विष्णु खरे : हिंदी का आखिरी जीनियस
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 20 Sep 2018 6:46 AM
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अशोक कुमार पांडेय लेखक ashokk34@gmail.com साल 2010-11 की बात होगी. देवताले जी से किसी संदर्भ में बात हो रही थी. विष्णु जी का जिक्र आया तो हंसकर बोले, ‘मेरा पक्का दोस्त है वह, लेकिन सुनता किसी की नहीं. झगड़ा कर लेता है और फिर मना भी लेता है.’ वे ऐसे ही थे. जिद्दी, तुनकमिजाज और […]
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अशोक कुमार पांडेय
लेखक
ashokk34@gmail.com
साल 2010-11 की बात होगी. देवताले जी से किसी संदर्भ में बात हो रही थी. विष्णु जी का जिक्र आया तो हंसकर बोले, ‘मेरा पक्का दोस्त है वह, लेकिन सुनता किसी की नहीं. झगड़ा कर लेता है और फिर मना भी लेता है.’
वे ऐसे ही थे. जिद्दी, तुनकमिजाज और उदात्त भी. क्षुद्रताएं उनसे बर्दाश्त नहीं होती थीं. जो बातें लोग निजी महफिलों में कहकर रहजाते थे, वे खुलेआम कहते थे और दुश्मन बनाते थे. सबसे बनाकर रखनेवाली दुनिया में वह बिगाड़ के डर को परे रख ईमान की बात करनेवाले थे.
इतने उदात्त कि नये से नये रचनाकार पर नजर रखते थे. पत्रिकाओं या ब्लॉग्स पर कविताएं पढ़कर पसंद आने पर बिना हिचक फोन/मेल करनेवाले और बदले में कोई उम्मीद न करनेवाले. इस जल्दबाजी और सनक में कई बार उन्होंने गलत राहें भी चुनीं, आलोचना करते-करते बहुत दूर तक भी गये, लेकिन किसी फायदे के लिए नहीं, बस सच को कहने की अपनी जिद के चलते ही.
मैत्रेयी पुष्पा के अपमान पर उन्होंने खुलेआम विभूति नारायण राय का विरोध किया, तो हाल ही में साहित्य अकादमी पुरस्कार वापसी के दौरान अकादमी के पूरे स्ट्रक्चर पर उन्होंने जो सवाल उठाये, वे समय के हिसाब से भले पॉलिटिकली इनकरेक्ट हों, लेकिन असल में हमारी अकादमियों और साहित्य संस्थाओं के पतन के मूल कारणों को रेखांकित करते हैं.
छिंदवाड़ा में जन्म तथा इंदौर से अंग्रेजी में उच्च शिक्षा लेकर मध्य प्रदेश से दिल्ली तक पत्रकारिता, अध्यापन और फिर पत्रकारिता में लंबा समय बिताने के बाद वह 1976 में साहित्य अकादमी के उप सचिव हुए. उनका और शानी का दौर कुछ के लिए ‘खरेशानी’ का दौर था, तो बाकियों के लिए परेशानी का.
उन्हें मद्रास स्थानांतरित किया गया, तो लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी और फिर इस्तीफा देकर 1985 में नवभारत टाइम्स में आ गये. वहां भी मालिकान और मुख्य संपादक विद्यानिवास मिश्र से बनी नहीं और अंततः 1993 में इस्तीफा दे दिया.
हाल में जब उनके दिल्ली हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष बनने की सूचना मिली, तो मुझे यह उनके कद के अनुरूप तो नहीं ही लगा, यह भी आश्चर्य हुआ कि एक सरकारी व्यवस्था में वे कैसे काम कर पायेंगे. लेकिन, उन्होंने लगातार अच्छे आयोजन कराये. वे पत्रिका को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे थे.
आखिरी बार उन्हें अकादमी के ही एक कविता पाठ के आयोजन में देखा था. वे कमजोर लग रहे थे. यहां वे अकेले रह रहे थे और जब मस्तिष्क आघात हुआ, तो घंटों किसी को पता नहीं चला. ये कुछ घंटे बहुत लंबे हो गये.
सतत् बेचैनी में जीनेवाले विष्णु खरे सही मायनों में जीनियस थे. भाषा, फिल्में, संगीत पुरातत्व, विज्ञान और कविता उनकी विशेषज्ञता ही नहीं, दीवानगी थी. निजी अनुभव की कहूं, तो मराठी कवि नामदेव ढसाल के कविता संकलन के विमोचन के समय का उनका संक्षिप्त भाषण सुनना आधुनिक मराठी कविता को समझने के लिए एक सिनाॅप्सिस था. मेरे लिए तो उनकी कविताएं जैसे साहित्य की कक्षाएं थीं. विश्व कविता से जितने अनुवाद उन्होंने किये थे, शायद ही किसी अन्य सक्रिय कवि ने किये हों और यह एकतरफा नहीं था.
श्रीकांत वर्मा और भारतभूषण अग्रवाल की कविताओं का उन्होंने अंग्रेजी में अनुवाद किया और समकालीन कविता का एक निजी संग्रह ‘दि पीपल एंड दि सेल्फ’ भी. इन दिनों भी वह मुक्तिबोध की कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद की बड़ी परियोजना पर काम कर रहे थे. पुरस्कारों और उपलब्धियों की कोई सूची उनके महत्त्व को रेखांकित नहीं कर पायेगी. मेरे देखे वे लंबे समय से हिंदी के आखिरी जीनियस थे.
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