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अमेरिका से भी सावधानी जरूरी

Updated at : 20 Feb 2019 6:00 AM (IST)
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अमेरिका से भी सावधानी जरूरी

डॉ अश्वनी महाजन एसोसिएट प्रोफेसर, डीयू ashwanimahajan@rediffmail.com विदेशी व्यापार के मामले में अमेरिका और चीन भारत के दो सबसे बड़े साझेदार देश हैं. हमें समझना होगा कि अमेरिका को चीन से 566 अरब डाॅलर का घाटा है, जबकि भारत से मात्र 22 अरब डाॅलर का. उसके बावजूद अमेरिकी प्रशासन का भारत के प्रति इस प्रकार […]

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डॉ अश्वनी महाजन
एसोसिएट प्रोफेसर, डीयू
ashwanimahajan@rediffmail.com
विदेशी व्यापार के मामले में अमेरिका और चीन भारत के दो सबसे बड़े साझेदार देश हैं. हमें समझना होगा कि अमेरिका को चीन से 566 अरब डाॅलर का घाटा है, जबकि भारत से मात्र 22 अरब डाॅलर का.
उसके बावजूद अमेरिकी प्रशासन का भारत के प्रति इस प्रकार का व्यवहार उसकी भारत के प्रति दोस्ती पर प्रश्नचिह्न लगाता है. भारत द्वारा अफगानिस्तान में ढांचागत विकास के लिए प्रयासों का मजाक उड़ाना और दूसरी तरफ पाकिस्तान के साथ आवश्यक सख्ती न दिखाना, अमेरिका पर संदेह को पुख्ता करता है.
दूसरी तरफ, चीन से हमारा व्यापार घाटा बढ़ता ही जा रहा है. भारत में चीनी सामान बहिष्कार के देशव्यापी आंदोलन के चलते चीनी वस्तुओं की मांग कम हुई, लेकिन उसके बावजूद चीन से आनेवाले टेलीकॉम उपकरणों, कलपुर्जों, परियोजना वस्तुओं, दवाओं के लिए कच्चे माल सरीखे आयात बढ़ने से चीन के साथ हमारा व्यापार घाटा तेजी से बढ़ा है. चीन द्वारा अपने निर्यातों को बढ़ाने के लिए धोखे से सब्सिडी देने और अपने सामान को सस्ता कर भारतीय उद्योगों को नष्ट करने की साजिश भी चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे का एक प्रमुख कारण है.
पिछले कुछ सालों से भारतीय नीति-निर्माताओं में चीन से बढ़ते आयातों और उससे बढ़ते व्यापार घाटे पर सजगता बढ़ी है, इसलिए भारत सरकार ने चीनी सामानों पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगानी शुरू की है.
भारत द्वारा जहां कुल एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाने के मामले 140 के हैं, वहीं अकेले चीन की 100 वस्तुओं पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगायी गयी है. चीनी कंपनियों को उन परियोजनाओं में भाग लेने के लिए प्रतिबंधित किया जा रहा है, जहां चीन भारतीय कंपनियों को अनुमति नहीं देता. वर्ष 2018-19 के बजट और उसके बाद भारत सरकार ने अपने उद्योगों के संरक्षण हेतु कई बार आयात शुल्क बढ़ाया है. इसका असर चीन से आनेवाले आयातों पर हो रहा है. बजट 2018-19 में जिन इलेक्ट्रॉनिक और टेलीकॉम उपकरणों पर आयात शुल्क बढ़ाया गया, अकेले उन्हीं के चीन से होनेवाले आयातों में छह महीनों में 2.5 अरब डाॅलर की कमी आयी है. सरकार चीन से आयातों को रोकने की कोशिश कर रही है.
