जन-बुद्धिजीवी की चीख और अपील

Updated at : 28 Jan 2019 7:41 AM (IST)
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जन-बुद्धिजीवी की चीख और अपील

रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार ravibhushan1408@gmail.com किसी भी समाज में जन-सार्वजनिक बुद्धिजीवी की विशेष भूमिका होती है. ऐसे बुद्धिजीवी जनता की आवाज होते हैं, उन्हें दिशा-दृष्टि देते हैं. पिछले कुछ समय से भारतीय बुद्धिजीवियों पर राज्य द्वारा अनेक आरोप मढ़े जा रहे हैं. लेखक, स्तंभकार, शिक्षाविद्, राजनीतिक विश्लेषक, नागरिक अधिकार सक्रियतावादी, प्रसिद्ध-प्रतिष्ठित, महत्वपूर्ण दलित चिंतक आनंद तेलतुंबड़े […]

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रविभूषण

वरिष्ठ साहित्यकार

ravibhushan1408@gmail.com

किसी भी समाज में जन-सार्वजनिक बुद्धिजीवी की विशेष भूमिका होती है. ऐसे बुद्धिजीवी जनता की आवाज होते हैं, उन्हें दिशा-दृष्टि देते हैं. पिछले कुछ समय से भारतीय बुद्धिजीवियों पर राज्य द्वारा अनेक आरोप मढ़े जा रहे हैं.

लेखक, स्तंभकार, शिक्षाविद्, राजनीतिक विश्लेषक, नागरिक अधिकार सक्रियतावादी, प्रसिद्ध-प्रतिष्ठित, महत्वपूर्ण दलित चिंतक आनंद तेलतुंबड़े को भीमा कोरेगांव मामले में आरोपी बनाया गया है और उनके नौ सह-आरोपी अभी जेल में हैं, जिनकी भारतीय बौद्धिक समाज में अच्छी-खासी प्रतिष्ठा है.

तेलतुंबड़े अभी बाहर हैं, पर उनकी गिरफ्तारी की पृष्ठभूमि तैयार की जा चुकी है. पिछले वर्ष के आरंभ में भीमा कोरेगांव के कार्यक्रम के बाद, जिन पर मुख्य आरोप था- संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे, उन पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है, क्योंकि वे सत्ता-संगी हैं.

मुंबई मिरर ने अपनी रिपोर्ट में और दलितों ने इन दोनों को मुख्य आरोपी माना था. कंप्यूटर से प्राप्त एक ‘शहरी नक्सली’ के ईमेल पर प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश की जो बात की गयी थी, उसका पर्दाफाश प्रमुख वरिष्ठ पत्रकार प्रेमशंकर झा ने अपने लेख में कर दिया था और इस झूठ पर काफी लिखा भी गया था. अपनी जन-सामाजिक भूमिका के विपरीत कार्य करनेवाली राज्यसत्ता केवल झूठ के सहारे चलती है, जबकि जन-बुद्धिजीवी झूठ का पर्दाफाश कर जनता को वास्तविक सच्चाइयों से अवगत कराता है और उसे उसके वास्तविक हालात के सही कारणों से परिचित कराता है.

जन-बुद्धिजीवी किसी भी लोकतांत्रिक समाज में वास्तव में लोकतंत्र की रक्षा करता है. सत्ता उसे पसंद नहीं करती. वह धारदार कलम से खौफ खाती है.

आनंद तेलतुंबड़े ने भीमा कोरेगांव की हिंसा के तुरंत बाद अपने लेख में आंबेडकर के लिए भीमा कोरेगांव को महत्वपूर्ण मानने की बात कहते हुए यह लिखा था कि आंबेडकर ने इस घटना को ‘ब्रिटिश शासन के अधीन उत्पीड़क ब्राह्मणों के खिलाफ महाड़ समुदाय की लड़ाई’ के रूप में प्रस्तुत किया था. तेलतुंबड़े ने इसे ‘मिथक’ कहा है, क्योंकि इसे ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़क बनाम उत्पीड़ित की लड़ाई में देखना गलत है.

