किताबों के मेले में महिलाएं

Updated at : 29 Jan 2019 6:58 AM (IST)
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किताबों के मेले में महिलाएं

क्षमा शर्मा वरिष्ठ पत्रकार kshamasharma1@gmail.com हाल ही में दिल्ली विश्व पुस्तक मेला खत्म हुआ. राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा आयोजित पुस्तकों के इस महाकुंभ में लाखों लोग आते हैं. सैकड़ों लेखकों की पुस्तकों का लोकार्पण होता है. लेखक और प्रकाशक यही चाहते हैं कि पुस्तकें मेले के अवसर पर आयें और इसी बहाने मीडिया में कवरेज […]

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क्षमा शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार

kshamasharma1@gmail.com

हाल ही में दिल्ली विश्व पुस्तक मेला खत्म हुआ. राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा आयोजित पुस्तकों के इस महाकुंभ में लाखों लोग आते हैं. सैकड़ों लेखकों की पुस्तकों का लोकार्पण होता है. लेखक और प्रकाशक यही चाहते हैं कि पुस्तकें मेले के अवसर पर आयें और इसी बहाने मीडिया में कवरेज और चर्चा भी हो जाये.

जैसे-जैसे पुस्तकें लोकार्पिंत हुईं, वे फेसबुक और सोशल मीडिया में अपनी जगह बनाती गयीं. किसने क्या बोला, यह भी पता चलता गया. इस बार दिलचस्प बात यह थी कि महिलाओं की किताबें बहुत बड़ी संख्या में लोकार्पित हुईं. इनमें कहानी, कविताएं, उपन्यास, आलोचना, राजनीति के अलावा विविध विषयों की किताबें थीं. इन्हें देखकर यह बात साबित हुई कि देशभर में अब बड़ी संख्या में औरतें लिख रही हैं.

ये युवा हैं, मिडिल एज्ड हैं, सीनियर सिटिजन हैं, यानी कि लेखन में महिला की उम्र कोई बाधा नहीं है. इसीलिए शायद बहुत से लोग कहने लगे हैं कि यह साहित्य का महिला युग है. वे पुरुषों से भी बड़ी संख्या में लेखन के क्षेत्र में दस्तक दे रही हैं.

मेले में सिर्फ लेखिकाओं के रूप में ही नहीं, दर्शक और खरीदार के रूप में भी महिलाएं खूब दिखीं. बहुत सी युवा माताएं अपने बच्चों की उंगली पकड़े आती थीं. बच्चे किताबों को छूकर देखते थे. उनके चित्रों को पलटते थे.

फिर माताएं उनकी उम्र और रुचि के हिसाब से किताबें खरीदती थीं. बच्चों के लिए उनकी रुचियों और जरूरतों को देखते हुए मेले में हर बार ढेरों किताबें होती हैं. इस बार भी थीं.

स्कूल, काॅलेज में पढ़ती बच्चियां, नौकरी-पेशा लड़कियां भी इस स्टाॅल से उस स्टाॅल पर आती-जाती दिखीं. वे सबसे अधिक जोश में थीं. बहुत-सारी लड़कियां तो स्टाॅल्स के बाहर धूप में बैठकर, कुछ-न-कुछ खाती और किताब पढ़ती नजर आयीं.

आज से दो-चार पीढ़ी पहले स्त्री के जीवन में किताब की भूमिका मात्र इतनी ही थी कि वह पढ़ना-लिखना सीख जाये, जिससे कि समय-समय पर अपनी राजी-खुशी की जानकारी वह चिट्ठी के जरिये अपने घर वालों को दे सके.

या फिर रामायण, गीता और अन्य धार्मिक ग्रंथ पढ़ सके, जिससे कि उसकी पूजा में कोई विघ्न न पड़े. कुछ और समय बीता, तो कहा जाने लगा कि लड़कियां पुस्तकों को पढ़ें, ताकि वे अपने बच्चों को पढ़ा सकें. बाकायदा विज्ञापनों में गणित और साइंस पढ़ी-लिखी लड़की की मांग की जाती थी, ताकि बच्चों के लिए इन विषयों का ट्यूशन न लगाना पड़े.

लेकिन, लेखन के क्षेत्र में अधिक से अधिक महिलाओं की उपस्थिति यह बताती है कि अब वे अपनी जिंदगी को देखने और रचने के लिए किसी और की कलम की मोहताज नहीं हैं. वे न केवल अपने बारे में, बल्कि दुनिया के बारे में अपने नजरिये को घर-घर तक पहुंचा सकती हैं. प्रशंसित हो सकती हैं और तमाम पुरानी वर्जनाओं को तोड़ सकती हैं. और दूसरों को उन्हें तोड़ने के लिए प्रेरित कर सकती हैं.

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