की चौथाई सदी में वाम के प्रभावशाली प्रदर्शन के बूते उसने अखिल भारतीय स्तर पर अपनी सीटों की संख्या की तुलना में काफी अधिक अहमियत हासिल कर ली. यहां तक कि वर्ष 1996 में ज्योति बसु नयी दिल्ली में एक गठबंधन सरकार के मुखिया के रूप में प्रधानमंत्री पद हासिल कर लेने के करीब तक पहुंच गये.
यदि ऐसा नहीं हो सका, तो उसकी अकेली वजह खुद वाम मोर्चे के अंदर का वह वैचारिक भ्रम था, जो अंतिम रूप से यह तय नहीं होने दे रहा था कि वह स्वयं संसदीय लोकतंत्र का एक हिस्सा बन चुका है अथवा अभी भी अपना सियासी और वैचारिक प्रभुत्व स्थापित करने को संघर्षरत है. ज्योति बसु ने इसे एक ‘ऐतिहासिक भूल’ करार दिया था.
वर्ष 2004 तक वाम मोर्चा लोकसभा में 59 सदस्यों की शीर्ष संख्या का स्पर्श कर वह केंद्र बन चुका था, जिसके गिर्द ही यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस का ताना-बाना बुना जा सका था.
यूपीए के सही संचालन में वाम की असमर्थता उसकी ऐसी ‘दूसरी ऐतिहासिक भूल’ बन गयी, जिससे वह कभी उबर नहीं सका. विडंबना यह है कि आज उसका यह अचानक पराभव एक ओर तो उसकी पंथवादी तथा वैचारिक रूप से कट्टर राजनीति का नतीजा है, वहीं दूसरी ओर वह लालू प्रसाद जैसे विवादास्पद सियासतदां के साथ साठगांठ रखने का प्रतिफल भी है.
वर्ष 2004 में वाम के पास ‘किंगमेकर’ की भूमिका में उतर आने का सुनहरा अवसर आ चुका था. लेकिन, वर्ष 2009 आते-आते उसकी अवनति का दौर आरंभ हो गया, जो अब तक जारी ही है. त्रिपुरा में उसकी पराजय के पश्चात उसकी किस्मत की इबारत दीवारों पर पढ़ी जा सकती थी.
तो इस बार वैसा क्या था, जिसे वाम कुछ अलग तरह से कर सकता था? शुरुआत तो इससे की जा सकती है कि उसे सोनिया गांधी की कांग्रेस से अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की ही भांति दूरी बनाकर चलते हुए अपना परचम बुलंदी से फहराना चाहिए था.
दूसरे, सीपीआई एवं सीपीएम को चाहिए था कि वे अपने वृद्ध तथा पुराने नेताओं की जगह विभिन्न क्षेत्रों से जीत सकने की क्षमता वाली नामचीन हस्तियों की बाढ़ ला देते. बिहार में छात्र नेता कन्हैया कुमार को खड़ा कर उन्होंने यही काम किया है. यदि कन्हैया का अभियान सफल रहा, तो वे संघर्ष में आ सकते हैं. वाम के लिए यही मॉडल कई राज्यों में काम कर सकता था.
उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश में सीपीएम को तब अत्यंत सक्रिय एवं क्रियाशील किया जा सकता था, जब उसके महासचिव सीताराम येचुरी अपने गृह नगर काकीनाडा से इस आम चुनाव में एक उम्मीदवार हुए होते.
केरल में शशि थरूर के विरुद्ध एक बंधनमुक्त एवं आक्रामक मुकाबले में प्रकाश करात को उतारा जाना चाहिए था. इसी तरह वाम को चाहिए था कि वह विभिन्न वैसे शहरी क्षेत्रों से सिनेमा अथवा साहित्य जगत की समान विचारधारा वाली नामदार हस्तियों को मैदान में लाता, जहां कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी का कोई खास प्रभाव नहीं होता है.
यह सही है कि वैसा करने पर भी वाम उम्मीदवारों की पराजय हो सकती थी, पर ऐसे में इन दलों का प्रभाव क्षेत्र कई पायदान ऊपर चला गया होता. टेलीविजन मीडिया नामचीन उम्मीदवारों को ही पसंद करता है और उसे वाम दलों के पारंपरिक वृद्ध महारथी उबाऊ प्रतीत होते हैं.
मुंबई के किसी निर्वाचन क्षेत्र से जरा जावेद अख्तर या कोलकाता के किसी क्षेत्र से अमर्त्य सेन या फिर वायनाड से गोपाल कृष्ण गांधी जैसों के उम्मीदवार होने की स्थिति की कल्पना करें! यह राहुल के यू टर्न का मुंहतोड़ जवाब भी हुआ होता.
(अनुवाद: विजय नंदन)
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