उनके अनुसार, इस मिथक का राजनीतिक उद्देश्य पूरा हो चुका है और ’21वीं सदी में दलितों का इस मिथक से जुड़ाव एक अस्मितावादी दलदल में ले जायेगा’. पुणे पुलिस ने तेलतुंबड़े को भीमा कोरेगांव की हिंसा के मामले में नामजद किया था, जबकि तेलतुंबड़े ने भीमा कोरेगांव पर अपने विचार रख दिये थे.

बीते 14 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने तेलतुंबड़े के खिलाफ पुणे पुलिस द्वारा दायर की गयी एफआइआर को रद्द करने संबंधी याचिका खारिज कर दी है. अब केवल पुणे की सत्र अदालत से ही जमानत लेने का रास्ता बचा है.

तेलतुंबड़े ने देश के प्रबुद्ध नागरिकों से अपील की है कि विभिन्न तबके के लोग उन्हें बचाने के लिए (आसन्न गिरफ्तारी से) एक अभियान छेड़ें. अपनी संभावित गिरफ्तारी को वे केवल जेल-जीवन की कठिनाइयों से न जोड़कर, ‘लैपटॉप से दूर रखने का मामला’ भी कहते हैं, क्योंकि वह उनकी ‘देह का अभिन्न अंग’ है. वहां उनकी आधी लिखी किताबें हैं, उनके छात्र और संस्थान हैं.

तेलतुंबड़े की पत्नी बाबासाहेब आंबेडकर की पौत्री हैं. उन पर जिस यूएपीए एक्ट के तहत मामला दर्ज है, उसमें बिना किसी सबूत या आरोप के जमानत के बगैर, महीनों जेल में रखा जा सकता है. इस एक्ट को समाप्त करने की बात बार-बार कही जाती रही है. तेलतुंबड़े ने अपनी बिखर चुकी उम्मीदों का जिक्र किया है और गिरफ्तारी के मंडराते खतरे की बात कही है. इक्कीसवीं सदी का भारत आखिर किस दिशा में जा रहा है?

तेलतुंबड़े का जन-सरोकार आरंभ से व्यापक है. महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के एक सामान्य गांव राजुर में जन्मे इस जन-बुद्धिजीवी ने भारतीय समाज को जितना कुछ दिया है, उस पर समाज को गर्व करना चाहिए.

आइआइएम, अहमदाबाद से शिक्षित तेलतुंबड़े ने प्रबंधन की अच्छी-खासी नौकरी आइआइटी, खड़गपुर और गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में पढ़ाने के लिए छोड़ी. उनके सैकड़ों लेख और अनेक पुस्तकें हैं, जिनका कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ है. ईपीडब्ल्यू में उनके मासिक स्तंभ ‘मार्जिन स्पीक्स’ और समयांतर में प्रकाशित लेखों से देश का शिक्षित समुदाय सुपरिचित है. अंग्रेजी और मराठी में उनका विपुल लेखन है. आउटलुक, तहलका, मेनस्ट्रीम, सेमिनार, फ्रंटियर, ईपीडब्ल्यू के वे लेखक हैं. अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में उनकी प्रमुख उपस्थिति रही है. सौ से अधिक उन्होंने ‘मेमोरियल लेक्चर्स’ दिये हैं.

अनेक सम्मानों से वे सम्मानित हैं. वे ‘सशक्त और अनोखी दलित आवाज’ हैं. महाड़ सत्याग्रह, खैरलांजी नरसंहार, जनवादी समाज और जाति का उन्मूलन, रिपब्लिक ऑफ कास्ट, द रैडिकल इन आंबेडकर, आदि कई पुस्तकों में एक तेज चमकती रोशनी है.

साल 2014 में कर्नाटक राज्य विश्वविद्यालय ने उन्हें ‘डी.लिट.’ की मानद उपाधि प्रदान की. लगभग हर मुद्दे पर उन्होंने लिखा है. जज लोया की मृत्यु, विनायक सेन, गुजरात 2002, बथानी टोला, मोदी, आरएसएस, डांस ऑफ डेमोक्रेसी, सब पर लिखा है.

देश की राज्यसत्ता आखिर अपने बुद्धिजीवियों के खिलाफ क्यों है? हमारे लोकतंत्र के लिए तेलतुंबड़े का योगदान बहुत बड़ा है और देश को ऐसे जन-बुद्धिजीवियों पर फख्र होना चाहिए.

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