जहां अमेरिका बार-बार हमारे सामान पर आयात शुल्क बढ़ाता जा रहा है, जिससे हमारे निर्यात प्रभावित हो रहे हैं, वहीं भारत का इस बारे में रुख जरूरत से ज्यादा नरमी भरा है. जब भी कोई मुल्क किसी दूसरे मुल्क के सामान पर आयात शुल्क बढ़ाता है, तो उसके जवाब में प्रभावित देश भी आयात शुल्क बढ़ा देता है.
लेकिन दुर्भाग्य का विषय यह है कि अमेरिका द्वारा आयात शुल्क बढ़ाये जाने के बावजूद भी भारत की अपेक्षित जवाबी कार्यवाही को लगातार स्थगित किया जाता रहा है. भारत का यह नरम रुख दूसरे मुल्क को और अधिक आक्रामक होने का मौका देता है. देखा जा रहा है कि भारत के साथ व्यापार में अमेरिका और भी ज्यादा आक्रमक होते हुए न केवल आयात शुल्क बढ़ा रहा है, बल्कि काफी बड़ी मात्रा में भारतीय सामान को शून्य प्रतिशत आयात शुल्क जैसी प्राथमिकता को समाप्त करने की धमकी भी दे रहा है.
अमेरिका द्वारा भारत को निर्यात करनेवाली एक बड़ी मद पेट्रोलियम तेल और गैस है, जो 4.5 अरब डाॅलर के बराबर है, इसके और बढ़ने की संभावना है. अमेरिका से बड़ी मात्रा में रक्षा सौदे भी हो रहे हैं. इसलिए आनेवाले वर्षों में अमेरिका के साथ व्यापार का सरप्लस घाटे में बदल सकता है.
इन सब फायदों के बावजूद अमेरिका लगातार धमकियां दे रहा है कि वह न केवल आयात शुल्कों को और ज्यादा बढ़ायेगा, बल्कि भारत को अमेरिका से व्यापार के संबंध में मिलनेवाली आम प्राथमिकता की व्यवस्था यानी जीपीएस (जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रिफरेंसेस) को समाप्त कर देगा. गौरतलब है कि इस प्रावधान के अंतर्गत अमेरिका में कई भारतीय सामानों को बिना शुल्क आयात किये जाने की अनुमति है. हाल ही में अमेरिका ने इस धमकी को फिर से दोहराया है और इस बार इस बात का ठीकरा भारत द्वारा अपनी ई-कॉमर्स नीति को कड़ाई से लागू किये जाने के निर्णय पर फोड़ा है. गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति स्वयं अपनी उसी कंपनी एमेजॉन के घोर विरोधी हैं.
आज जबकि अमेरिका को व्यापार में भारत से 25 गुना ज्यादा घाटा चीन से है, उसके बावजूद वह चीन से समझौते का हाथ बढ़ा रहा है और भारत के प्रति जरूरत से ज्यादा सख्ती का माहौल बना रहा है. वह भारत से सूचना प्रौद्योगिकी उत्पादों पर आयात शुल्क घटाने की मांग कर रहा है.
गौरतलब है कि पिछले साल फरवरी में भारत ने इन उत्पादों पर आयात शुल्क 10 प्रतिशत से बढ़ा कर 20 प्रतिशत कर दिया था. अमेरिका की इस मांग को मानने पर उसको तो कोई फायदा होगा नहीं, अलबत्ता चीन के मोबाइल फोन पहले से कहीं ज्यादा मात्रा में भारत में आने लगेंगे. भारतीय नेतृत्व का अमेरिका के साथ सख्ती से पेश आना जरूरी है, क्योंकि अमेरिका का यह रुख उसके आर्थिक हितों से ज्यादा उसकी दादागिरी को दर्शाता है.
अमेरिका को समझना होगा कि अमेरिका के आर्थिक हितों के लिए भारत ज्यादा उपयोगी देश है, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था और भारत में रोजगार का संरक्षण भारत सरकार का पहला दायित्व है. इसलिए चाहे एमेजॉन और वाॅलमार्ट पर शिकंजा कसने की बात हो या भारत के इलेक्ट्रॉनिक और टेलीकॉम उद्योग के संरक्षण हेतु आयात शुल्क बढ़ाने की बात हो, भारत की चिंताओं को समझते हुए अमेरिका को अपने रुख को ठीक करना होगा.
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