भारतीय वस्त्रों पर जोर

अभिनेत्री अनुष्का शर्मा और अभिनेता वरुण धवन अभिनीत फिल्म ‘सुई -धागा’ वाकई बेहतरीन है. रेडीमेड और ब्रांडेड कपड़ों के इस दौर ने किस तरह हमारे पारंपरिक बुनकरों, रंगरेजों और दर्जियों सहित वस्त्र उद्योग से जुड़े तमाम परिवारों को मजूबर और लाचार बना दिया है, इसका एहसास इस फिल्म को देख कर होता है. एक समय […]
अभिनेत्री अनुष्का शर्मा और अभिनेता वरुण धवन अभिनीत फिल्म ‘सुई -धागा’ वाकई बेहतरीन है. रेडीमेड और ब्रांडेड कपड़ों के इस दौर ने किस तरह हमारे पारंपरिक बुनकरों, रंगरेजों और दर्जियों सहित वस्त्र उद्योग से जुड़े तमाम परिवारों को मजूबर और लाचार बना दिया है, इसका एहसास इस फिल्म को देख कर होता है.
एक समय था, जब हमारे कपड़े कोई पारिवारिक दर्जी ही सिलता था. उसकी सिलाई, बुनाई सब एकदम पक्की और टिकाऊ होती थी. तब कपड़े लक्जरी आइटम नहीं होते थे. आम आदमी तक का यह हाल है कि एक बार सार्वजनिक अवसर पर पहने हुए कपड़े उसे दुबारा पहनने पर शर्म आती है, तो कुछ ऐसे भी लोग हैं जो खास अवसरों के लिए कपड़े खरीदते ही नहीं, हर पार्टी-फंक्शन के लिए किराये पर कपड़े- गहने सब ले लेते हैं. इससे इनको ऐसा लगता है कि ये फैशन के रिपीटीशन से बच गये.
अर्चना कुमारी पॉल, मनिहारी, कटिहार
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