बढ़ते खेत, घटते वन
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 15 Feb 2019 7:17 AM
दो दशक पहले की तुलना में आज दुनिया में अधिक हरियाली है. धरती को हरा-भरा बनाने के प्रयासों में चीन और भारत अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं. नासा की सैटेलाइट तस्वीरों पर आधारित अध्ययन के ये निष्कर्ष हरित क्षेत्र में कमी और बढ़ोतरी को लेकर आम धारणाओं के विपरीत हैं. पर्यावरण के क्षरण, बढ़ते प्रदूषण […]
दो दशक पहले की तुलना में आज दुनिया में अधिक हरियाली है. धरती को हरा-भरा बनाने के प्रयासों में चीन और भारत अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं. नासा की सैटेलाइट तस्वीरों पर आधारित अध्ययन के ये निष्कर्ष हरित क्षेत्र में कमी और बढ़ोतरी को लेकर आम धारणाओं के विपरीत हैं.
पर्यावरण के क्षरण, बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी समस्याओं से चिंतित विश्व के लिए यह अध्ययन राहत की खबर है, लेकिन इसके निष्कर्षों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत भी है. भारत और चीन के पास दुनिया के कुल हरित क्षेत्र का महज नौ फीसदी हिस्सा ही है, लेकिन हरियाली के विस्तार में दोनों देशों का योगदान एक-तिहाई है.
अध्ययन ने रेखांकित किया है कि यह उपलब्धि आश्चर्यजनक है, क्योंकि आम तौर पर माना जाता है कि ज्यादा आबादी के देशों में जमीन के बेतहाशा दोहन से भूमि की उर्वरता घटती जा रही है, परंतु जहां चीन में हरित क्षेत्र के विस्तार में 42 फीसदी जंगली इलाके और 32 फीसदी खेती शामिल हैं, वहीं भारत में हरियाली की बढ़त में 82 फीसदी खेतिहर जमीन का योगदान है.
जंगलों का योगदान सिर्फ 4.4 फीसदी है. यह हिसाब चिंताजनक है, क्योंकि हमारे देश में खेती में भू-जल का इस्तेमाल बहुत अधिक होता है और भविष्य में जलस्तर के लगातार नीचे जाने तथा मौसम के मिजाज में बदलाव से खेती की रूप-रेखा भी बदलेगी. पानी के संकट और प्राकृतिक आपदाओं से तबाही की समस्याएं गंभीर होती जा रही हैं.
यदि इस सिलसिले पर रोक नहीं लगी या वैकल्पिक उपायों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो हरित क्षेत्रों की बढ़वार उलटी दिशा में गतिशील हो जायेगी. इस शोध में यह भी चिह्नित किया गया है कि ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे देशों में उष्णकटिबंधीय वनों के सिमटते जाने से हुए नुकसान की भरपाई हरियाली के मौजूदा विस्तार से नहीं की जा सकती है. वर्ष 2000 के बाद से चीन और भारत में खाद्यान्न उत्पादन में 35 फीसदी से ज्यादा की बढ़त हुई है.
विकास प्रक्रिया में औद्योगिकीकरण और नगरीकरण पर भी खूब जोर दिया गया है. जैसा कि इस अध्ययन और अन्य रिपोर्टों से इंगित होता है, चीन ने वन क्षेत्र के विस्तार पर भी ध्यान दिया है. किंतु, भारत में जंगल निरंतर काटे जा रहे हैं. बीते ढाई दशकों में दुनिया ने हर घंटे एक हजार फुटबॉल मैदान के बराबर वन क्षेत्र को खोया है.
साल 2014 से 2017 के बीच हमारे देश में हर दिन 63 फुटबॉल मैदान के बराबर जंगली इलाके को खेत, खनन, शहर, सड़क और उद्योग के लिए उजाड़ा गया. पिछले साल वन सर्वेक्षण रिपोर्ट में जानकारी दी गयी थी कि भारत 22 फीसदी से कम के आंकड़े के साथ अपने भू-भाग के 33 फीसदी हिस्से को वन क्षेत्र बनाने के लक्ष्य से बहुत पीछे है.
अर्थव्यवस्था में वृद्धि पर ध्यान देकर देश को समृद्धि की राह पर बनाये रखने के साथ वन क्षेत्रों के संरक्षण को प्राथमिकता देकर विकास, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों पर संतुलित नीति और कार्य-योजना बनाने की आवश्यकता है.
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